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सोमेश शेखर चन्द्र की लंबी कहानी : पुनर्जन्म

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  पुनर्जन्म   -सोमेश शेखर चन्द्र   नरक की अपनी उस जिंदगी से मुक्त हो लिया हूँ मैं और किसी आजाद परिंदे की तरह, आकाश के खुले में,...

 

पुनर्जन्म

 

-सोमेश शेखर चन्द्र

 

नरक की अपनी उस जिंदगी से मुक्त हो लिया हूँ मैं और किसी आजाद परिंदे की तरह, आकाश के खुले में, एक तरफ से दूसरी तरफ, इधर से उधर तथा तिधर से तिधर, गोते लगा रहा हूँ। पृथ्वी पर कितनी जलन थी। घुटन ही घुटन थी वहाँ। जबकि यहाँ चारों तरफ सुकून ही सुकून है और इतनी सारी शुद्ध और ताजी हवा है कि उसे मैं जितना चाहूँ अपने फेफड़ों में भर सकता हूँ। इतना ही नहीं यहाँ मैं, पूरी तरह अपनी मर्जी का खुद मुख्तार भी हूँ। मेरी मर्जी, गाने की करती है तो मैं गाने लग जाता हूँ। नाचने का मन होने पर कूल्हे मटका मटका कर ठुमके, भी लगा लेता हूँ और हँसने का जी करता है तो ठठ्ठे लगा लगाकर हँसता भी हूँ। जबकि मेरी पहले की जिंदगी, किसी ऐसे सजा याफ्ता कैदी की जिंदगी थी जहाँ, मेरा हँसना तो दूर, खुलकर रो लेने तक की मुझे इजाजत नहीं थी। यहाँ तक कि मेरी सांसों तक पर इतना सख्त पहरा था कि एक एक सांस के लिए, मुझे तड़प कर रह जाना पड़ता था, उफ्फ............।

सुनो तो ओ ऽ ऽ ऽ ..........।

अरे यह आवाज कैसी ? किसी गहरी खोह से पुकार लगाती, निहायत ही कमजोर आवाज मेरे कानो से टकराई है और मैं चैक गया हूँ। पृथ्वी से इतनी दूर, आकाश के इस छोर पर, कोई यहाँ पहुँच कैसे सकता है? कहीं मुझे किसी के पुकारने का भ्रम तो नहीं हुआ है या कि मेरे कान ही तो नहीं बज उठे है। नहीं, मुझे कोई भी नहीं पुकारा है। और थोड़ी देर के लिए मैं मान भी लूं कि किसी ने मुझे सचमुच पुकारा है, तो मैं उसकी सुनूं ही क्यों? हुँह पुकार की बात अपने जेहन से झटक कर मैं जिस जगह पहुँचना चाहता था वहाँ के लिए बड़ी तेजी से गोते लगा दिया हूँ।

अरे भई, जरा सुनो तो ऽ ऽ ऽ ऽ । इस दफा जो पुकार मुझे सुनाई पड़ी थी वह काफी तेज तथा स्पष्ट थी। जैसे पुकारने वाला मेरे काफी नजदीक पहुँचकर मुझे पुकारा हो। मुड़कर पीछे की तरफ गौर करने पर मेरी ही शक्ल सूरत का एक दूसरा आदमी, बड़ी तेजी से मेरी तरफ बढ़ा आता मुझे दिखाई पड़ा है। हरामजादा स्साला। उस आदमी को अपने पीछे लगा देख, मेरे जबड़े कट कटा उठे है। दरअसल इस समय मैं, जिस चरम आनंद की अवस्था में पहुँचा हुआ था और अपनी नरक की जिंदगी की मुक्ति का उत्सव मनाने में मगन था उसमें मुझे, किसी भी तरह की दखल बर्दाश्त, नहीं थी, इसलिए, उससे अपना पीछा छुड़ाने के लिए, मैं अपनी स्पीड, काफी तेज कर दिया हूँ। लेकिन मुझसे भी तेज रफ्तार में उड़कर वह थोड़ी ही देर, में मेरे ठीक बगल आ लगा है और मेरे चेहरे पर अपनी नजरे गड़ाकर- बड़ी कुटिलता से मुसकुराया है।

गुस्से से, उसकी तरफ ताक, मैं अपना मुँह, दूसरी तरफ घुमा लिया हूँ। एक तो उसका बीच में टपक पड़ना ही मेरे बर्दाश्त के बाहर हो रहा था ऊपर से वह मुझे देखकर जिस कुटिलता से मुसकुराया था उसे देखकर मैं एकदम से आग बबूला हो उठा हूँ।

क्यों ............? तुमने भी आत्म हत्या कर लिया है?

जितना जल्दी हो, मैं उससे अपना पीछा छुड़ा लेना चाहता था इसलिए उसके पूछने पर मैं उसे कोई जबाब नहीं दिया हूँ और न ही उसकी तरफ ताका ही हूँ। मेरा खयाल था कि मेरी बेरूखी देख, यदि वह समझदार हुआ तो अपने आप मेरा पीछा करना छोड़ देगा। लेकिन यह क्या? उसका मेरा पीछा छोड़ना तो दूर, सरककर वह मेरे एकदम पास सट आया है और पहले से ज्यादा कुटिल होकर मेरे चेहरे पर ताकता मुझसे पूछा है तुमने मेरे पूछने का कोई जबाब नहीं दिया आ ऽ ऽ ऽ ?

हाँ, मैंने भी आत्महत्या कर लिया है लेकिन इससे तुम्हें क्या मतलब। मैं जिस बुरी तरह से उसे घुड़क दिया हूँ दूसरा कोई होता तो उसका, इसके आगे मुँह खोलने की हिम्मत ही नहीं पड़ती लेकिन उसकी बेहयाई की इंतहा देखिए कि, उसपर इसका कोई असर ही न हुआ है।

उम्र तुम्हारी काफी कम है। लगता है किसी लड़की बड़की के चक्कर में फंस गए थे। प्यार में धोखा खाए हुए लगते हो। इस दफा वह किसी खुर्राट की तरह मेरे चेहरे पर ताक मुझे चिकोट खाने की तरह मुझ पर चुटकी लिया था।

तुम हो हद दर्जे के बौड़म.....। मैं तुमसे बात ही नहीं करना चाहता लेकिन तुम हो कि, चिम्कटो की तरह मुझसे चिपकते ही जा रहे हो।

कौन थी वह लड़की जरा उसका नाम गाँव कुछ मैं भी सुनूँ?

ऐसा थेथर और निर्लज्ज आदमी मैं अपनी जिंदगी में इसके पहले कभी नहीं देखा था। जिस कदर मैं उस पर उखड़ कर, उसे बुरी तरह डाट दिया था, उसका भी उस पर कोई असर नहीं हुआ था जैसे उसने कुछ सुना ही न हो।

देखो ओ-ओ मैं एक शादी शुदा आदमी हूँ एक बच्चा है मुझे मैं किसी लड़की वड़की के चक्कर में नहीं फंसा था समझे ए ए ।

ओ ऽ ऽ अब समझा मैं....... बीबी तुम्हारी बदमाश थी........ वह किसी दूसरे मर्द से फंसी हुई थी या तो उसने तुम्हें मरवा दिया है या तुमने खुद ही उसके चलते आत्महत्या कर लिया है किसी लाल बुझक्कड़ सा, असली मतलब बूझकर वह गिरगिटों की तरह अपनी गर्दन हवा में हिलाने लग गया है,

तुम हो हद दर्जे के नीच। तुम्हें मेरी जाती जिन्दगी में यूँ पूछताछ करने की हिम्मत कैसे पड़ रही है। सारी डाट डपट के बावजूद अपनी जाती जिंदगी में उसका जबरन दखल करना मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ था और मैं उस पर बुरी तरह चीख पड़ा था। लेकिन मेरी चीख का भी उस पर कोई असर नहीं हुआ था।

दरअसल कुछ औरतें होती ही है बदचलन....... मर्द रहता है फिर भी दूसरे मर्द से फंस जाती हैं।

लेकिन मेरी औरत बदचलन नहीं थी।

तब जरूर वह कर्कशा रही होगी जीना दूभर कर दिया होगा उसने तुम्हारा और उससे ऊबकर तुमने आत्महत्या कर लिया है।

पत्नी मेरी न तो बदचलन थी, न ही कर्कशा थी, बल्कि मैं तो कहूँगा कि अगर भगवान पत्नी किसी को दे, तो मेरी पत्नी की तरह। बल्कि इस बात को यूँ कहूँ कि दुनिया की सारी पत्नियाँ, मेरी पत्नी की तरह हो जाएँ, तो मर्द जाति ही नहीं, इस पृथ्वी के अस्सी प्रतिशत दुःख दलिद्दर दूर हो जाएँ। शरीर में, जिस तरह पेट से अस्सी प्रतिशत रोगों की उत्पत्ति होती है उसी तरह मनुष्य जाति के अस्सी प्रतिशत दुःख दलिद्दर पत्नी से सम्बन्धित होते हैं, जिसका पेट साफ है समझिए वह अस्सी प्रतिशत रोगों से मुक्त है और जिसकी पत्नी, भली और समझदार है, वह अस्सी प्रतिशत दुःखों से मुक्त हैं। अब मैं अपनी पत्नी के बारे में क्या बताऊँ। आज के युग में जहाँ पत्नियाँ, पतियों के पाँव तक छूना अपनी तौहीन समझती हैं, मेरी पत्नी खा पीकर, जब तक मेरी पूरी देह नहीं दबा लेती थी सोती ही नहीं थी। उसे लाख मना करता था...........यार तुम भी क्या झंझट करती हो रोज रोज, अरे कभी दुःख बीमारी हो तो जो करना है करो, लेकिन अनदिने जो तुम यह सब करती हो सिर्फ मेरी आदत खराब करने के लिए।

देखिए जी, मर्द को, जितना औरत जानती हैं, उतना और कोई नहीं जानता, मर्द खुद अपने को नहीं जानता।

अच्छा बताओ तुम मुझे कितना जानती हो?

आपका चेहरा जिस तरह रोज उतरा रहता है जानती हूँ बाहर झिझोड़ खाकर आ रहे हो और उलझन में हो.......। मैं आपकी उलझन तो दूर नहीं कर सकती, मर्द हो बाहर डहकते हो तो झिझोड़ भी होगी और जब झिझोड़ में आदमी रहता है, उलझन में रहता है, तो उसे एक पार्टनर चाहिए, जो उसके दिमाग की सारी जकड़न ढीला कर दे और वह पार्टनर, पत्नी से बढ़कर दूसरा और कौन होगा?

अरे वाह ........ इस मामले में तुम तो बड़ी अच्छी पकड़ रखती हो, मनोविज्ञान में तुम्हें पढ़ाया गया था क्या?

देखिए जी, जिंदगी की तमाम ऐसी बाते हैं जो न तो किताबों में लिखी मिलती है और न ही क्लासरूम में उन्हे पढ़ाया ही जाता है।

तुमने एकदम ठीक पकड़ा। दरअसल एक तुम ही, हो कि मुझे संभालकर रखी हुई हो नहीं तो दफ्तर में तो वह उठा पटक है कि अगर वहाँ की बात तुम्हें बताने लगूँ तो तुम तो पगला जाओगी।

देखिए यह उठा पटक सिर्फ दफ्तर में ही नहीं है। यह उठा पटक सारी पृथ्वी पर चल रही है, पहले भी चलती थी आज भी चल रही है और आगे भी चलती रहेगी। यह संसार कुरूक्षेत्र है। युद्ध क्षेत्र है। यहाँ का हर जीव, जो इस पृथ्वी पर पैदा हुआ है मरते दम तक, युद्ध ही लड़ता है इसलिए युद्ध से घबराएँ नहीं और घबराने से जान भी नहीं बचने को।

अरे वाह, तुमने तो मेरा दिमाग ही खोल दिया- अब बताइए, इतनी समझदार, बुद्धिमान और निष्ठावान पत्नी को कोई कर्कशा और बदचलन कहे तो कैसा लगेगा? पत्नी के बारे में उसकी बात सुन मेरे जबड़े कटकटा उठे हैं लेकिन मैं कुछ बोला नहीं हूँ जज्ब कर लिया हूँ अपने को।

इतना ही नहीं, दूसरी औरतें घर में कदम रखते ही अपने में केन्द्रित हो जाती हैं। मैं और मेरा पति और मेरा बच्चा। लेकिन पत्नी मेरी कभी भी उस तरह की सोच नहीं रखी। घर में मैं सबसे बड़ा हूँ चार भाई हैं, माँ हैं, पिताजी हैं, खेतीबाड़ी सिर्फ उतनी है कि साल के मुश्किल से तीन चार महीनों के लिए ही अनाज होता है बाकी साल के शेष महीनों में बिना बाजार का मुँह देखे पेट नहीं भरता........। भाई पढ़ रहे हैं उनका खर्चा, लगा सगा, न्योता हकारी, दवा, दारू, गृहस्थी तो भूतखाना है। मड़ार है उसका पेट। झोंकते जाओ, झोंकते जाओ लेकिन पूरा नहीं होगा। और एक क्लर्क की जितनी तनख्वाह होती है, इतना बड़ा बोझ उसके संभालने के बस का भी नहीं होता। देखो ऐसा करो, चलो तुमको घर पहुँचा आते हैं। हम लोग यहाँ रहकर तनख्वाह का ज्यादा हिस्सा खा जाते हैं। तुम वहाँ रहोगी तो कुछ ज्यादा पैसा बचेगा। काफी कतर व्योंत करने पर भी खर्च पूरा न पड़ता देख, एक दिन मैं पत्नी को घर छोड़ आने का मन बना लिया था। दूसरी औरत होती, तो सुनते ही तुनुग जाती, हल्ला गैताल करना शुरू कर देती, लेकिन पत्नी ने मुझे बड़े गत्ते से समझाया था। देखिए जी अकेले आदमी और दो आदमी के खर्चे में ज्यादा फरक नहीं पड़ता, थोड़ा सा ज्यादा लगता है, अब अगर आप मुझे घर भेज देते हैं तो मेरे खाने के अलावे वहाँ कुछ न कुछ दूसरे खर्च लगेंगे ही। और वहाँ कौन अपने खेत का पैदा, रखा हुआ है कि चलकर उसे खाएँगे। दूसरे आप अकेले रहते हैं तो खाने पीने पर ध्यान नहीं देते, कैसे सूखकर काँटा हो जाते हैं आपका दुबला होना मुझे अच्छा नहीं लगता।

ऐसा कहो कि तुम्हें दुबले मर्द पसन्द ही नहीं है।

वह तो हई है कहने का मतलब वही है।

कि औरतों को मोटे मर्द ही पसन्द होते हैं।

अब आप तो मजाक करने लग गए जी।

नहीं नहीं मैं जानने के लिए पूछ रहा हूँ कि औरतों को मोटे मर्द ही पसन्द होते हैं न?

हाँ वह तो होते हैं लेकिन एक बात बताइए, क्या मर्दों को सूखी लवाई जिसमें रस न हो, ए वाली अच्छी लगेगी? पत्नी अपने दाहिने हाथ की तर्जनी, ऊपर उठा, उसे हवा में, दाहिने बाएं हिलाकर और गालों को अन्दर की तरफ खींच, किसी मरगिल्ली औरत का खाका पेश किया था।

नहीं

तब?

लेकिन खर्चा पूरा नहीं होता क्या किया जाए।

ऐसा करिए आप मुझे दो चार महीने के लिए घर छोड़ कर देख लीजिए। अगर मेरे वहाँ रहने से, खर्चा कम हो, तो मुझे गाँव पर रहने में कोई ऐतराज नहीं है और पत्नी को मैं सिर्फ तीन चार महीनों के लिए नहीं बल्कि पूरे साल भर के लिए गाँव पर छोड़ दिया था लेकिन इसको लेकर, उसने मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं किया था। अब भला ऐसी औरत को कोई उल्टा पुल्टा कहे तो आदमी, उसका मुँह नहीं नोच लेगा?

इतना ही नहीं, दूसरी औरतें होती हैं कि, मर्द से फरमाइश पर फरमाइश पेले रखती हैं। सब कुछ जानते हुए भी कि मियाँ को तनख्वाह कितनी मिलती है और खर्च कितना है और बचता क्या है फिर भी जब देखिए, अकेले में, और दोस्त मित्रों के बीच, पड़ोसियों की औरतों के सामने, मियाँ को जलील करती रहती है। देखिए न भाई साहब, उसी दफ्तर में आप भी काम करते है। भाभी जी को आप कैसे सजागुजा कर रखते हैं और एक ए हैं कि, तीज त्यौहार पर भी कहो कि एक अच्छी सी साड़ी लाकर दे दें तो नहीं देते। भरी सभा में जो पत्नी, पति को ताने उताने मारती है वह तो मारती ही है, इसी सब को लेकर वह पति का जीना दूभर किए रखती हैं, लेकिन मेरी पत्नी ने आज तक मुझसे कभी किसी चीज की फरमाइश किया ही नहीं। कभी कभार अगर मैं उसके लिए बाजार से कोई साड़ी ला भी दूँ, तो वह मुझपर उखड जाया करती थी। क्या जरूरत थी इतनी दामी साडी लाने की, अभी घर से पैसे की माँग आ गई तो क्या भेजिएगा?

अंय?

हाँ । अरे भाग्यवान कभी कभार ही सही मुझसे कुछ मांगो तो सही। मेरा भी मन तुम्हें सजाने को ललकता है कि नहीं।

देखिए जी, पहनने ओढ़ने की कोई सीमा है कहीं ? और अभी मैं माँ के घर गई थी तो जो, तीन साडि़याँ मिली थीं अभी तक उनकी तह भी नहीं खुली है।

वह तो है यार, लेकिन तुम मैके जाओगी तो वहीं माँ की दी हुई साड़ी पहनकर, लोग कहे या न कहें, लेकिन सोचेंगे तो हई, और भाभियाँ तो तुम्हारी कह ही बैठेंगी, क्यो ननद जी, मर्द की दी हुई भी तो कभी पहन कर दिखाओ।

कहती है ऐसा नहीं है कि नहीं कहती ।

तब ?

तब क्या, देखो जी ऐसा है कि अगर आदमी दुनिया के कहने पर चलने लगे, तो उसका जीना मुश्किल हो जाए। दुनिया कहती है कहना उसका काम है। मुह बजाने की आदत है दुनिया की। इसलिए मै दुनिया के कहने पर ध्यान ही नहीं देती। दूसरी गुर की बात यह है कि अगर मैं आपकी दी हुई साड़ी पहनकर जाने लगूँ तो साल में जो दो तीन जोड़े माँ देती है वह भी मिलना बन्द हो जाएगी। अभी तो है कि माँ समझती है कि मैं गरीब हूँ कमजोर हूँ इसलिए वह मुझे दो की जगह तीन चार साडि़याँ दे देती है और भाभियाँ भीतर ही भीतर चाहे जो कुड़कुड़ाएँ लेकिन ऊपर से कुछ कहने में वे संकोच करती हैं। अगर मैं अपनी पहनकर जाने लगूँ तो वे तुरन्त माँ का हाथ पकड़ लेगी। बर बिदाई भी इसीलिए मुझे अच्छी मिल जाती है..... अब बोलिए?

अपनी इज्जत भी कोई चीज होती है कि नहीं।

देखिए जी मुझे अपने स्वार्थ से मतलब है इज्जत लेकर मैं चाटूँगी क्या?

मान गया यार तुम्हें।

ऐसा नहीं है कि मेरी पत्नी, घर में दलिद्रों की तरह रहती थी। घर में रात में सोने के लिए नाइटी थी उसके पास। रात में वह उसे पहनती थी और दिन में जब घर में रहती थी तब भी नाइटी ही पहने रहती थी लेकिन जब शाम पड़ोसिनों में बैठने का समय आता था तो, अपनी झकझकी साड़ी पहन लेती थी और ऐसा बनठन कर लोगों के बीच बैठती थी कि कोई भांप ही नहीं पाता कि हम लोग कितने पानी में है....। अब अगर ऐसी पत्नी के बारे में कोई उल्टी पुल्टी बात करने लगे तो उसके मुँह पर घूंसे न मारे आदमी तो क्या करे।

समझ गया।

क्या समझ गए

बाज औरतें होती ही हैं जिभुली, पति डह बजर कर, जो कुछ लाता है घर में, उसे वे अपनी जीभ दागने में ही उड़ा देती हैं, पति बेचारे को हारकर काबुली पठान से कर्ज लेना पड़ता है और कर्ज लेते लेते उसकी यह हाल हो जाती है कि सूदखोर उसका जीना दूभर कर देते हैं और हारकर उसके पास खुदकुशी करने के सिवा और कोई चारा ही नहीं बचता।

उसकी बात सुनकर मेरी देह जल गई है........ वह सोचता है बाज औरतों की तरह मेरी भी औरत जिभुली थी। अभी तक इसने मेरी औरत को देखा ही नहीं, इतना किफायती, घर सिर्जन औरत शायद ही कहीं देखने को मिले। अब एक छोटी सी बात बताता हूँ। घर की बात है नहीं बताना चाहिए। लेकिन इस समय मुझे कोई भी बात बताने में कोई संकोच नहीं है.......। वह बात यह है कि अपना मुन्ना है न, आखिर है तो वह बच्चा ही। उसे क्या पता है कि मैं किस कसाले में अपना दिन काट रहा हूँ। क्रिकेट का सीजन शुरू होता है तो..बच्चे सुर्र, कबड्डी, लुकाछिपी, उंचवा खलवा जितने भी बिना पैसे के खेल हैं उसे न खेलकर, हर बच्चा सचिन तेंदुलकर और गावस्कर और कपिल देव की तरह क्रिकेट ही खेलना चाहता है। जिधर देखिए, बच्चे तीन ईंटे या तीन लकडि़याँ गाड़कर, विकेट बना लेंगे और बांस की फज्झी या लकड़ी की पट्टी का बैट। बाल चाहे टेनिस का हो, रबड़ का या कपड़े का, लगेंगे सन्न सन्न चैके छक्के उड़ाने। अब बच्चा तो बच्चा, चाहे मेरा हो या दूसरे का। जवानी आने पर जिस तरह यौवन का बुखार चढ़ता है आदमी पर, उसी तरह सीजन आने पर बच्चों पर क्रिकेट का बुखार चढ़ जाता है। बल्कि अब तो सीजन का कोई मतलब ही नहीं रहा। साल भर क्रिकेट का बुखार चढ़ा ही रहता है बच्चों पर। मेरा मुन्ना भी, था तो सिर्फ चार साल का ही, लेकिन उस पर क्रिकेट का बुखार नहीं बल्कि कहिए सन्निपात चढ़ा रहता था। लेकिन उसके सन्निपात को, उतारने की कहीं कोई गुंजाइश ही नही थी। कारण उसका यह नहीं था कि मुन्ना अभी छोटा था और मोहल्ले के सीनियर उसे अपनी टीम में संटने ही नहीं देते थे। बल्कि कारण उसका यह था कि मुन्ना जी टीम में जाते थे तो या तो उन्हें बैटिंग मिलना चाहिए था या बालिंग, फील्डिंग वे किसी भी सूरत में करना ही नहीं चाहते थे। एक दिन मैं अपने दफ्तर से घर लौटा, तो देखा मुन्ना महोदय, अपने तेवर में थे।

क्यों, क्या हुआ मुन्ना बेटे?

मैं आपसे नहीं बोलूँगा।

क्यों भई आप मुझसे खफा क्यों हैं?

मैं नहीं बोलता।

आखिर इन महोदय की भृकुटी क्यों तनी हुई है बात क्या है, पत्नी से पूछा था मैंने।

इन्हें बैट और बाल चाहिए।

अच्छा..........?

क्यों भई आपको बैट और बाल चाहिए?

हाँ, और ग्लब भी और पैड भी।

इसका मतलब आप सचिन तेंदुलकर बनने की ठान ही लिए है।

हाँ मुझे चाहिए।

ठीक है, आपको चाहिए तो ला दूंगा लेकिन आप तो अभी बहुत छोटे हैं। बैट इतना बड़ा होता है और तीन किलो वजन होता है उसका, आपसे उठेगा ही नहीं..... और ग्लब मेरी नाप का होता है उसे कैसे पहनिएगा? थोड़ा और बड़े हो जाइए तो सब कुछ ला दूँगा आपके लिए।

लेकिन मैं तो बड़ा हो गया हूँ यह देखिए, मुन्ना जी मेरे सामने तनकर खड़े हो गए थे और अपने सिर के ऊपर अपना दाहिना हाथ रखकर, मुझे अपने बड़े होने का प्रमाण दे दिए थे...... इतना बड़ा।

थोड़ा सा और बड़ा हो जाइए, ए उंगलियाँ थोड़ा और लम्बी हो जाएँ, तब न इसमें ग्लब पहनिएगा?

मैं समझ गया।

क्या समझ गए आप ?

आप में कुछ लाने का दम ही नहीं है इसीलिए मुझे फुसला रहे हैं।

सुनकर मैं आवाक् रह गया था इतनी छोटी उम्र और ऐसा पकापन।

मुझे ख्याल आया, एक दफा मैं सपत्नीक एक जैन परिवार के यहाँ गया हुआ था उनका डेढ़ दो साल का बच्चा था उस समय वह कटोरी में कोई चीज लिए वह खा रहा था।

मुझे भी थोड़ा दो भई।

नहीं।

थोड़ा सा

नहीं

अच्छा लो यह कलम, इसके बदले थोड़ा सा दे दो....... लड़का मेरे हाथ से कलम लेकर अपनी जेब में रख लिया था। और पहले की ही तरह कटोरी की चीज खाने लग गया था।

दो ओ..........। मैं उससे मांगने के लिए अपना हाथ उसके सामने बढ़ाया था तो केटोरी उसने अपने पीछे कर लिया था।

कलम भी लोगे और दोगे भी नहीं ?

शर्मा जी यह सिन्थेटिक युग है बच्चों का अब सिन्थेटिक ब्रेन होने लग गया है। बच्चे की चालाकी देख जैन साहब ने हँसते हुए कहा था

ठीक कहा अपने जैन साहब।

यह बात आज से दस साल पहले की थी उस समय बच्चों का सिन्थेटिक ब्रेन हुआ करता था तो आज मेरे मुन्ने का कौन सा ब्रेन था। शायद कम्प्यूटर ब्रेन ना?

मुन्ने की बात सुनकर मैं भक रह गया था। मेरा अपना बचपन था तो हमे, अगर बाऊजी से कुछ लेना होता था तो उसके लिए हम लोग नंगाते थे, रोते थे, लोटपोट करते थे और अपना हाथ पांव पटकते थे। बाऊ जी से किसी चीज को हासिल करने का हमारा यह सब अस्त्र हुआ करता था उन दिनों। लेकिन आज के बच्चे, सीधा पौरूष को ही ललकार देते हैं। आपमें लाने का दम ही नहीं है सीधा उस जगह चोट करते हैं जहाँ चोट खाकर आदमी के पास छत से कूद जाने के सिवा दूसरा कोई चारा ही नहीं रहता।

क्यों क्या कहती हो............? दल दल में फंसा मैं, उबरने के लिए पत्नी की तरफ देखा था।

मुन्नू पापा को कोई कभी इस तरह की बात कहता है ? गन्दी बात है न।

जाहिर था पत्नी भी मुन्ने की बात से विकल्पहीन हो चुकी थी।

नहीं, पापाजी मुझे कुछ भी लाकर नहीं देते........ मां को अपना साथ देता न देख, मुन्ना जी थोड़ा नरम पड़ गए थे।

अच्छा ठीक है मैं लाऊँगा, आपके बैट, बाल, ग्लब, पैड सबकुछ।

क्यों जी, कहाँ से लाइएगा यह सब...... चार पाँच सौ से कम थोड़ो लगेगा सब में....... और ए अभी, उस सबके, लायक हैं भी, यह भी देखा है आपने?

बात तो तुम ठीक कहती हो लेकिन इतनी बड़ी चोट........... यह कौन सहेगा?

आपको चोट बड़ी जल्दी लगती है जी। अभी आप लाने को कह दिए, अब जब तक इन्हें मिल नहीं जाएगा नाक में दम किए रखेंगे।

तो तुम्हीं बताओ क्या किया जाए.......?

मोहल्ले के बच्चे जो हैं न उन्हीं से कह सुनकर इन्हें भी साथ में लगा दीजिए खेलेंगे सब के साथ।

ठीक है....... पत्नी की सलाह मुझे जॅची थी।

दूसरे ही दिन मैं मुन्ना जी को, मोहल्ले के बच्चों से कह सुनकर, उनके साथ लगा दिया था। लेकिन मुन्ने ने मेरा सारा जोड़ धटाव ही फेलकर दिया था। अब किसी को सोर्स सिफारिस लगाकर, अगर कहीं घुसेड़ भी दिया जाए, तो उसे सबकी सहकर ही रहना होगा न। बिनती अरदास, बहलाना फुसलाना, बड़ा ही कमजोर अस्त्र होता है। सिफारिसी को जोड़ जुगाड़ लगाकर किसी तरह, जगह तो मिल जाती है, लेकिन अगर वह कहे कि मैं यहाँ अपनी ही शर्त पर रहूँगा, तो यह कभी संभव है क्या? मुन्ना जी को मैंने यह बात पहले ही समझा दिया था कि, देखो मुन्ने, अब तुम्हें टीम में जगह मिल गई है। इसे संभालने के सिर्फ दो ही गुर है पहला तो यह कि अपने सीनियरों को खुश रखो और दूसरा यह कि अपने खेल को पुख्ता करो। जब तुम अपने खेल में पुख्ता रहोगे तो तुम्हें लोग अपनी अपनी टीम में लेने के लिए दौड़ेगे। मुन्ने का स्थान टीम में पक्का रहे, इसके लिए मैंने टीम के सीनियरों को भी समझा दिया था, देखो बेटे, मुन्ना तुम्हारा छोटा भाई है अगर यह कोई बदमासी करता है तो इसे तुम एकाध रहपट दे भी दोगे तो मुझे कोई एतराज नहीं होगा......। मुन्ने को भी मैं खरदास दिया था कि भइया लोग, जैसे कहे इनकी मानना, ठीक है न? उस समय तो मेरी बात मुन्ना भी मान गया था और टीम के सीनियर भी मान गए थे, लेकिन मुझे क्या पता थी कि सीनियर लड़के, मेरी पहली बात भूलकर, दूसरी ही बात पकड़ लेंगे। यानी कि मुन्ना को अपना छोटा भाई मानकर उसे अपने साथ रखने की बजाए, वे अपने बड़े होने के अधिकार का दुरूपयोग कर बैठेंगे.......।

लड़कों ने वही किया....... मुन्ना कोई बदमासी किया और बस, उसे वे धरकर पीट दिए थे। लड़कों से पिटने के बाद, मुन्ना रोता हुआ घर आया था। दोनो गालो पर उसके पाँचों उंगलियों के लाल लाल बर्रोहे स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।

क्या हुआ मुन्ने?

क्या हुआ बेटे.........? मुन्ना बुरी तरह पिटकर आया हुआ था इसलिए वह बिना स्टाप के जोर जोर से चिल्लाए जा रहा था।

क्या हुआ बेटे..... मेरे बच्चे, अरे यह किसने मारा......? पत्नी, मुन्ने के गाल से उसका हाथ हटाकर देखा, तो उसके दोनो गालों पर पड़ी उंगलियों के बर्रोहे देख वह बौखला गई थी.......। देखो जी, मुन्ने के गाल..... हाय हाय, किसने मारा मेरे बेटे को। मइया अआ ऽ ऽ ऽ ऽ.......ने ए ऽ ऽ ऽ ।

भइया ने, कौन भइया ने?

वही जिनके साथ पापा मुझे छोड़ आए थे खेलने को। उ ऊ आ ऽ ऽ ऽ ऊ उ ऽ ऽ आ ऽ ऽ ....... माँ की सह पाते ही मुन्ना महोदय का रूदन और तेज हो गया था.......।

ठीक है चलो मैं देखती हूँ किसने मारा तुम्हें, जब तक मैं उसे लोथाड़ लोथाड़ कर पीट नहीं लूंगी मेरा कलेजा ठंडा नहीं होगा।

हालांकि मुन्ने का पिटना मुझे भी अच्छा नहीं लगा था लेकिन मैं ढेर सारे जोड़ घटाव करके अपने को शान्त कर लिया था। अब बच्चे हैं, खेल रहे हैं तो उनमें आपस में कुछ न कुछ झगड़ा लड़ाई, मारपीट तो चलती ही रहती है। बच्चों को लेकर कोई लड़ने जाए तो यह उसकी बेवकूफी ही होगी....। दूसरे मुन्ने को रहना है इसी मोहल्ले में और खेलना भी है यहीं, अब उसे लेकर कोई बवाल करूं तो मुन्ने को कोई सटने देगा अपने साथ? तीसरे अपने पास इतनी समर्थ नहीं है कि मुन्ने के लिए बैट, बाल, ग्लब विकेट और टेनिस और हाकी सबका जुगाड़ कर सकूँ। मान लिया कि कहीं से काढ़ मूसकर, वह सब जुगाड़ भी कर लिया जाए, तो मुन्ना जी के साथ खेलने के लिए तो यही बच्चे रहेंगे ना। इसी तरह की ढेर सारी बातें सोचकर मैं अपने को सहेज लिया था.......। इतना सब बर्दाश्त कर लेना ही ठीक है। लेकिन पत्नी, बाप रे, बाप, उस दिन उसका रूप देख मैं दंग रह गया था। साक्षात चंडी का रूप धर लिया था उसने ......। कछाड़ बगल में खोंस, मुन्ने का हाथ पकड़, चेचुवाते घसीटते उसे, वह घर से निकल पड़ी थी।

कहाँ जा रही हो?

आप चुप करिए जी....... अब मैं उस माई के लाल को बिना पीटे नहीं रहूँगी।

अरे तुम पागल हो गई हो क्या.....? इतनी देर में मोहल्ले के सारे बच्चे मेरे घर के सामने आ इकट्ठे हुए थे और वहाँ अच्छा खासा मजमा लग गया था......। मैं झपटकर पत्नी का हाथ पकड़ उसे रोका था कहाँ जा रही हो?

आप मुझे मत पकडि़ए इस समय, वे लोग होते कौ ऽ ऽन हैं मेरे बच्चे को मारने वाले।

अरे सुनोगी भी।

नहीं मैं आज आपका कुछ नहीं सुनूगी..... पत्नी क्रुद्ध शेरनी की तरह मेरे सामने तनकर खड़ी हो गई थी, वे लोग मेरे बच्चे को खिला रहे हैं कि पहना रहे हैं कौन होते हैं वे इसे मारने वाले.........?

माँ, मारने के लिए उस दिन पापा ने ही कहा था उन लोगों को। मुन्ना जो अभी तक भों भों चिल्लाए जा रहा था, माँ का उग्र रूप देखकर चुप हो गया था और कुशल राजनेता की तरह राजनीति पर उतर आया था।

अंय, क्या कहा तुमने?

पापा ने ही कहा था कि मुन्ना को तुम लोग पीट दिया करो।

मुन्ने की बात से क्षणभर में ही सारी राजनीति पलटा खा गई थी और उस दिन मैंने देखा था कि एक माँ, अपने बच्चे के लिए कितना विकराल रूप धर सकती है। सारी मर्यादाएं सारे संबंध, गड्ढे में फेंक, क्रुद्ध शेरनी हो उठती है वह। लेकिन कहावत है जो कुछ भगवान करते हैं अच्छा ही करते हैं........। हुआ यूँ कि जो बच्चे इस कांड पर तमाशा देखने जुटे थे उन्होंने स्थिति की नजाकत भांप लिया था और मुन्ने को अपनी गोंद में उठा, उसे अपनी टीम में बिना शर्त शामिल करने का बचन दे दिए थे, चलो मुन्ने तुम हम लोगों के साथ खेलोगे.... तुम हमारी टीम के कैप्टन बनोगे।

एक माँ अगर अपने बच्चे के लिए सारी हदें पार कर सकती है तो बच्चा, उसकी कमजोरी भी है....... जरा सा किसी ने उसके बच्चे को सहला दुलार दिया तो उसका कलेजा मक्खन की तरह मुलायम भी हो उठता है....।

मुन्ना उस दिन फिर टीम में शामिल हो गया था। चलो एक चांटा खाकर यह परेशानी हमेशा के लिए हल हो गई। मुन्ने की तरफ से निश्चित हो गया था मैं। लेकिन दूसरे ही दिन, सारा बना बनाया खेल, उस लौंडे ने ऐसा बिगाड़ दिया था कि फिर कभी बनने की गुंजाइश ही न रहे। किया उसने यह था कि दूसरे दिन जब वह खेलने गया तो अपने आप फील्डिंग करने लग गया था और बाल जैसे ही उसके पास आई वह उसे लेकर नौ दो ग्यारह हो गया था और वहाँ से भागकर घर पहुँचा था और खटिया के नीचे जाकर छुप गया था। अब भला, उसकी इस बेअदबी को बच्चे कहाँ बर्दाश्त करने वाले थे। घेर लिया था उन्होंने मेरा घर और सबके सब, बाल से ज्यादा, मुन्ने को खोज निकालने पर उद्यत थे। वह लड़का, जो उस दिन मुन्ने को चांटा मारा था और डर के मारे हम लोगो के सामने पड़ने से कतराता था उसे तो जैसे अपनी दांव मिल गई थी।

क्या हुआ, तुम लोग यहाँ क्यों मछेहर लगा रखे हो?

मुन्ना हम लोगों का बाल लेकर भाग आया है आंटी जी।

कहाँ ?

घर में, अन्दर ही यहीं कहीं छुपा बैठा हुआ है।

ठीक है तुम लोग रूको मैं देखती हूँ।

पत्नी मुन्ना को तलासने, कमरे में गई थी तो उसके पीछे पीछे, सारे बच्चे भी भीतर घुस गए थे। मुन्ना बाल लिए दिए खटिया के नीचे छुपा बैठा था, पत्नी जानती थी मुन्ना कहाँ है लेकिन वह आना कानी करती उसे खोज रही थी।

देखिए आन्टी यहाँ छुपा है.....।

क्यों मुन्ने ........ बाहर निकलो ओ ऽ ऽ ।

नहीं निकलूंगा।

नहीं निकलूंगा माने, रूको अभी मैं मार मारकर तुम्हारा धुर्रा बिगाड़ती हूँ।

नहीं निकलूंगा मुझे बाल चाहिए।

पहले तुम बाहर निकलो।

नहीं निकलूंगा....।

मैं दूर खड़ा सारे नजारे देख रहा था। लो और चढ़ाओ उसे माथे पर. बनाओ डकैत उसे......, गुस्सा भी लग रही थी मुझे और खुशी भी हो रही थी। अब भोगो, उस दिन तो तुमने मुझ पर भी हमला बोल दिया था, भोगो उस फल को।

क्यों...... मुन्ने को इसी तरह बनाओगी.....? जब सब बच्चे मेरे घर से चले गए थे तो पत्नी से मैंने अकेले में पूछा था।

देखिए जी, आपकी तो सारी चिढ़ बस मुन्ने से है आप थोड़ा सा दिमाग से नहीं सोंचते बस अंधे भैंसे की तरह जिधर चले चल पड़ते हैं....। मैं फिर बुरे फंस गया था, इतनी छोटी सी बात मैं क्यों भूल गया था कि माँ अपने बच्चे के बचाव के लिए सारे नियम कानून ताक पर रख देती है।

मैं तुमसे झगडा नहीं करता लेकिन बच्चे की यह आदत ठीक नहीं है और सबसे खराब बात यह है कि जब वह गलती करता है तो हम लोगों को उसका साथ नहीं देना चाहिए इससे वह बिगड़ जाएगा।

मैंने कब कहा जी कि उसकी यह आदत ठीक है आप समझते हैं कि मैं उसे बचा रही हूँ?

और क्या है यह?

आप तो सारी बातें, बस चाहिए और नहीं चाहिए पर रखकर सोचते हैं। अरे यह बात तो मैं भी जानती हूँ कि ऐसा नहीं होना चाहिए।

जब जानती हो तो फिर क्यों ऐसा करती हो?

देखिए जी, चाहे बच्चा हो, बड़ा हो, चाहे वह साधू संत हो, या कोई फकीर औलिया ही क्यो न हो सब को अपने पहचान की चाह होती है। अपने खुद के होने की चाह होती है। अब इस चाह में उसकी अपनी इच्छित वस्तुएँ भी शामिल हैं। जब किसी को अपनी पहचान नहीं मिलती तो उसमें चोरी करने, ले भागने की प्रवृत्ति आ जाती है।

लेकिन सबकी चाह पूरी ही हो सबको अपनी पहचान मिले ही यह भी तो संभव नहीं है।

नहीं है इसीलिए तो वह धूर्तई और लै भगववल करता है।

तो तुम मुन्ने का यह काम सही ठहराती हो उसने जो किया ठीक किया, अपनी पहचान बनाने के लिए किया।

नहीं। जो किया उसने वह गलत किया लेकिन अपनी पहचान के लिए उसके पास बाल होना चाहिए।

लेकिन इस होना चाहिए का भी कहीं अन्त है?

नहीं है, लेकिन कम से कम की भी तो एक नाप है कि नहीं, एक मात्रा एक राशि तो होनी चाहिए।

होनी चाहिए।

और वह राशि यही है।

इसीलिए तो मैंने उस दिन तुमसे कहा था कि मुन्ने के लिए मैं बैट बाल ला देता हूँ।

आप इस बारे में चिंतित न होइए जी मैं सब ठीक कर लूंगी।

ठीक है ठीक कर लोगी तो करो और मैं अपने पांव पटकता वहाँ से हट लिया था।

दूसरे दिन जब बच्चे रोज की तरह अपना बैट बाल लेकर क्रिकेट खेलने जुटे, तो पत्नी घर के बाहर मुन्ने की खटोली डाल, ऊन का गोला और सलाई लेकर स्वेटर बुनने बैठ गई थी। थोड़ी ही देर मे एक बाल आकर पत्नी की पीठ पर गद्द से बैठ गई थी..। पत्नी को जोर की चोट जरूर लगी थी लेकिन अपने उद्देश्य में वह सफल हो गई थी........।

आन्टी जी बाल दे दीजिए, बच्चे पत्नी के पास आकर उससे अपने बाल के लिए घिघियाए थे।

देखो, बाल खेलना है तो जाकर किसी मैदान में खेलो यहाँ बाल किसी को भी लग सकता है देखो तुम्हारा बाल मुझे लगा ना, यह देखो। बाल तो पत्नी को लगा ही था इसको लेकर बच्चे अपराध बोध से ग्रस्त थे।

नहीं लगेगा आन्टी जी।

ठीक है अब अगर बाल लगा मुझे, तो मैं तुम्हारा बाल नहीं दूंगी......।

ठीक है आन्टी जी नहीं लगेगा....।

लेकिन बाल तो फिर भी लगना था और वह फिर उसे लगा। चूंकि लड़के शर्त हार चुके थे इसलिए पत्नी ने बाल रख लिया था...।

देखा न आपने... मुन्ने के लिए बाल हो गया न।

क्यों तुमने कोई जबाब नहीं दिया? वह मेरे चेहरे की तरफ देख, भेद भरी मुस्कान बिखेर मेरे जबाब की प्रतीक्षा करने लगा है

नहीं तुम जैसा सोचते हो मेरी पत्नी वैसी नहीं थी वह बड़ी घर सिर्जन और समझदार औरत थी।

अब समझा।

क्या ऽ ऽ ऽ ऽ ?

तुम अवसादग्रस्त रहा करते थे डिप्रेसन था तुम्हें। यह बीमारी आजकल महामारी की तरह फैल रही है तनाव की बीमारी है यह ।

नहीं मुझे तनाव की भी बीमारी नहीं थी। मैं आसन प्राणायाम करता था सहज योगी था मैं। मुझे वह सब बीमारी कभी नहीं हुई।

तब तुमने ऐसा क्यों किया?

राज की बात है यह .......... अपने राज को और गहरा करने के लिए मैं अपनी गर्दन टेढ़ी करके मुस्कुराया था।

जरा मैं भी सुनूं- तुम्हारा वह राज।

तुम मेरा पीछा नहीं छोड़ोगे न ?

नहीं

नहीं छोड़ोगे, यह बात मैं तुम्हारी चिक्कटई देखकर ही समझ गया। समझ गया हूँ मैं कि तुम कितने चिक्कट हो।

ठीक है वही सही, लेकिन अब बता भी दो।

राज की बात यह है कि मैं आत्महत्या करके लोगों को ऐसी स्थिति में डाल देना चाहता था कि वे जिन्दगी भर अपने किए का फल भोगे।

ओ ऽ ऽ ओ अब आई बात मेरी समझ में। तुम्हारी योजना यह थी कि तुम खुद आत्महत्या करके मर जाओ और खून के जुर्म में दूसरे पकड़े जाएँ और उन्हें फांसी हो या सारी जिन्दगी जेल में चक्की पीसें, यही न?

नहीं, वह नहीं, मैंने आत्महत्या इसलिए किया कि वे चुहाड़ लोग, जो दिन रात सिर्फ चुहड़पन करते हैं जिनके चुहड़पन के कारण मेरी जिन्दगी नरक हो गई थी वे अपराधबोध की आग मे इस तरह सारी जिन्दगी जलें, आत्मग्लानि से इस कदर भीतर ही भीतर सुलगें कि एक दिन वे विक्षिप्त की अवस्था में पहुंचकर मेरी तरह जहर खाकर आत्महत्या कर ले।

ऐसा आ ऽ ऽ ऽ ..... वह मेरे चेहरे पर देख, बड़ी कटखनी हँसी हँसा था- तो ऐसा कहो न, कि तुमको लोगों ने इतना त्रस्त कर रखा था कि तुम उसे बर्दाश्त नहीं कर पाए थे इसलिए तुमने आत्महत्या कर लिया।

तुम हो हद दर्जे के बेवकूफ। मैं कह कुछ रहा हूँ और मतलब उसका तुम कुछ और ही निकाल रहे हो। मैं कह रहा हूँ कि मैंने आत्महत्या इसलिए किया कि वे चुहाड़ लोग अपने किए के पश्चाताप से और अपराधबोध से इस कदर ग्रस्त हो जाएँ कि वे पगलाइले सड़क पर घूमें।

ओ ऽ ऽ समझ गया ..... कब किया तुमने यह सब।

कल शाम को ही ......।

तब तो वे लोग इस समय तक, जरूर अपराधबोध से बिलबिला रहे होंगे।

बिलबिलाना ही है उन्हें....... इतनी देर में, मेरे मरने की खबर कब की, उन लोगों के पास पहुँच चुकी होगी।

आप तो बड़े दिलचस्प आदमी है महराज, लोगों को दंड देने की बड़ी नायाब तरकीब ढूंढ़ निकाला आपने। मेरा तर्क सुनकर वह बड़े जोर से हँसा था।

अच्छी तरकीब नहीं है यह?

सचमुच बड़ी नायाब तरकीब है यह। आपकी बुद्धि की दाद देता हूँ मैं लेकिन जरा सुनूं तो वे लोग क्या किए थे आपके साथ।

अब वह किस्सा बड़ा लम्बा है बताने लगूँगा तो बड़ी देर हो जाएगी। इस समय जितना जल्दी हो मैं उन्हें तड़पता हुआ देखना चाहता हूँ अपना माथा कूटते, और बाल नोंचते देखना चाहता हूँ।

फिर भी ........... संक्षेप में ही थोड़ा सुनूं तो। नहीं सुनूंगा तो मेरा दम निकल जाएगा।

किस्सा संक्षेप में यह है कि मैं चिरंतर के यहाँ किरानी था।

वह तो बड़ी अच्छी कम्पनी है।

जानते हो?

जानता ही नहीं बल्कि मैं भी उसमें काम किया हूँ।

ओ ऽ ऽ तब तो तुम गदाधर बाबू को जरूर जानते होंगे?

जानता हूँ

और कपिला को भी।

भला जानूंगा क्यों नहीं उसे

मैं दोनों के साथ स्टोर में था। नौकरी आज कल कितनी दुस्प्राप्य है तुम तो जानते ही हो और वह कैसे मिलती है यह भी तुम्हें पता होगी।

जानता हूँ

बड़ी सिफारिश, दौड भाग के बाद, मुझे वहाँ नौकरी मिली थी और वह भी इसलिए कि जिनके जरिए मुझे नौकरी मिली थी वे थे चीफ इंस्पेक्टर, चिरन्तर वालों की चुटिया हमेशा इंस्पेक्टर साहब की मुट्ठी में रहती थी, इसीलिए उनके कहने पर वे लोग मुझे नौकरी दे दिए थे।

यह बात तो है सिफारिश भी उसी की चलती है आजकल, जिसके हाथ में कम्पनी वालों की नकेल होती है...... खैर तब क्या हुआ?

हुआ यूं कि जिन्होंने मुझे नौकरी दिलवाया था उन बेचारे का हार्ट फेल होकर मौत हो गई...... उनके मरते ही गजाधर बाबू और कपिला की कुचालें शुरू हो गई थी।

उनका कोई लगा सगा रहा होगा जिसे वे तुम्हारी जगह भर्ती करवाना चाहते रहे होंगे।

नहीं बात ऐसी नहीं थी दरअसल वे थे ही बड़े दुष्ट, नीच थे वे।

तब?

उन लोगों ने स्टोर का सारा काम मेरे जिम्मे डाल दिया था उनके अपने भी काम। खुद साले दिन भर घूमे और गप्पे मारें और मैं खटते खटते मरता रहूँ। खैर, अगर बात इतनी तक होती तो मैं किसी तरह इसे झेल जाता लेकिन वे इतने निकृष्ट थे कि, मेरी छोटी छोटी गलतियां, तुरंत बास के सामने ले जाकर रख दें। अब तुम्हीं बताओ, तीन तीन आदमी का काम, अगर एक आदमी पर लाद दिया जाए और वह भी स्टोर का काम, जहाँ कहीं से माल आ रहा है तो उसे गिनकर लो, किताब में चढ़ाओ, रखवाओ, दूसरी तरफ सामान लेने वालों की भीड़, और सबके सब जैसे घोड़े पर सवार हों। उन्हें उनका सामान तुरंत चाहिए, गिनकर उन्हें सामान दो, रजिस्टर में चढ़ाओ, बिल चेक करो, पास करो, उफ्फ स्टोर मे इतना काम कि सांस लेने की फुर्सत नहीं और रकम रकम के काम, जब इस तरह आदमी बाई में काम कर रहा हो, तो गलतियां तो होगी ही, मुझसे भी गलतियाँ होती थी और ऐ साले काम धाम कुछ करे नहीं, दिनभर बैठकर गप्पे मारें और मेरी गलतियां खोजें.... और मिलते ही, उसे बास के सामने ले जाकर रख दें.......। हालांकि बास यह बात जानता था कि मैं पूरी निष्ठा और मेहनत से काम करता हूँ लेकिन रोज रोज, अगर किसी के कान भरते रहो और उसे यह बताते रहो कि इस आदमी की नीयत ठीक नहीं हैं और उसके सबूत में उसकी गलतियाँ उसके सामने रखते रहो तो सुनने वाला कब तक निष्पक्ष रह सकता है, और वह भी उस स्थिति में, जब वह, दूसरे पक्ष को बुलाकर, उससे पूछे नहीं कि भई, ऐसी शिकायत मुझे मिल रही है बात क्या है? वे लोग उधर से बास का कान भर कर बाहर आते और इधर बास मुझे अपने चैंबर में बुला लेता।

क्यों तुम्हें नौकरी नहीं करनी है क्या.......?

करनी है सर।

करनी है तो ऐसे ही करोगे....... इसी तरह दो की जगह पांच लिखोगे?

नहीं सर, गलती हो गई...... आगे से ध्यान रखूंगा।

आप उन लोगों की चिकटई बास से नहीं बताते थे?

देखो यार, जिस तरह की फटेहाली से मैं गुजर रहा था उसमें नौकरी के बगैर मैं जिन्दा नहीं रह सकता था। मैं ही नहीं मेरा पूरा परिवार ही उसी पर निर्भर था। मैं डरता था कि अगर मैं उन लोगों की, बास से शिकायत करूंगा कि वे लोग दिन भर कोई काम नहीं करते, सारे स्टोर का काम एक अकेले मुझ पर लाद दिए हैं तो वे लोग हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ जाएंगे। इतना मैं उनकी अदब करता हूँ इज्जत करता हूँ तब तो वे लोग अपनी दुष्टता से बाज नहीं आ रहे हैं कहीं अगर मैं उनकी शिकायतें करना, शुरू कर दूं, तो वे लोग तो पूरी तरह मेरे दुश्मन ही बन जाएंगे। और सच्ची बात तो यह है कि जो कमजोर होता है उसका कोई नहीं होता और नहीं उसकी कोई सुनता ही है और उससे भी बड़ा सत्य तो यह है कि अपने अस्तित्व का भय, आदमी को बड़ा निरीह बना देता है और निरीह के पास दीनता, रोना, गिड़गिड़ाना और खीसे निपोरना जैसे अस्त्र, इतने कमजोर और बेअसर के होते है कि उनसे वह अपनी रक्षा नहीं कर पाता।

अगर आदमी थोड़ा सा निडर हो जाए तो वह अपनी रक्षा कर लेगा।

लेकिन कमजोर निडर होगा कहाँ से? अपनी उसकी कोई ताकत तो होती नहीं। दूसरे भी उसकी मदद नहीं करते। कमजोर शुरू से आखिरी तक, हर तरह से कमजोर ही होता है।

ठीक कहा तुमने।

लेकिन इतना कमजोर होने के बावजूद, जब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ था तो एक दिन स्टोर की दिनभर की सारी स्लिपें, रजिस्टर और लेजर ले जाकर बास के सामने पटक दिया था देखिए सर आप ही देख लीजिए। सुबह से लेकर रात ग्यारह बारह बजे तक मैं अकेला ही खपता रहता हूँ...... स्टोर का सारा काम उन लोगों ने मुझ पर लाद दिया है कहीं एक जगह भी दिखा दीजिए जो उन लोगों ने कुछ किया हो।

तो बास ने क्या कहा?

देखो कमजोर केचुवा होता है और लोग उसे केचुवा ही समझते हैं, वे जानते है कि केचुवा जमीन पर रेंगता है और मिट्टी खाता है और छू देने पर सिकुड़ जाता है...... कमजोर के लिए लोगों के दिमाग में एक अलग फ्रेम ही होता है- वे जानते हैं कि यह ऐसा ही है और ऐसा ही रहेगा। दीनता और याचना और निसहायता ही उसकी नीयत है। ऐसे मे अगर वह कहीं तनकर खड़ा हो जाए, तो लोगों को बड़ा अटपटा लगता है, बुरा लगता है। वे यह नहीं सोचेंगे कि यह तना क्यों, वे यह सोंचेगे कि यह तन कैसे गया......? यह जमीन पर रेंगने वाला केचुवा तन कैसे गया। वही मेरे साथ भी हुआ था। मैं तो गया था बास से अपना दुःखड़ा रोने, लेकिन उसने, उसे दूसरी तरह से ही ले लिया था।..... मेरी बात थोड़ी देर तक उसने बड़ी आजिजी से सुना था उसके बाद उसने मेरे सारे रजिस्टर और कागज अपनी टेबुल पर रखवा लिया था।

ठीक है तुमसे नहीं होता है न काम ? मै जानता था तुमसे होगा भी नहीं। उस बुड्ढे की बात मानकर और तुम्हारी गरीबी पर तरस खाकर मैने तुम्हें रख लिया था...... जाओ कल आकर अपना हिसाब ले लेना।

फिर ?

फिर क्या, उसका निर्णय सुनते ही मुझे चक्कर आ गया था और लगा था जैसे मेरी देह का सारा खून ही सूख गया है।

तब..........

तुम्हें मजा आ रहा है न लेकिन मुझ पर क्या गुजरी थी उस समय मैं ही जानता हूँ।

मैं समझ गया उसने तुमको नौकरी से निकाल दिया और तुमने नौकरी छूटने के गम में आत्महत्या कर लिया।

तुम हो यार हद दर्जे के बेवकूफ, एकदम बेहूदा..... लबर लबर आगे ही दौड़ते रहते हो ।

ठीक है बताओ क्या हुआ?

जब बास ने सारे रजिस्टर, फाइलें अपने पास रखवा लिया और मुझे, दूसरे दिन आकर अपना हिसाब ले लेने को कह दिया था तो उसे सुनकर मेरी सारी देह घुमरने लग गई थी। अपने को संभालने के लिए मैं दीवाल का सहारा लेकर किसी तरह अपने को गिरने से बचा लिया था। और जब थोड़ी देर वही रूक कर अपने को थोड़ा संयत कर लिया था तो झपटकर बास के पांव पकड़ लिया था।

सर मैं मर जाऊँगा सर अगर आपने मुझे नौकरी से निकाल दिया तो मैं मर जाऊँगा। मेरी बीबी और माँ और बहन और भाई सब मर जाएंगे सर, मैं बास के पांव पकड़ बों बो पूकाफाड़ रो पड़ा था। मेरा रोना सुनकर आफिस के कइयों लोग बास के कमरे में दौड़कर पहुँच गए थे।

गदाधर बाबू और कपिला भी?

नहीं वे लोग चले गए थे। वे नहीं थे उस समय दफ्तर में।

तब क्या हुआ?

लोगों ने काफी कह सुनकर बास को किसी तरह मना लिया था और मेरी नौकरी बच गई थी

फिर क्या हुआ?

यह बात दूसरे दिन गदाधर बाबू और कपिला को मालूम हुई। किसी ने उन्हें नमक मिर्च लगाकर सुनाया था कि शर्मा ने, कल बास से, आप दोनों की शिकायत किया था कि आप लोग स्टोर में कोई काम नहीं करते दिनभर गप्पे लड़ाते है और घूमते हैं।

तब..........।

नीच की पहचान क्या है जानते हो?

नहीं।

नीच जो होते हैं न, वे ऊपर से काफी पालिस्ड होते हैं लेकिन भीतर उनके कांटे ही कांटे भरे होते हैं। विष बुझी इतनी विषैली गुर्चियां उनमें होती हैं कि वे दिनभर, सिर्फ दूसरों को नुकसान पहुंचाने और बिगाड़ने में ही जुटे रहते हैं। यही उनकी प्रकृति हैं, उनके जीने का आसन है यह। भीतर उनके इतनी गांठें और गुर्चियां होती हैं इतने व्यूह होते हैं कि उन्हें समझ पाना मुश्किल होता है। नीचता और दुष्टता उनकी नस नस में दौड़ता है। दूसरे दिन मैं आफिस में आया तो देखता हूँ गदाधर बाबू और कपिला दोनों, बड़े मनोयोग से स्टोर के काम में जुटे हुए हैं और मुझसे बड़ा आत्मीय होकर और हँस हँसकर बातें कर रहे हैं......। उनका वह व्यवहार और आत्मीयता देख मैं बड़ा प्रसन्न हुआ था...... चलो जो कुछ कल हुआ अच्छा ही हुआ।

क्यों......... शर्मा जी आपको हम लोग बड़ा तंग किए न?

गदाधर बाबू मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ..... मैं आपके पांव पकड़ता हूँ। कल मेरे दिमाग में पता नहीं कैसा फितूर भर गया था कि बास से मैंने आप दोनों की शिकायत कर दिया था.........।

अच्छा आ ऽ ऽ क्या शिकायत कर दिए थे?

अब छोडि़ए उस बात को गदाधर बाबू, मैं आपके पांव पकड़ता हूँ मैंने जो किया उसका फल भी तुरंत ही मुझे मिल गया था........।

क्या फल मिल गया जरा मैं भी तो सुनूं?

बास ने मुझसे सारे रजिस्टर और फाइलें लेकर अपने पास रख लिया था और कहा था कल आकर अपना हिसाब ले लेना।

फिर ?

फिर मैं बास से बहुत रोया गिड़गिड़ाया आफिस के दूसरे लोग भी बहुत बिनती किए तब जाकर उन्होंने मुझे माफ किया।

आपने हम लोगों की क्या शिकायत किए थे जरा वह भी तो सुनाइए?

गदाधर बाबू अब आप भूल जाइए उस बात को। लीजिए यह आपका जूता है न निकाल कर जितने जूते मनकरे, उतने मेरे गालों पर मारिए मुझसे जो गलती हुई है उसका दंड दीजिए।

अरे भाई जरा सुनूं तो आपने क्या कहा था बास से?

मैंने कहा था, गदाधर बाबू कि, आप और कपिला बाबू कोई काम नहीं करते, सब मेरे ऊपर लाद, दिन भर गप्पे मारते हैं और घूमते हैं।

गदाधर बाबू यह सब बातें मुझसे, बिना अपनी आंखे उठाए, बिना मेरे चेहरे पर देखे, सामने खुले रजिस्टर में इन्ट्रियाँ करते पूछते जा रहे थे। उनका स्वर काफी विषैला था।

तब क्या हुआ?

गदाधर बाबू अब आप मुझसे कुछ पूछिए नहीं मुझे बस दंड दीजिए, मेरे किए की सजा दीजिए

मैं क्या सजा दूंगा शर्मा जी आपको......। मैं खुद, अपने किए पर शर्मिन्दा हूँ मैं ही आप से क्षमा चाहता हूँ। आपके साथ सचमुच अन्याय हुआ है हम लोगों को ऐसा नहीं करना चाहिए था।

नहीं कपिला बाबू...... आप लीजिए जूता और मुझे जुतिया दीजिए, लेकिन ऐसा मत कहिए.... मैं कपिल के पांव से उसका जूता निकाल अपने गाल पर ठाप ठाप दो तीन जूते मारा था....।

अरे यह क्या कर रहे हैं आप?

नहीं, जब तक आप दोनों मुझे माफ नहीं करिएगा मैं अपना मुँह पीटता ही रहूँगा।

ठीक है दीजिए मेरा जूता, माफ कर दिया आपको, बड़ी धूर्त हँसी हँसा था कपिला।

लेकिन जानते हो असली नीच की यही पहचान है, तुम अपनी तरफ से चाहे जितना भी निहोरा कर लो, अपना कलेजा निकालकर उनके सामने रख दो लेकिन वे डसेंगे ही और डसेंगे तो इसलिए नहीं कि डंसकर ही उनका कलेजा ठंडा होगा बल्कि इसलिए कि डंसना ही उनकी प्रकृति है, उनका भोजन है किसी को क्षमा करना वे जानते ही नहीं है।

फिर क्या हुआ?

उस दिन से वे लोग मेरे साथ बडे अच्छे से पेश आने लगे थे। दो दिन बीता, चार दिन बीता दस दिन बीता मैं समझा मामला शान्त हो गया है लोगों ने मुझे माफ कर दिया है, उनके व्यवहार में कहीं कोई तल्खी या कड़ुवाहट नहीं थी। सब कुछ एकदम सहज रूप से चल रहा था, कि एक दिन अचानक बास ने मुझे अपने चैंबर में बुला लिया था।

जी सर।

यह बिल देखो, मेरे सामने उसने एक भुगतान किया हुआ बिल सरका दिया था।

जी सर।

और यह भी, दूसरा एक और बिल उसने मेरे सामने बढ़ाया था।

जी सर।

इन बिलों के सामान स्टोर में आये है?

आये हैं सर।

तुमने खुद रिसीव किया था?

जी सर...... कहने को तो कह दिया था मैंने, जी सर, लेकिन फिर मुझे ख्याल आया था कि उस दिन, कपिला बाबू ने बिल और चालान मेरे सामने लाकर रख दिया था........ शर्मा जी सामान मैंने रखवा लिया है चालान और बिल साइन करके तुरंत दे दीजिए, इसका अभी भुगतान होना है। विश्वास करके मैंने, जैसे कपिला बाबू ने कहा था, कर दिया था। ऐसा करने के पीछे एक कारण और था और वह कारण यह था कि मैं कपिला बाबू और गदाधर बाबू दोनो को फिर नाराज नहीं करना चाहता था। मैं ऐसा कोई काम नहीं करना चाहता था जो उन लोगों के मन मे मेरे प्रति द्वेष पैदा करे। बल्कि मैं अपने को इस तरह परिवर्तित कर लिया था कि वे लोग समझे कि मैं उनका शागिर्द हूँ उनका छोटा भाई हूँ उनका चेला हूँ और उनकी छत्र छाया में ही मैं जी खा रहा हूँ....। उसके लिए मुझे चाहे रात दो बजे तक खटना पड़ता था मैं खटता था। पूर्ववत स्टोर के सारे काम करता था और उन लोगों को खुश रखने का प्रयत्न करता रहता था। मेरे भीतर, उन लोगों के खिलाफ, बास से शिकायत को लेकर, एक कचोट थी। अपनी नौकरी जाने का डर था इसलिए मैं उन लोगों को हमेशा खुश रखने में जुटा रहता था। इसीलिए मैं पूर्वजों की कही हुई यह बात कि किसी भी पेपर पर दस्तखत करने से पहले, देख समझकर इत्मीनान हो लेना जरूरी होता है, पूरी तरह किनारे कर दिया था। नियमतः मुझे स्टोर में उतने सामान, जो बिल में दिए गए हैं, आए हैं कि नहीं देख लेना चाहिए था, लेकिन उन लोगों के मन में इस बात का विश्वास जमाने के लिए कि मैं उनका शागिर्द हूँ मैने आंख मूंदकर बिल पर दस्तखत कर दिया था।

तुमने खुद ने माल स्टोर में रखवाया था......? जब बास, इतना खोद करके मुझसे पूछने लगा था तो मुझे समझते देर नहीं लगी थी कि कपिला और गदाधर मुझे फंसाने के लिए मेरे साथ घाट कमा चुके है।

सर........ यह माल न तो मैंने रिसीव किया है न ही स्टोर में रखवाया है।

तो इसे कपिला और गदाधर ने रिसीव किया है?

जी सर।

मिस्टर शर्मा, तुम्हें दो दिन अभी नौकरी करते नहीं हुआ और तुम इतने चालाक बन गए? चोरी नहीं सीधी डकैती है यह....... बास मेरी बात सुनकर एकदम से चिल्ला उठा था इतने दिनो तक दफ्तर मे मेरी जितनी भी टांडना क्यो न हुई हो और लोग मेरे साथ जितना भी बुरा पेश क्यो न आए हो सब कुछ मैं बर्दाश्त कर लिया था, लेकिन स्टोर में हेराफेरी और चोरी का यह इल्जाम, असह्य था मुझे और यह बात उस स्थिति में और भी, जब मैं सपने में भी कभी न सोंचा होउं, कि मैं स्टोर में हेराफेरी करूँगा... लेकिन मुझे, गदाधर बाबू और कपिला ने साजिश करके गड्ढे में ढकेल दिया था।

समझ गया।

क्या, कि मुझ पर चोरी का इल्जाम लगा था इसलिए मैंने आत्महत्या कर लिया यही न?

हाँ।

कारण तुम वही समझोगे जानता हूँ लेकिन मैं जो कहूँगा उसे नहीं सुनोगे।

कहो क्या कहना चाहते हो वह मेरे चेहरे पर ताक बड़ी कटखनी मुसकान मुसकाया है।

मैंने अभी बताया, न, मैं कपिला और गदाधर बाबू दोनों को इस स्थिति में डाल देना चाहता था कि वे अपराधबोध और आत्मग्लानि से ग्रस्त होकर सारी जिन्दगी घुटें, कपार पीट पीटकर और सिर के बाल नोच नोचकर चीखते-चिल्लाते, पागलों की तरह गली गली घूमे। तब तो इस समय उन दोनो की कुछ वैसी ही हाल हो रही होगी।

ओ ऽ ऽ देखो... तुमने मुझे बातों में भिड़ाकर कितनी देर कर दिया चलो दिखाते हैं तुम्हें, कैसे कोई अपने किए का पाप भोगता है। वह साला बास भी, जो पूरी तरह अन्धा और बहरा था वह भी कैसे पश्चाताप की आग में जल रहा होगा इस समय।

चलो।

मैं उसे अपने साथ लेकर बास के बंगले के ऊपर दो तीन चक्कर लगाकर नीचे उतर आया हूँ। यह देखो, यह बास का बंगला है और यह जो इधर बड़ी तेजी से चले आ रहे है न, यही महाशय है गदाधर बाबू, इनकी चाल देखकर समझ ही रहे हो न कि किस बाई में हैं इस समय वे।

समझ रहा हूँ।

गदाधर बाबू जैसे ही बास की बाउंड्री के गेट के पास पहुंचे है बास के टेरियर कुत्ते को उनके आने की जानकारी हो गई है। वह मेम साहब की गोद से कूदकर, पुक पुक पुकपुकाता, गेट की तरफ दौड़ा है और गदाधर बाबू, गेट खोलकर अंदर दाखिल होने के बाद, सिटकिनी लगाने के लिए जैसे ही पीछे मुड़े हैं कुत्ता उनकी धोती का ढकुवा, अपने दांतों से पकड़, जमीन पर लोट पोट करके उनके साथ खिलवाड़ करने लग गया है। कुत्ता उनकी धोती खींचकर उन्हें पूरी तरह नंगा न कर दे, इस डर से वे, अपना ढकुवा अपने हाथों से पकड़, हरी राम को पुकारने लग गए हैं। हरी राम ओ हरी राम जरा जोकी को संभालो भइया ऽ ऽ ऽ।

क्यों मेरे बच्चे, इतने दिनों से तुम मुझे देख रहे हो, फिर भी, जब तुम मुझे पाते हो तो बचपना करने से बाज नहीं आते। चु चु चु, गदाधर बाबू, अपनी धोती खुलने से बचाने के साथ कुत्ते को चुचकार पुचकार कर उसे शान्त करने में भी जुटे हुए थे।

जोकी, ओ जोकी, हाट आर यू डूइंग, यू डोन्ट रिकग्नाइज गदाधर, कम आन, लान के कोने में माली को हिदायत देती मेम साहब जोकी की स्वामिभक्ति देख गदगद हो गई थी। उनके बुलाते ही जोकी गदाधर बाबू का ढकुवा छोड़ दौड़ लगाता मेम साहब के पास पहुंचा था और वे उसे अपनी गोदी में उठा कर उसे सहलाने लगी है।

बड़ा नटखट है जोकी, मेमसाहब। गदाधर बाबू गेट से भागते दौड़ते मेमसाहब के पास आकर खड़े हो गए थे।

तुम यह धोती पहनकर क्यों आते हो गदाधर जोकी को तुम्हारी धोती पसन्द नहीं है।

नहीं मेमसाहब जोकी है ही बड़ा नटखट, एकदम बच्चों की तरह, मुझे देखते ही शरारत करने को मचल उठता है।

क्यों जोकी क्या कह रहा है गदाधर

पुक पुक पुक..... गदाधर का नाम सुन जोकी फिर पुकपुका उठा है।

अब चुप भी करो जोकी ई ऽ ऽ

गदाधर..... क्या बात है इतने सबेरे सबेरे.......

साहब उठ गए हैं कि नहीं मेम साहब

हाँ उठ गए हैं स्टडी में बैठे हैं लेकिन बात क्या है?

वह अपने स्टोर में शर्मा जो हैं न मेमसाहब........।

हाँ हाँ हाँ हाँ।

उसने आत्म हत्या कर लिया मेम साहब

यू मीन सुइसाइड ?

हाँ मेम साहब।

सुइसाइड भला क्यों.......?

साहब को फंसाने के लिए मेमसाहब।

व्हााट......... साहब को फंसाने के लिए ए........ऽ ऽ।

आप उसे नहीं जानती मेमसाहब बड़ा ही कलाकार आदमी था वह बड़ा ही दुष्ट.......।

उन दोनों की बात सुनकर बास भी स्टडी से निकल कर लान में आ गया है।

क्यों गदाधर क्या बात है?

स्यर, वह अपना शर्मा है न, उसने सुइसाइड कर लिया है स्यर।

तब........। बास ने ‘‘तब’’ कुछ इस तरह कहा है जैसे वह गदाधर को बता रहा हो कि यह भी कोई खबर में खबर हुई जिसे बताने के लिए तुम इतनी दूर दौड़े चले आए हो।

मैं आपको पहले ही कहता रहा सर, यह आदमी ठीक नहीं है लेकिन यह मरदूद इतना गिरा हुआ होगा मैं तो कभी सोच ही नहीं सकता था। थोड़ी देर रूक कर बास का रूख अंदाजने के बाद, गदाधर बाबू अपना चेहरा पूरी तरह गिराकर, बास से फिर कहना शुरू किए थे।

स्यर, पीछे आपको बदनाम करने के लिए जो कुछ वह करता रहा वह तो आप जानते ही हैं जब हर कदम पर उसकी चाल नाकाम कर दिया गया तो अब आकर उसने यह चाल चल दिया।

मतलब........? गदाधर की बात सुनकर बास थोड़ा रहस्यमयी हो उठा है।

मतलब बड़ा सीधा है सर, आत्महत्या करके हत्या का केस बनाकर आपको फंसाना चाहता है वह।

गदाधर तुम भी कैसी बच्चों जैसी बातें करते हो। वह केंचुवा साला मुझे क्या फंसाएगा।

जानता हूँ सर, आपकी सामर्थ्य जानता हूँ लेकिन उस सब की क्या जरूरत है सर, जब तक गदाधर है आपको निश्चिन्त रहना है। मैं तो सिर्फ आपको सूचना देने चला आया था। और अगर कुछ होगा भी तो मैं तो हूँ न सर। आपको इतनी छोटी सी बात के लिए नाहक परेशान होने की जरूरत नहीं है। ठीक है सर मैं चलकर देखता हूँ।

क्यों यह तुम्हारा चेहरा क्यों सूख रहा है अरे अरे, यह लड़खड़ा क्यों रहे हो तुम।

मेरा सारा गणित ही उलट गया।

गणित उलट गया माने...... इसके आगे भी कोई जोड़ घटाव था तुम्हारा?

नहीं, मैंने जो सोचा था सब उसके उल्टा हो रहा है।

तुम हो हद दर्जे के बेवकूफ, भोंदू

नहीं, मैं सोचता था कि आदमी की मौत, किसी के भी कलेजे को दहला कर रख देने वाली चीज होती है किसी के मरने पर लोगों को छातियां पीट पीटकर और धाड़ें मार मारकर रोते देखा है मैंने।

मौत वौत कुछ भी नहीं है। उससे न कोई दहलता है न पसीजता है, और न किसी की दुष्टता दूर होती है न ही किसी में प्यार और आत्मीयता उपजती है। कोई भी घटना, चाहे वह कितनी भी हौलनाक क्यों न हो, हर आदमी उसे अपने अपने ढंग से लेता है। जो नीच प्रकृति के लोग हैं वे सीधी सी सीधी बात में भी खुरपंच ढूंढ लेते हैं यदि वह उनसे ताल्लुक रखती है तो। और यदि वह उनसे ताल्लुक नहीं रखती, तो किसी को क्या पड़ी है कि कौन एक्सीडेंट होकर मरा और कौन जहर खाकर।

लेकिन मैंने ऐसा कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

तुम सोच भी नहीं सकते थे। जड़ता जो है तुममें। तुम हो सरल प्रकृति के आदमी और निहायत मूर्ख भी। इसलिए जितना तुमने सोचा है तुम्हारे सोचने की औकात ही सिर्फ उतनी मर थी। यह बात तुम्हारे दिमाग में ही नहीं आएगी कि इस संसार में हर जीव, दूसरी तमाम चीजों की तरह मौत को भी अपने स्वार्थ के तराजू पर रखकर पहले तौलता है। यदि वह उसके स्वार्थ से ताल्लुक रखती है तभी उससे उसका सरोकार होता है और उसका वह सरोकार भी उससे, उतनी ही मात्रा में होती है जितनी मात्रा में उससे उसे हानि या लाभ होता है। नहीं तो भयानक से भयानक हादसा तक उसके लिए बेमतलब की चीज होती है और वह उसे अपने जेहन से पूरी तरह खारिज कर देता है। दूसरी बात यह है कि चाहे बड़ा से बड़ा और दिल दहला देने वाला हादसा ही क्यों न हो यदि उसका किसी से संबंध भी होता है तो वह उस हादसे में भी अपनी प्रकृति के हिसाब से अपना मतलब ढूँढ़ निकालता है। जैसे देख रहे हो न, गदाधर नीच प्रकृति का आदमी है दुष्ट है तुम्हारी मौत को, उसने तुम्हारी एक गहरी साजिश की तरह लिया है।

ठीक कहा तुमने।

ठीक नहीं कहा, चलो और भी देखो, इतना ही देखकर तुम्हारी आंख नहीं खुलेगी, चलो....... दिखाते हैं, वह मेरा चेंचुआ पकड़ मुझे घसीटता राम विलास के पास लाकर खड़ा कर दिया है।

इसे पहचानते हो?

हाँ पहचानता हूँ

यह रामविलास है न.... कान पर हाथ रखकर कैसे पूर्वी छेड़ रखा है इसे देख रहे हो न ?

हाँ, देख रहा हूँ।

इसे भी तुम्हारी मौत की जानकारी हो गई है

वह कैसे?

यह सुबह सुबह तुम्हारे घर पैसा मांगने गया था इसके यहाँ दूध का पैसा बाकी है न?

हाँ...... बाकी तो है।

चलो मिलते हैं इससे। वह मुझे घसीटकर ठीक राम विलास के सामने लाकर खड़ा कर दिया है।

राम बिलास कुछ सुना तुमने?

क्या हुजूर।

वह चिरंतर का स्टोर बाबू शर्मा थान, उसने आत्महत्या कर लिया।

हाँ साहेब..... अभी अभी देखकर आया हूँ जहर खा लिया था उसने।

उसने आत्महत्या क्यो किया कुछ जानते हो?

कोई घपला किया था यही सुनने मे आया था हुजूर।

तुम्हारे भी कुछ पैसे बकाया थे न उसके यहाँ ?

हाँ साहेब दो सौ बाकी थे पानी में चला गया हुजूर।

लेकिन उतने का तो तुम उसे पानी पिला दिए होगे राम बिलास।

साहेब इसीलिए तो सन्तोष कर लिया। लेकिन साहेब, कंपनी में उसका कुछ न कुछ हिसाब तो जरूर बाकी होगा।

लेकिन जितना बाकी होगा उससे ज्यादा वह खाकर बैठा होगा एडवांस ले लिया होगा राम विलास।

ठीक है साहेब नहीं मिलेगा तो क्या करेंगे इतना घाटा तो सहना ही पड़ेगा।

और देखोगे?

नहीं अब मैं और कुछ भी नहीं देखना चाहता।

देखोगे कैसे नहीं....... वह मुझे घसीटता हुआ सेठ मुरारीलाल की दूकान पर लाकर खड़ा कर दिया है।

इस लौंडे को मैं बार बार कहता था, उधार मत दो लेकिन इसने मेरे चुपके, उस भिखमंगे को उधार दे दिया..... सेठ मुरारी लाल क्रोध में आग बबूला हो, छोटे बेटे पर बरस रहे हैं। साले, आदमी पहचानते ही नहीं...... और मुरारीलाल का छोटा लड़का, दूकान के एक कोने में जमीन में अपना माथा घुसेड़े खड़ा है और बाप की बड़बड़ाहट सुन रहा है।

चलो और दिखाते हैं तुमको...... मेरा चेंचुवा छोड़ उसने मेरी गर्दन पकड़ लिया है और मुझे धकियाते हुए एक हाल में लाकर खड़ा कर दिया है।

देखो यार यह आत्महत्या का केस है उसमें कुछ हासिल होने को नहीं हैं।

केस तो बनाना पड़ता है शुक्ला जी, केस बन गया तो कुछ न कुछ तो हासिल हो ही जाएगा कोशिश करने में क्या नुकसान है।

रामजी भाई ठीक कह रहे हैं शुक्ला जी केस तो बनाना पड़ता है और जितना आप सोच रहे हैं केस उतना कमजोर भी नहीं है। इसमें अगर तूली को घसीट लिया जाए तो केस में जान आ जाएगी। तूली ई ऽ ऽ कौन तूली ? अरे वही डाइरेक्टर का साला और कौन तूली।

चिन्तामणि यार तुम्हारी भी बुद्धि का दिवाला निकल चुका है अरे उस बिल और चालान दोनों पर शर्मा के दस्तखत हैं।

लेकिन माल स्टोर से गायब भी तो कराए जा सकते हैं।

क्या बेहूदी बात करते हो चिन्ता।

क्या बातें कर रहे हैं ए लोग, सुन रहे हो?

जी ई ई । ए साले अपनी ही फिराक में है। कुछ बवाल करके कंपनी से कुछ ऐंठने का प्रोग्राम बना रहे है।

ए लोग तुम्हारी लाश कंपनी के गेट पर रख लोगों की सहानुभूति बटोरेंगे, उनसे पैसा ऐंठेंगे तुम्हारे बाल बच्चों के नाम तुम्हारे कफन दफन के लिए और लोगों की भावना उभाड़, कंपनी के खिलाफ उन्हें भड़काएंगे तूली के खिलाफ करेंगे और उससे पैसा ऐंठेंगे।

लेकिन ऐसा क्यों करते हैं लोग?

क्योंकि ऐसा करने से सबको कुछ मिलेगा। तुम समझते हो तुम मरकर लोगों में एक विस्फोट कर दोगे, तोप दाग दोगे, पृथ्वी पर भूचाल ला दोगे लेकिन तुम नहीं जानते, लोगों के लिए मृत्यु भी एक वस्तु है तुम्हारी शरीर तुम नहीं हो वह एक बिकने और खरीदने वाली चीज है मोलभाव की चीज है।

हे राम........।

हे राम मत करो, चलो और भी देखो अभी तुमने देखा ही कहाँ हैं।

लेकिन अब मैं और कहीं नहीं जाऊँगा।

जाओगे कैसे नहीं...... वह मेरी गर्दन पकड़ मुझे धकियाता, मेरे घर में लाकर खड़ा कर दिया है..... यह देखो यह तुम मरे पड़े हो न.....?

उफ्फ कितनी दुर्गन्ध है यहाँ..... मेरा सारा शरीर उल्टियों में नहाया हुआ है....

और मजे की बात तो यह है कि इस शरीर को कोई छूने वाला तक नहीं है यहाँ। तुम्हारे सारे दोस्त और दुश्मन गायब हैं यहाँ से, सब तुम्हें देख देख कर जा चुके हैं.... उधर देखो उस कोने में कौन बैठी है।

मेरी पत्नी है।

उसी की तुम इतनी बड़ाई करते थे न कि वह बड़ी सुघड़ है मुझे बहुत मानती है।

एक पुरूष को एक औरत जितना समझती है पुरूष खुद अपने को उतना नहीं समझता.... पत्नी की बात मेरे कानों में घनघना उठी है..... पुरूष जब डह बजर कर घर लौटता है तो उसे एक साथी की जरूरत होती है जो उसकी वेदना उसकी पीड़ा खींच उसे हल्का कर दे.......। सुनती हो........ ए जी ........ मैं पत्नी को पुकारा हूँ लेकिन वह तो.... जैसे पथरा सी गई है पत्थर की बुत बन गई है वह.... और मुन्ना उसकी गोद में अपना सिर रखे दुबका पड़ा है.........

क्यों ऽ ऽ ऽ इधर देखो मेरी तरफ मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूँ इस तरह तुम निर्जीव क्यों हो गई हो... सुनती हो ओ ऽ ऽ ।

नहीं सुनेगी वह, उसके सुनने और देखने की सारी शक्ति खत्म हो गई है

क्या अपनों से बिछुड़ने का इतना गम होता है लोगों को?

बेवकूफ कहीं के...... उसने खींचकर एक तमाचा जड़ दिया है मेरे गाल पर। पूछता है अपनों से बिछुड़ने का इतना गम होता है लोगों को। कल से देखना किस तरह मींजी लतियाई जाती है यह तुम्हारी औरत, किस तरह लोग इसकी बोटियां चबाएंगे, तुम्हें यही सब देखना है अब और देख देखकर रोज ही आत्महत्या करना है......। यह तुम्हारा बेटा जो है न देखना किस तरह बांय बांय चिल्लाता है...... लोगों के जूठन गिर जाने पर, उसे पेट में डाल लेने के लिए किस तरह कुत्तों से होड़ लेता है।

हे भगवान।

भगवान को मत बुलाओ।

तुम एक चीज बता सकते हो? यह तुम्हारी औरत जो है न, वह तुम्हें ज्यादा से ज्यादा खिला देना चाहती थी और खुद बेचारी अपने आधे पेट ही खाती थी। अपना पेट भर जाने के बाद तुमने कभी देखा था कि यह बेचारी जो तुम्हें इतने प्रेम से खिला देने पर जुटी रहती है उसका भी पेट भरता है कि नहीं, देखा था कभी?

नहीं ।

वह बेचारी आधे पेट खाती थी इसलिए कि तुम बचे रहो वह बची रहे तुम्हारा परिवार बचा रहे तुम्हारी देह मींजने के बाद ही सोती थी कि तुम्हारे दर्द काढ़ लें, तुम्हारी यंत्रणा कम कर दे उसका सिला उसे यह दिया तुमने?

अब मैं क्या करूं मेरे भाई.........

करने को कुछ बचता भी है अभी। जो करना था सब तो कर दिया तुमने। अब तुम्हें सिर्फ देखना है...... और देख देख कर आत्महत्या करना है।

चलो और दिखाता हूँ।

अब मैं कहीं नहीं जाऊँगा

जाओगे कैसे नहीं, जाना तो तुम्हें पड़ेगा और वह मुझे धकियाता खदेड़ता मेरी माँ के सामने लाकर खड़ा कर दिया है।

माँ........ को देखकर मैं बड़ा अहक कर उससे लिपट लेने के लिए दौड़ा हूँ लेकिन देह तो मेरी है नहीं फिर भला मैं उससे लिपटता कैसे इसलिए रोता हुआ उसके पास खड़ा हो गया हूँ।

कौन है रे........... मेरा सोनू..... तू कब आया रे......, माँ जैसे मेरी देह की गंध से ही मुझे पहचान गई है।

बोल जबाब क्यों नहीं देता........ इस अपनी अंधी माँ को। वह मेरे मुँह पर जोर का एक घूसा जड़ दिया है इसी की आँख का तू आपरेशन करवाकर अपने कर्जे से उऋण हो लेना चाहता था न ? बोल बुला रही है तुझे तेरी माँ।

सोनू..... तू चुप क्यों हो गया रे...... मेरे पास क्यों नहीं आता.....माँ अपने दोनों हाथ मेरी तरफ बढ़ा मुझे अपने पास बुलाने लग गई है।

अंधेपन की दयनीयता देख रहा है माँ के चेहरे पर?

सोनू...... तेरी नटखटाई अभी वैसी ही है......रे, जानती हूँ जब तक तू मुझे पूरी तरह खिझा नहीं लेगा मेरी गोदी मे नहीं आएगा।

यहाँ खड़ा खड़ा रोने से कुछ नहीं होगा, जाता क्यों नहीं माँ की गोदी मे वह मुझ पर चीख पड़ा है।

लेकिन मैं जाऊं कैसे?

एक दफा और जहर खा ले, बस पहुंच जाएगा.......... दूं?

नहीं.........

माँ तेरा सोनू जहर खाकर मर गया, उसने मेरी मौत की खबर माँ को दे दिया है।

मर गया........ सोनू मेरा मर गया..... अंय...... समाचार सुन माँ की पूरी शरीर एक दफा थरथराई है और वह जहाँ बैठी थी वहीं पथरा गई है

माँ आ ऽ ऽ ऽ .........

और देखोगे

नहीं ई ई ऽ ऽ .... मैं अब पुनः अपनी उसी शरीर में जाना चाहता हूँ.... उसी परिवेश और माहौल में उसी जद्दोजहद और उठा पटक में उसी व्यूह और चक्रव्यूह में, उसी आशा निराशा में, उसी मान अपमान में

क्यों भला?

क्योंकि वहाँ जीवन है

जी ई ई वन है उसने मेरी गर्दन पकड़ मुझे बड़े जोर से फर्श पर पटक दिया है मैं औंधे मुँह जमीन पर गिरा हूँ और मेरी आंखें खुल गई है।

-समाप्त-

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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,339,बाल कलम,25,बाल दिवस,3,बालकथा,62,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,10,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान 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जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,75,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: सोमेश शेखर चन्द्र की लंबी कहानी : पुनर्जन्म
सोमेश शेखर चन्द्र की लंबी कहानी : पुनर्जन्म
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