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अश्विनी केशरवानी का आलेख : छत्तीसगढ़ के जन्मांध कवि नरसिंहदास

-प्रो. अश्विनी केशरवानी

ashwini kesharwani 2 (WinCE)छत्तीसगढ़ का प्राचीन साहित्यिक इतिहास समुन्नत था। उस काल के अनेक साहित्यकार प्रचार प्रसार के अभाव में गुमनाम होकर मर खप गये। आज उनकी रचना संसार पर दृष्टि डालने वाले बहुत कम लोग होंगे।  ऐसे अनेक साहित्यकारों के नाम गिनाये जा सकते हैं जो भारतेन्दु युग के पहले, भारतेन्दु के समकालीन और उसके बाद लिखते रहे हैं। लेकिन हिन्दी साहित्य के इतिहास में इनका नामोल्लेख नहीं मिलता। ऐसे स्वनामधन्य साहित्यकारों में पं. प्रहलाद दुबे (सारंगढ़), पं. अनंतराम पांडेय (रायगढ़), पं. मेदिनीप्रसाद पांडेय (परसापाली-रायगढ़),पं. वेदनाथ शर्मा (बलौदा), पं. मालिकराम भोगहा, पं. हीराराम त्रिपाठी, गोविंदसाव, (सभी शिवरीनारायण), बटुकसिंह चैहान (कुथुर-पामगढ़), पं. पुरूषोत्तम प्रसाद पांडेय (बालपुर), और नरसिंहदास वैष्णव आदि के नाम प्रमुखता से लिये जा सकते हैं। भारतेन्दु युगीन साहित्यकारों में इनके नामोल्लेख नहीं होने के बारे में प्रो.. रामनारायण शुक्ल की टिप्पणी सटिक लगती है ः- ‘‘छत्तीसगढ़ के अनेक समर्थ कवि और साहित्यकार आज तक अनजाने हैं और उपेक्षित भी। इनके प्रमुख कारणों में हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखकों का उत्तर प्रदेश का निवासी होना है। ऐसा भी हो सकता है कि उन्हें छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों की रचनाएं पढ़ने को न मिली हो और उनका नामोल्लेख नहीं किया जा सका हो ?‘‘ आज ऐसे समर्थ रचनाकारों की आवश्यकता है जो उस काल के गुमनाम साहित्यकारों की रचनाओं को खोज निकालें और प्रकाश में लाने का सद्कार्य कर सकें। यहां के विश्वविद्यालयों में भी ऐसे साहित्यकारों के उपर शोध कार्य कराया जाना चाहिए।

महानदी घाटी का साहित्यिक परिवेश उल्लेखनीय है। क्योंकि महानदी के तटवर्ती नगरों जैसे शिवरीनारायण, खरौद, बालपुर, रायगढ़, सारंगढ़, राजिम, धमतरी, रायपुर, बिलासपुर और रतनपुर में ऐसे लब्ध प्रतिष्ठ साहित्य मनीषियों का जन्म हुआ और उनकी लेखनी से छत्तीसगढ़ की धरा पवित्र हुई। यहां के बिखरे साहित्यकारों को एक सूत्र में पिरोकर लेखन की एक नई दिशा देने का सद्कार्य शिवरीनारायण के तत्कालीन तहसीलदार और सुप्रसिद्ध भारतेन्दु कालीन कवि और आलोचक ठाकुर जगमोहनसिंह ने किया। वे भारतेन्दु हरिश्चंद्र के सहपाठी थे। ‘‘मेघदूत‘‘ के अनुवाद में उन्होंने भारतेन्दु की सहायता ली थी। उनकी रचनाओं में भारतेन्दु का स्पष्ट प्रभाव देखने को मिलता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में कई स्थानों पर भारतेन्दु की कविताओं को उधृत किया है। ‘‘श्यामास्वप्न‘‘ में तो श्यामसुन्दर भारतेन्दु का बड़ा ही घनिष्ठ मित्र जान पड़ता है। ऐसे साहित्यकार के सानिघ्य में छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों ने यहां के प्राकृतिक सौंदर्य को दोहन कर अपनी रचनाओं में समेटने का प्रयास किया है। उन्हीं में से एक जन्मांध कवि श्री नरसिंहदास वैष्णव भी हैं।

छत्तीसगढ़ प्रदेश के जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत ग्राम तुलसी में शिवायन, अथ जानकी माय हित विनय और नरसिंह चौंतीसा का सृजन करने वाले जन्मांध कवि श्री नरसिंहदास वैष्णव का रचना संसार साहित्यिक जगत के लिए अपरिचित है। उनकी रचनाओं में तुलसी, सूर और मीरा का स्पष्ट प्रभाव देखने को मिलता है। जन्म से ही वे अंधे तो थे ही, लेकिन मन की आंखों से उन्होंने देवताओं का श्रृंगारिक वर्णन बड़े अद्भुत ढंग से किया है। उन्हें ‘‘छत्तीसगढ़ का सूरदास‘‘ कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। ऐसे भक्त कवि का जन्म जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत ग्राम घिवरा में संवत् 1927 को हुआ। इनकी माता का नाम देवकी और पिता का नाम पिताम्बरदास था। वे स्वयं लिखते हैं ः-

पिता पितांबरदास पद बन्दौ सहित सनेह।

बन्दौ देवकि मातु पद जिन पालेऊ यह देह।।

बचपन से ही उनमें भक्ति भाव समाया हुआ था। माता पिता के भक्ति का संस्कार उनमें कूट कूटकर भरी थी। वे अपने माता पिता के साथ अक्सर शिवरीनारायण जाया करते थे। अतः उनमें महानदी के पवित्र संस्कार भी पड़े। यहां का साहित्यिक परिवेश और भक्तिमय वातावरण से उनकी जीवनधारा ही बदल गयी और वे यहीं रहकर काव्य रचना करने लगे। शिवरीनारायण में वैरागियों का एक वैष्णव मठ है जहां श्री बलरामदास वैरागी रहते थे। उनकी ही प्रेरणा से उनका जीवन भक्तिमय हुआ और वे आजीवन ब्रह्मचर्य रहने का व्रत लेकर राममय होकर काव्य रचना करने लगे। एक प्रकार से बलरामदास उनके गुरू हैं। उन्होंने अपने काव्यों में लिखा है ः-

गुरू बलरामदास बैरागी, राम उपासि परम बड़भागी।

दीन्हें राम मंत्र महराजा, जो है सकल मंत्र सिरताजा।।

वे हमेशा श्रीरामचंद्र जी की भक्ति में लीन रहे और अपने वैराग्यपूर्ण जीवन की रक्षा के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते रहे। देखिए उनका एक काव्य ः-

कवि सागर अधधार जल क्रोध लोभ मद काम।

डूबत नरसिंहदास को खैचहुं जानकिराम।।

...और वह अवसर आ ही गया जब उनके वैराग्यमय जीवन को खतरा हो गया। उनके माता-पिता उनकी शादी करना चाहते थे। उनके बहुत अनुनय विनय करने के बाद भी जब उनके माता-पिता उनकी शादी करने पर अड़े रहे तब एक दिन सबको रोते बिलखते छोड़कर वे तुलसी आ गये। यहां के मालगुजार पं. रामलाल शुक्ल अपनी सादगी, दानवृत्ति और आतिथ्य प्रेम के लिए जग प्रसिद्ध थे। नरसिंहदास उन्हीं की शरण में चले गये और वहां वे आजीवन रहे। वे लिखते हैं ः-

पुत्र पिताम्बरदास के, नरसिंहदास है नाम।

जन्मभूमि घिवरा तजे, बसे तुलसी ग्राम।।

यह कहना ज्यादा उचित होगा कि श्री नरसिंहदास तुलसी में आकर भक्ति भाव में लीन हो गये। यहां रहकर उन्होंने अनेक काव्यों की रचना की। एक प्रकार से तुलसी उनकी कार्यस्थली है। ईश्वर से वे हमेशा प्रार्थना किया करते थे ः-

नारायण शर भीषम मारे। मोर भीम प्रभु आपु उबारे।

नरसिंह दास शरण हैं तोर। तुम बिन राम सुनैको मेरे।।

नरसिंहदास शिवरीनारायण और खरौद क्षेत्र में घूम घूमकर श्रीरामचरितमानस का गायन करते थे। वे हमेशा श्रीरामचरितमानस का परायण करने और साधु संतों की संगति प्राप्त कर उनसे राम भक्ति की उपलब्धियों को प्राप्त करने के लिये प्रयत्नशील रहे। इस हेतु वे तीर्थाटन भी किये। यात्राओं और तीर्थाटन से उन्हें जगत और जीवन का व्यापक अनुभव हुआ। उनकी उडि़या रचना तो अनुभवों का सुन्दर पिटारा है। अन्य रचनाओं में भी जीवन के अनुभवों को बड़ी सुन्दरता से उन्होंने व्यक्त किया है। कलिकाल का वर्णन आज की स्थिति का सजीव और मार्मिक चित्रण है। फिर भी नरसिंहदास का मन गोस्वामी तुलसीदास की अमृतमयी मानस रचना में अधिक रमता है। उन्हें श्रीरामचरितमानस, विनय पत्रिका, कवितावली और दोहावली कंटस्थ था। मानस की पंक्तियां और विनय पत्रिका के पद को वे बड़ी श्रद्धा और भक्ति से गाया करते थे। अपनी निरक्षरता और ज्ञान के बारे में उन्होंने बड़ी विनम्रता से कहा है कि मैं कोई बड़ा भक्त नहीं हूं। अंधा, मंद बुद्धि और पाप परायण हूं, निरक्षर हूं और पिंगलशास्त्र थोड़ा भी नहीं पढ़ा हूं। मैं जो कुछ भी जानता हूं वह सीताराम का ही प्रसाद है ः-

पिंगलशास्त्र न पढ़ेऊ कछु, निरक्षर अथ धाम।

अंध मंदमति मूढ़ हों, जानत जानकिराम ।।

नरसिंहदास अत्यंत विनीत, संतोषी, सहिष्णु और गंभीर प्रकृति के थे। उनका मन श्रीराम के चरणों में ही रमा रहता था। वे अंतर्मुखी और आत्म परिष्कार का सतत् प्रयास करते थे। वे पापों से डरते थे और आत्म रक्षा के लिये प्रभु श्रीराम से प्रार्थना करते थे ः-

राम के भक्त कहाइ छलौंजग, वंचक वेष बनाइ लिया।

किंकर काम के, कोह के, कंचन लोभ के कारण चित्त दिया।

नरसिंहदास कहै जग वंचक में, मोहि पामर मुख्य कली ने किया।

धिक है, धिक है, धिक है हमको जो जिवौं जग में बिनु रामसिया।

जन्मांध नरसिंहदास तुलसीदास और सूरदास की कोटि के भक्त थे। मीरा की सहजता भी उनके काव्यों में देखी जा सकती है। इस प्रकार भक्त नरसिंहदास के काव्यों में तुलसी का आत्म समर्पण, सूर का आत्म स्मरण और मीरा का आत्म सायुज्य दिखाई देता है। तुलसी ग्राम में पं. रामलाल शुक्ल और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती जानकी देवी उनसे प्रतिदिन श्रीरामचरितमानस सुना करते थे। आगे चलकर भक्त नरसिंहदास जानकी माई के हितार्थ ‘‘जानकी माई हित विनय‘‘ की रचना किये। जानकी देवी उन्हें अपना गुरू मानती थी। लेकिन इसके बावजूद नरसिंहदास उन्हें ‘‘माई‘‘ ही कहा करते थे ः-

जानकि माई हेतु, विनय रचैं सियराम के।

बंदौं संत सचेत, दया करौ माहि जानि जन।

बंदौं श्री हनुमान कृपा पात्र रघुनाथ के।

देहु भक्ति भगवान, जानकि माई शिष्य उर।

बंदौं सीता मातु, जनक नंदनी राम प्रिय।

करू छाया निज हाथ, जानकि माई शिष्य सिर।।

अपने गुरू नरसिंहदास के बारे में जानकी देवी की श्रद्धा भक्ति भी अनुकरणीय है। देखिये एक काव्यः-

नरसिंहदास नाम सत गुरू के, मोर नाम है जानकी माई।

तुम्हरे चरण शरण तकि आयेंउ राखहु दीन बंधु रघुराई।।

‘‘जानकी माई हित विनय‘‘ में सीता माई से जानकी माई की वार्तालाप का सजीव चित्रण कवि ने किया है ः-

जानकि माई नाम मोर है, तुमहौ जानकी माई।

मेरे पति द्विज रामलला हैं, तुम्हरे पति रघुराई।

तुम्हरे हमरे एक नाम है, हम तुम दोऊ सहनाई।

सोषत जागत सांझ सबेरे, निशि दिन करहु सहाई।

तुम पुनीत मैं पतित कृपणमय, तुम उदार श्रुति गाई।

बहुत नात सिय मातु तोहिं मोहिं, अब न तजहुं बनियाई।

क्षत्री रघुवंशी द्विज पालक, युग युग से चलि आई।

मैं हौं ब्राह्मण तुम क्षत्रिय हौ, कस न पालिहौ माई।

जानकि माई हृदय बसहुं अब, सियाराम दोनों भाई।

सिय तारि चरण शरण होई आयेउं, राखहुं माहि अपनाई।।

नरसिंहदास जी की ‘‘जानकिमाई हितविनय‘‘, ‘‘नरसिंह चैंतिसा‘‘ और ‘‘शिवायन‘‘ तीन प्रकाशित रचनाएं हैं। इसके अतिरिक्त कुछ फुटकर रचनाएं और पद्यात्मक पत्र प्राप्त हुये हैं जो अप्रकाशित हैं। ‘‘जानकिमाई हित विनय‘‘ और ‘‘नरसिंह चैंतिसा‘‘ में तुलसी, सूर और मीरा का प्रभाव परिलक्षित होता है। दोनों का विषय और उद्देश्य एक ही है मगर दृष्टिकोण अलग अलग है। जानकिमाई हित विनय की गणना आत्म निवेदन परक गीतिकाव्य से की जा ससकती है। इसमें 71 गेय मुक्तक पद हैं। प्रत्येक पद के अंतिम दो पंक्तियों में उन्होंने श्रीराम की अनपायनी भक्ति की याचना की है। देखिये उनका एक मुक्तक ः-

नरसिंहदास अंध यहि कारन, करि करि विनय कहत हौं रोई।

जानकिमाई रामलला द्विज, राखहुं राम शराण है दोई।।

उन्होंने यह पद अपने अराध्य श्रीराम को समर्पित किया है। इस ग्रंथ के साथ ‘‘छंद रामायण‘‘ और ‘‘सवैया रामायण‘‘ भी प्रकाशित है। इसमें संक्षिप्त में सातों कांड का वर्णन है। अंत में कलियुग का बड़ा सजीव वर्णन किया गया है ः-

चोरि करे मचावे जुवा तास गंजीपन पासा रे।

देखि कली की रीति बखाने अंधा नरसिंह दासा रे।।

दूसरा ग्रंथ ‘‘नरसिंह चैंतिसा‘‘ है जिसके पहले ही पृष्ठ पर ‘‘भगवत् भजन के निमित्त‘‘ तैयार करने का उल्लेख है। बारहखड़ी अक्षर के क्रम से दोहा, चैपाई और सोरठा आदि छंदों में इसकी रचना की गई है। तीसरा ग्रंथ रामायण की तर्ज पर ‘‘शिवायन‘‘ है। यह उनकी प्रसिद्ध और चर्चित खंडकाव्य है। ‘‘शिव-पार्वती विवाह‘‘ का वर्णन उडि़या और छत्तीसगढ़ी भाषा में किया गया है। छत्तीसगढ़ी भाषा में वर्णित ‘‘शिव बारात‘‘ उनका गौरव स्तम्भ है। यह अत्यंत लोकप्रिय, सरस और हृदयग्राही है। देखिये शिव बारात का एक दृश्यः

आईगे बरात गांव तीर भोला बाबा जी के

देखे जाबो चला गिंया संगी ला जगावा रे।

डारो टोपी, मारो धोती पांव पायजामा कसि,

बर बलाबंद अंग कुरता लगावा रे।

हेरा पनही दौड़त बनही, कहे नरसिंहदास

एक बार हहा करही, सबे कहुं घिघियावा रे।।

कोऊ भूत चढ़े गदहा म, कोऊ कुकुर म चढ़े

कोऊ कोलिहा म चढि़ चढि़ आवत..।

कोऊ बिघवा म चढि़, कोऊ बछुवा म चढि़

कोऊ घुघुवा म चढि़ हांकत उड़ावत।

सर्र सर्र सांप करे, गर्र गर्र बाघ करे

हांव हांव कुत्ता करे, कोलिहा हुवावत।

कहें नरसिंहदास शंभु के बरात देखि,

गिरत परत सब लरिका भगावत।।

दक्षिण पूर्वी रेल्वे जंक्शन चाम्पा से मात्र 8 और नैला रेल्वे स्टेशन से 12 कि. मी. पर पीथमपुर ग्राम स्थित है जहां कलेश्वर महादेव का भव्य मंदिर है। यहां प्रतिवर्ष धूल पंचमी को ‘‘शिवजी की बारात‘‘ निकलती है। संभव है कविवर के मन में शिव बारात की कल्पना इस दृश्य को देखकर उपजी हो ? बहरहाल, पीथमपुर में शिवजी की बारात का दृश्य दर्शकों को अभिभूत कर देता है। इस प्रकार उनके काव्य में भक्तिकाल का दैन्य, रीतिकाल का माधुर्य और आधुनिक काल के समाज सुधार की भावना परिलक्षित होती है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य तो यह है कि जन्मांध होने के बावजूद उन्होंने ग्रंथों की रचना की। इसके लेखन का सद्कार्य पं. दयाशंकर बाजपेयी ने किया जो उस समय खरौद के मिडिल स्कूल में प्रधान पाठक थे। ऐसे उच्च कोटि के कवि का गुमनाम होना विचारणीय है। अच्छा होता कि ऐसे गुमनाम साहित्य मनीषियों को प्रकाश में लाया जावे। इससे छत्तीसगढ़ के उज्जवल साहित्यिक परिवेश उजागर होगा और हिन्दी साहित्य के इतिहास में परिवर्तन संभव होगा ?

रचना, आलेख एवं प्रस्तुति,

प्रो. अश्विनी केशरवानी

राघव, डागा कालोनी,

चांपा-495671 (छत्तीसगढ़)

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