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महेंद्र भटनागर की कविता - कचनार

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कचनार

-महेंद्र भटनागर

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पहली बार

मेरे द्वार

रह-रह

गह-गह

कुछ ऐसा फूला कचनार

गदराई हर डार!

इतना लहका

इतना दहका

अन्तर की गहराई तक

पैठ गया कचनार!

जामुन रंग नहाया

मेरे गैरिक मन पर छाया

छ्ज्जों और मुँडेरों पर

जम कर बैठ गया कचनार!

पहली बार

मेरे द्वार

कुछ ऐसा झूमा कचनार

रोम-रोम से जैसे उमड़ा प्यार!

अनगिन इच्छाओं का संसार!

पहली बार

ऐसा अद्‌भुत उपहार!

--
डा. महेंद्रभटनागर
Dr. Mahendra Bhatnagar,
110 Balwant Nagar, Gandhi Road, GWALIOR — 474 002 [M.P.] INDIA

टिप्पणियाँ

  1. आभार!! बहुत उम्दा रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  2. क्या खूब, भटनागर जी, बहुत अच्छा लिखा है आपने। आपको पढ़कर बंगाली जी की लाइनें याद आ गईं..........
    एक पेड़ चांदनी लगाया है आंगने
    फूले तो एक फूल आ जाना मांगने।
    बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  3. रचना तो अच्छी है ही, भाषा और प्रवाह भी प्रशंसनीय है..

    ***राजीव रंजन प्रसाद

    उत्तर देंहटाएं

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