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राम शिव मूर्ति यादव का आलेख : आरक्षण क्यों जरूरी ?

 

सामाजिक न्याय के लिए आरक्षण जरूरी

ram shiv murit yadav 

-राम शिव मूर्ति यादव

आरक्षण का मुद्दा आरम्भ से ही लोगों को उद्वेलित करता रहा है। कुछ लोग इसे योग्यता, अवसर की समानता व रोजगार से जोड़कर देखते हैं, तो कुछ के लिए यह निर्णय में भागीदारी से सम्बन्धित है। वस्तुतः आरक्षण किसी न किसी रूप में भारतीय समाज में प्राचीन काल से ही मौजूद रहा है। परम्परागत वर्ण-व्यवस्था में इसके बीज खोजे जा सकते हैं, जहाँ ब्राह्यण-क्षत्रिय वैश्य-शूद्र सभी के कर्म निर्धारित कर दिए गए थे। यही कारण था कि भगवान राम ने शम्बूक का वध इसलिए कर दिया कि वह शूद्र होकर तपस्या कर रहा था। महाभारत काल में गुरू द्रोणाचार्य ने एकलव्य को शूद्र होने के कारण शिक्षा देने से मना कर दिया और जब उन्हें अहसास हुआ कि एकलव्य अर्जुन से भी बड़ा वीर है, तो उन्होंने गुरूदक्षिणा की आड़ में उसके हाथ का अंगूठा ही माँग लिया। स्पष्ट है कि वर्ण व्यवस्था रूपी विशेषाधिकारों की आड़ में पिछड़ों और दलितों को शिक्षा से वंचित करने का षडयंत्र रचा गया और उन्हें वेद ज्ञान तथा आधुनिक शिक्षा से वंचित रखा। कालान्तर में ऐसे वंचित वर्गों को थोड़ी विशेष सुविधा देकर विभिन्न सरकारों ने उनका जीवन स्तर उठाने और अन्य वर्गों के समकक्ष खड़ा करने का प्रयास किया। स्वयं मण्डल आयोग के अध्यक्ष डॉ0 वी0 पी0 मण्डल ने कहा था- ‘‘यह सच है कि आरक्षण से कुछ लोगों का दिल जलेगा। मगर क्या महज दिल जलने को सामाजिक सुधार के खिलाफ एक नैतिक निषेधाधिकार माना जाये?’’

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 (4) में सन्निहित है कि- ‘‘इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।’’ वस्तुतः संविधान का यह उपबन्ध सामाजिक न्याय की प्रतिष्ठा सुनिश्चित करता है। इन्द्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा था कि- ‘‘पिछड़े हुए नागरिकों का वर्ग’’-इस पद की संविधान में कोई परिभाषा नहीं दी गई है। जाति, उपजीविका, निर्धनता और सामाजिक पिछड़ापन का निकट का सम्बन्ध है। भारत के सन्दर्भ में निचली जातियों को पिछड़ा माना जाता है। जाति अपने आप ही पिछड़ा वर्ग हो सकती है। हिन्दू समाज में पिछड़े वर्ग की पहचान जाति के आधार पर की जा सकती है।’’ वस्तुतः भारतीय परिप्रेक्ष्य में आरक्षण सामाजिक स्थिति सुधारने का एक उपाय है, न कि आर्थिक स्थिति। आरक्षण का मामला मात्र रोजगार का नहीं वरन् सामाजिक समानता और भागीदारी का है। आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए तो तमाम आर्थिक कल्याणकारी योजनाओं को ईमानदारी से लागू किया जा सकता है और गरीबी हटाओ जैसे नारों को क्रियान्वित किया जा सकता है। यहाँ तक कि स्वयं अमेरिका जैसे सर्वाधिक विकसित देश में भी ‘डायवर्सिटी सिद्धान्त’ के आधार पर अश्वेतों के लिए आरक्षण लागू है।

आरक्षण के विरोध में सबसे सशक्त तर्क यही दिया जाता है कि आरक्षण व्यवस्था समानता एवं योग्यता हनन के लिए एक षडयंत्र है। पर यह तर्क देने वाले भूल जाते हैं कि समता बराबर के लोगों में ही आती है। जब तक तराजू के दोनों पलड़े बराबर न हों, उनमें बराबरी की बात करना ही व्यर्थ है। क्या इस नि’कर्ष को खारिज करना संभव है कि उच्च व तकनीकी संस्थानों में कुछ जातियों का वर्चस्व है। नेशनल सर्वे आर्गेनाइजेशन के आंकड़ों पर गौर करें तो ग्रामीण भारत में 20 साल से ऊपर के स्नातकों में अनुसूचित जातियाँ, जनजातियों व मुस्लिमों का प्रतिशत मुश्किल से एक फीसदी है, जबकि सवर्ण स्नातक पाँच फीसदी से अधिक हैं। आरक्षण विरोधी सवर्ण अपने पक्ष में तर्क दे सकते हैं कि ऐसा सिर्फ उनकी योग्यता के कारण है। पर वास्तव में ‘योग्यता’ का राग अलापना निम्न तबके को वंचित रखने की साजिश मात्र है क्योंकि यदि योग्यता एक सहज एवं अन्तर्जात गुण है तो अन्य वर्गों के लोगों में भी है, पर फिर भी वे इस स्तर तक नहीं पहुँच पाए तो दाल में कुछ काला अवश्य है। अर्थात-वे इतने साधन सम्पन्न नहीं हैं कि प्रगति कर सकें, विभिन्न प्रशासकीय व राजनैतिक पदों पर बैठे उच्च वर्णों के भाई-भतीजावाद का वे शिकार हुए हैं, प्रारम्भिक स्तर पर ही उन्हें सामाजिक हीनता का अहसास कराकर आगे बढ़ने नहीं दिया गया। ऐसे में यदि सवर्णों के विचार से ‘योग्यता’ की निर्विवाद धारणा महत्वपूर्ण है, जो उस सामाजिक संरचना की ही अनदेखी करता है, जिसकी बदौलत स्वयं उनका अस्तित्व है, तो निम्न वर्ग या आरक्षण के पक्षधरों के अनुसार योग्यता को ही पूर्णरूपेण से नजर अंदाज कर देना चाहिए क्योंकि यह योग्यता की आड़ में एक विशिष्ट वर्ग को बढ़ावा देने की नीति मात्र है। आखिर क्या कारण है कि संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षाओं में आरक्षित वर्गों को अलग क्रम के रोल नंबर आवंटित किए जाते हैं? क्या किसी न किसी रूप में यह भेदभाव का कारण न बनता होगा? निश्चिततः आज की योग्यता थोपी गई योग्यता है। योग्यता के मायने तब होंगे जब सभी को समान परिस्थितियाँ मुहैया कराकर एक निश्चित मुकाम तक पहुँचाया जाये एवं फिर योग्यता की बात की जाए। योग्यता की आड़ में सामाजिक न्याय को भोथरा नहीं बनाया जा सकता।

वस्तुतः आजादी के 6 दशकों बाद भी आरक्षण का दायरा अगर घटाने की बजाय बढ़ाने की जरूरत पड़ रही है तो इसका सीधा सा अर्थ है कि संविधान के सामाजिक न्याय सम्बन्धी निर्देशों का पालन करने में हमारी संसद विफल रही है। राजनैतिक सत्ता के शीर्ष पर अधिकतर सवर्णों का ही कब्जा है। ऐसे में अगर वे स्वयं आरक्षण का दायरा बढ़ाना चाहते हैं तो देर से ही सही पर उन्हें पिछड़ों व दलितों की शक्ति का अहसास हो रहा है न कि स्वार्थ के वशीभूत वे पिछड़ों और दलितों पर कोई एहसान कर रहे हैं, क्योंकि आरक्षण संविधानसम्मत प्रक्रिया है। चूंकि पिछड़ी और दलित जातियाँ व्यवस्था में समुचित भागीदारी के अभाव में अपनी आवाज उठाने में सक्षम नहीं हैं अतः कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के तहत सरकार का कर्तव्य है कि इन उपेक्षित वर्गों को व्यवस्था में निर्णय की भागीदारी में उचित स्थान दिलाये। इसे किसी का अधिकार छीनना नहीं वरन् समाज के हर वर्ग को उचित प्रतिनिधित्व देना कहा जायेगा।

वस्तुतः आज आरक्षण समाज को पीछे धकेलने की नहीं वरन् पुरानी कमजोरियों और बुराईयों को सुधार कर भारत को एक विकसित देश बनाने की ओर अग्रसर कदम है। यह लोकतंत्र की भावना के अनुकूल है कि समाज में सभी को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए एवम् यदि किन्हीं कारणोंवश किसी वर्ग को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता है तो उसके लिए समुचित आरक्षण जैसे रक्षोपाय करने चाहिए। सामाजिक समरसता को कायम करने एवं योग्यता को बढ़ावा देने के लिए जरूरी है कि ‘अवसर की समानता’ के साथ-साथ ‘परिणाम की समानता’ को भी देखा जाय। देश में दबे, कुचले और पिछड़े वर्ग को अपनी प्रतिभा का प्रदर्शान करने का मौका नहीं मिला, मात्र इसलिए ये वर्ग अक्षम नजर आते हैं। इन्हें सरसरी तौर पर अयोग्य ठहराना सामाजिक न्याय के सिद्धान्तों के प्रतिकूल है। शम्बूक व एकलव्य जैसे लोगों की प्रतिभा को कुटिलता से समाप्त कर उनकी कीमत पर अन्य की प्रगति को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

कालान्तर में आरक्षण की काट के लिए आर्थिक उदारीकरण को एक अपरिहार्यता के रूप में देश पर थोप दिया गया। उसके बाद से निरंतर राज्य अपना कार्यक्षेत्र सीमित करता जा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्रों में विनिवेश के माध्यम से उन्हें निजी हाथों में सौंपा जा रहा है, सरकारी सेवाओं में अवसर कम हो रहे हैं, पेन्शान जैसी व्यवस्थाओं को खत्म कर सरकारी नौकरियों को आकर्षणहीन बनाया जा रहा है-निश्चिततः ऐसे में निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की जरूरत महसूस होने लगी है। रा’ट्र की इतनी बड़ी जनसंख्या को संसाधन और अधिकारविहीन रखना रा’ट्र् की प्रगति, विकास एवं समृद्धि के लिए अहितकर है। तकनीकी योग्यता के लिए क्षमतावान विद्यार्थियों के सामने उच्च शैक्षणिक संस्थाओं की अंगे्रजी भाषा व भारी-भरकम खर्चे आड़े आते हैं, मात्र इसलिए ये उस व्यवस्था में प्रवेश नहीं पा पाते और हीनता का अनुभव करते हैं। ये कहना कि उनमें योग्यता का अभाव है, उचित नहीं होगा। ऐसी परिस्थितियों में उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण की अनिवार्यता को समझा जा सकता है। प्रखर राष्ट्रवादी विचारक विवेकानन्द ने एक बार कहा था- ‘‘जब वे (शूद्र) जागेंगे और आप (उच्च वर्ग) द्वारा अपने प्रति किए गये शोषण को समझेंगे तो अपनी फूँक से वे (शूद्र) आप (उच्च वर्ग) सबको उड़ा देंगे। यह शूद्र वे लोग हैं, जिन्होंने आपको सभ्यता सिखायी और ये ही लोग आपका पतन भी कर सकते हैं।’’ वर्तमान परिप्रेक्ष्य को इन अवधारणाओं के बीच ही समझने की जरूरत है अन्यथा समाज की प्रतिगामी शक्तियाँ तो अपने परम्परागत विशेषाधिकारों के लिए सदैव ही सामाजिक न्याय जैसी विस्तृत अवधारणा को मात्र रोजी-रोटी से जोड़कर उनका क्षुद्रीकरण करने की कोशिश करती रहेंगी।

 

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रचनाकार परिचय:

नाम : राम शिव मूर्ति यादव

जन्म तिथि : 20 दिसम्बर 1943

जन्म स्थान : सरांवा, जौनपुर (उ0 प्र0)

पिता : स्व0 श्री सेवा राम यादव

शिक्षा : एम0 ए0 (समाज शास्त्र), काशी विद्यापीठ, वाराणसी

लेखन : देश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं- अरावली उद्घोष, युद्धरत आम आदमी, समकालीन

सोच, आश्वस्त, अपेक्षा, बयान, अम्बेडकर इन इण्डिया, अम्बेडकर टुडे, दलित साहित्य वार्षिकी,

दलित टुडे, मूक वक्ता, सामथ्र्य, सामान्यजन संदेश, कमेरी दुनिया, जर्जर कश्ती, दहलीज

इत्यादि में विभिन्न विषयों पर लेख प्रकाशित। प्रकाशित लेखों का एक संग्रह प्रेस में।

सम्मान : भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘‘ज्योतिबा फुले फेलोशिप सम्मान‘‘ एवं

राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ’’भारती ज्योति’’ से सम्मानित।

रूचियाँ : रचनात्मक लेखन एवं अध्ययन, बौद्धिक विमर्श, सामाजिक कार्यों में रचनात्मक भागीदारी।

सम्प्रति : उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्ति पश्चात स्वतन्त्र लेखन व अध्ययन एवं समाज सेवा।

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सम्पर्क : राम शिव मूर्ति यादव, स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी(सेवानिवृत्त),तहबरपुर, पो0-टीकापुर, आजमगढ(उ0प्र0)

ई-संपर्क - rsmyadav@rediffmail.com

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यादव जी, "शूद्र उड़ा क्या देंगे, हम जैसे गरीब सवर्णों को तो उड़ा भी चुके हैं", आरक्षण की मलाई तो पिछड़ों में भी खास-खास लोग ले गये हैं, लेकिन हमारी सुनने वाला कोई नहीं है… सवर्ण होकर भी हम "बीच" के बनकर रह गये हैं, क्योंकि पैसे वाला सवर्ण तो पैसा देकर कहीं भी घुस जाता है, आरक्षित वाला आरक्षण की बैसाखी लेकर, हम कहाँ जायें? न तो हमारे बच्चों को पैसे से आईआईटी, इंजीनियरिंग आदि में दाखिला मिलेगा, न जाति से, फ़िर क्या किया जाये? है कोई जवाब??? या हम ऐसे ही सड़ते रहें, क्योंकि हजारों वर्षों पूर्व हमारे किसी पूर्वज ने कोई अत्याचार किया था… आपका "आरक्षण" अधूरा है, जिसमें गरीबों के लिये कोई जगह नहीं है, यहाँ तक कि मेरे दोस्त (जो कि एसटी हैं) को फ़ॉर्म, फ़ीस, किराये सभी में छूट मिलती है, जबकि वह एक अफ़सर, प्रोफ़ेसर, बैंक अधिकारी के बेटे हैं, लेकिन मेरे बेटे को कोई रियायत नहीं है भले ही हम निम्न-मध्यम वर्ग से या गरीब हों… ऐसे में भला आप कैसे सोचते हैं कि सामाजिक समरसता बनाने में आरक्षण कोई मदद करता है? या फ़िर शायद हमें आजीवन "त्याग" ही करते रहना पड़ेगा? है कोई जवाब?????

बेनामी

जिन पिछडों की वार्षिक आमदनी साढे चार लाख रुपए से ज्यादा होगी, उन्हें की क्रीमीलेयर माना जाएगा और आरक्षण के दायरे से बाहर निकाला जाएगा। आरक्षण का समर्थन करते समय अनेक लोग मंडल आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हैं, जिसके अनुसार देश में पिछडी जातियों की आबादी 52 फीसदी है, जबकि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की रिपोर्ट (1999-2000) के अनुसार यह आंकडा सिर्फ 36 फीसदी ही है। इसमें से यदि मुस्लिम ओबीसी आबादी को हटा दिया जाए, तो यह आंकडा सिर्फ 32 फीसदी रह जाएगा। फिर, मान ही लें कि देश में पिछडों की आबादी 52 फीसदी है, तो भी यह नहीं माना जा सकता कि सभी पिछडों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। यह तब मिलेगा, जब अमीर पिछडों को आरक्षण के दायरे से बाहर किया जाएगा और उनको भी, जो आरक्षण का लाभ एक बार ले चुके हैं। यदि यह नहीं किया गया, तो आरक्षण भी बना रहेगा और उसका लाभ भी पिछडों की दबंग और धनी जातियां लेती रहेंगी तथा वास्तविक पिछडों का भला नहीं हो पाएगा।

कुल मिलाकर आरक्षण जिस रूप में आज चल रहा है, वह संविधान की सामाजिक न्याय की अवधारणा के विपरीत है, क्योंकि वह वोट बैंक की राजनीति से जुड गया है। तब स्वाभाविक यह भी है कि नए-नए वर्ग आरक्षण की मांग लेकर मैदान में आएंगे। हमने देखा कि राजस्थान के गुर्जर कैसे समय-समय पर दलितों में शामिल होने या अपने लिए अलग से पांच फीसदी आरक्षण के लिए सरकार व देश की नाक में दम कर देते हैं। चूंकि राजस्थान में वे एक बडे वोट बैंक भी हैं, इसलिए हमारी पूरी की पूरी राजनीतिक जमात उनके सामने घुटने टेक देती है।
http://siddharthashankargautam.blogspot.in/2011/03/blog-post.html

यादव जी आरक्षण जाती और धर्म के नाम पर क्यों चाहिए ,क्यों कि आपके जैसे उच्च पद और पैसे वाले लोग जाती के नाम पर आरक्षण रूपी मलाई खाते रहे और आप अपने जाती के उन पिछड़े हुए लोगों को आगे करके समाज को दिखाते रहे कि आपके जाती को इसी पिछड़ापन के चलते आरक्षण चाहिए अन्यथा ये लोग समाज में उठ नही पाएगे परन्तु आप जैसे शिक्षित लोग भली भाति ये बात जानते है कि आज के समय में पिछड़ा पन का मुख्य कारण उसका आर्थिक स्थिति है। MP, MLA,IAS,IPS Dr.,Eng.या आपके जैसे अन्य उच्च पदों पर बैठे लोगों के परिवार के लोग अगर समाज के प्रति अपनी नैतिक जिमेवारी निभाते हुऐ आरक्षण का लाभ लेना मात्र 5 वर्ष के लिए छोड़ दे तो उसके बाद आरक्षण का जरूरत नही पड़ेगा ?

बेनामी

पिछड़ो का आरक्षण आर्थिक आधार पर ही है.. 5 लाख से ज्यादा सालाना आय वाले क्रीमीलेयर घोषित है..इसलिए obc आरक्षण बिलकुल तर्कसंगत है.

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