गुरुवार, 26 जून 2008

मोहन वीरेन्द्र का आलेख : रचना क्या है?

 

रचना और आलोचना का अंतर्वलंबन

 

-मोहन वीरेन्द्र

 

रचना जीवन की आलोचना का सांस्कृतिक प्रकार्य है और आलोचना उस रचना में व्यक्त जीवन की खोज और विश्लेषण का रचनात्मक माध्यम। मुक्तिबोध की दृष्टि में आलोचक या समीक्षक का कार्य वस्तुत: कलाकार या लेखक से भी अधिक तन्मयतापूर्ण और सृजनशील होता है। उसे एक साध जीवन में वास्तविक अनुभवों के समुद्र में डूबना पड़ता है और उससे उबरना भी पड़ता है। निश्चित रूप से मुक्तिबोध के सामने आलोचना की नई चुनौंतियाँ खड़ी हो गई थीं, जिनसे कि उन्हें टकराना था। आलोचना को या तो रचना का पिछलग्गू मान लिया गया था या फिर आलोचना के विकास की सीमाएं अवरुद्ध हो गयीं थी। फलत: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने जिस आलोचना की बुनियाद डाली थी। उसका तर्क-संगत विकास नहीं हो सका। मुक्तिबोध की चिन्ता स्वाभाविक है इसीलिए उनका संकेत आलोचना के जीवन कर्म की ओर है और वह यह कि उसका कार्य जीवन की वास्तविकता का संवेदनात्मक ओर ज्ञानात्मक विकास करना है।

इस अर्थ में रचना के कर्म से आलोचना का कर्म भिन्न नहीं कहा जायेगा। इसी अर्थ में आलोचना भी सृजनात्मक कर्म है ठीक रचना की तरह यह तभी संभव है जब आलोचक को जीवन के विकास की स्थितियों की भागीदारी निभाने का तजुर्बा हो। कहा जा सकता है कि रचना और आलोचना दोनों समान रूप से जीवन की वास्तविकता को खोजने के लिए प्रयत्नशील हैं। खोज की इस प्रक्रिया में विविधता होना स्वाभाविक है; क्योंकि जीवन की वास्तविकता जटिल और द्वंदपूर्ण है, सपाट और एकांगी नहीं। इसलिए दोनों का मार्ग भिन् न-भिन् न होते हुए भी लक्ष्य समान है।

माना कि रचना जीवन की जटिलताऔं का उद्घाटन है तो आलोचना का कार्य यह खोज करना है कि रचना में व्यक्त जीवन वास्तविक भी है या नहीं। पाठक भी यह कार्य करता है। इसलिए विवेकवान पाठक या सहृदय भी एक आलोचक कहा गया है। यह भी हो सकता है कि रचनाकार पाठक का सहारा लेकर आलोचना की परवाह न करें; क्योंकि रचनाकार आलोचना की सत्ता को अपनी अनुवर्ती भी बनाना चाहता है। मैं इस बहस को फिलहाल आगे नहीं बढ़ाना चाहता। बात अन्तरावलम्बन की है। मैं यह मानता हूँ कि आलोचक के लिए भी जीवन का गहरा और व्यापक सरोकार वास्तविक आलोचना कर्म की ओर प्रेरित करता है। आलोचक के लिए भी जीवन के प्रति उतनी पक्षधरता आवश्यक है, जितनी कि एक रचनाकार के लिए। तटस्थ रहकर ईमानदार आलोचना कर्म संभव नहीं।

केवल साहित्यिक या अकादमिन मानदण्डों का पालन करके आलोचना अपने कर्तव्य से मुक्त नहीं हो सकती। यदि रचना जीवन का ह्रास करने वाले मूल्यों की वकालत करती है तो आलोचना की पटरी उसके साथ नहीं बैठेगी, ऐसे में आलोचना उग्र और कटु भी हो सकती है। पर ऐसा सर्वत्र और सदैव नहीं होता। परन्तु यदि आलोचना अपनी अन्ध जड़ता के आगे कविता के जीवन विकास के संकेतों को ग्रहण करने में असफल सिद्ध होती है तो कविता भी उसका जवाब अवश्य देगी। इसका तात्पर्य यह नहीं कि कविता आलोचना परम्परा की सत्ता को ही अस्वीकार कर दे। मुक्तिबोध ने समीक्षा की समस्याएँ, विषय पर चर्चा करते हुए इन सीमाओं का स्पष्ट उल्लेख किया है। यहाँ कवि और समीक्षक दोनों की स्थितियों पर विचार किया गया है। नागार्जुन ऐसी ही आलोचना से क्षुब्ध होकर व्यंग्य का सहारा लेते हैं। वे पूरे आलोचना कर्म के विरोधी नहीं हैं: अगर कीर्ति का फल चखना है कलाकार ने फिर-फिर सोचा आलोचक को खुश करना है। नागार्जुन की ये पंक्तियां आलोचना की एक विशेष स्थिति की ओर संकेत करती है।

इसी प्रकार त्रिलोचन भी आलोचना कर्म की संकीर्णता का संकेत करते हैं :'रुख देख कर समीक्षा का अब मैं हूँ हामी/ कोई लिखा करे कुछ जल्दी होगा नामी' मैं यह नहीं मानता कि आलोचना को रचना का अनुवर्ती माना जाए, न ही रचना को आलोचना का अनुवर्ती माना जा सकता है। इन दोनों का सम्बन्ध द्वंदात्मक है; पर यह जरूर कहना चाहता हूँ कि आलोचना रचनाकार के जीवनानुभव को समझे, वह जीवनानुभव जो रचना में झिल-मिला रहा है। रचना में व्यक्त जीवन किस प्रकार का है और उसके कौन से कारण हैं ;इसकी पड़ताल भी आलोचना का धर्म है। यह स्वीकार करना पड़ेगा कि रचना में व्यक्त जीवन जैसा भी है, उसके भी ऐतिहासिक और भौतिक कारण हैं। इससे इंकार कर आलोचना अपने दायित्व का निर्वाह ईमानदारी के साथ नहीं कर सकती। आलोचना पर यह आरोप लगाया जाता है कि वह रचना के जीवन संवेदना से शून्य होकर विचार और चिंतन का सहारा लेती है, पर यह आरोप बेबुनियाद है। ऐसा कहना आलोचना मात्र को कठघरे में खड़ा करना है, जबकि आलोचना का कार्य रचना को समझना प्रकारान्तर से, संवेदनात्मक जीवन को समझना भी है।

जीवन को समझने के मूलाधार अलग-अलग हो सकते हैं। आलोचना उन मूलाधारों की खोज करती है। इन मूलाधारों की खोज रचना के उपकरणों को केन्द्र में रखकर की जाती है। आलोचना का यह भी कार्य है कि जीवन में उन मूलाधारों की सार्थकता या निरर्थकता की खोज करे। रचनाकार को इस पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए। आलोचना के अपने नियम और सिद्धान्त भी होते हैं। वस्तुत: आलोचना भी एक अनुशासन है। इन सिद्धान्तों या नियमों के प्रयोग का एक तरीका होता है। रचना की तरह आलोचना के ये सिद्धान्त भी जीवन पर अवलम्बित हैं। इस तथ्य को स्वीकार कर ही आलोचना-आलोचना को विश्वसनीय और प्रामाणिक बनाया जा सकता है इसलिये आलोचना का यह भी कार्य है कि वह जीवन के वास्तविक संवेदनात्मक सत्य का साक्षात्कार करते हुए, रचना के संवेदनात्मक सत्य का उद्घाटन करते हुए रचनाकार को रचना के वस्तु सत्यों से अधिक से अधिक परिचित करायें। उस पर नई से नई रोशनी डाले, जिससे रचनाकार के लिए भी वह प्रेरक सिद्ध हो सके। रचना भी आलोचना के लिए नई चुनौती बनकर आये।

रचना और आलोचना के इस अन्तरावलम्बन में आलोचना और रचना परस्पर सहयोगी की भूमिका का निर्वाह करती है। आलोचक रचनाकार की चेतना की परिधि को व्यापक बनाता है; पर शर्त यही है कि आलोचक को जीवन सत्यों के विषय में रचनाकार से अधिक परिचित होना पड़ेगा। वस्तुतः आलोचना के लिए खुले और अनुशासित, साथ ही संवेदनशील मस्तिष्क की आवश्यकता है। उसे रचना में व्यक्त खरा और बट्टा लगे जीवन में फर्क करना है। यही आलोचना की ईमानदारी है। वस्तुतः आलोचना का काम केवल शब्दों की बाजीगरी द्वारा एक ऐसे ठाठ का निर्माण नहीं करना है जिसमें जीवन का अंश ही न हो। आलोचना जीवन जीतने की प्रक्रिया के मार्ग की खोज का नाम है। इसी अर्थ में वह रचनात्मक प्रकार्य है आज की रचनात्मक आलोचना यह कार्य बखूबी कर रही है। उसमें एक रचना का आस्वाद मौजूद है। वह रचना के जीवन-सत्य से परिचित कराने के मददगार साबित हो रही है।

भारतीय साहित्य शास्त्र में रचना और आलोचना के सम्बन्धों पर लगातार विचार होता रहा है यहाँ आलोचना की दोयम दर्जें का कार्य कभी नहीं माना गया। राजशेखर इसका प्रमाण है। आलोचना की निन्दा और तिरस्कार पश् िचम में हुआ। गेटे ने आलोचक को कुत्ता कर उसे मार डालने तक की बात कही। उसी के चलते रचना और आलोचना के मध्य एक भयानक अन्तराल आया। पर क्या एक रचनाकार खुद आलोचक नहीं होता। वह अपनी रचना का पाठक और आलोचक एक साथ होता है। तब आलोचना को गैर रचनात्मक कार्य कैसे नहीं कहा जा सकता है। वह तो उत्पादक श्रम का एक विशिष्ट प्रकार है। यह बात जरूर है कि आलोचना रचना को अराजक रूप से समझने के लिए स्वतंत्र नहीं है। रचना के साथ उसे संघर्ष करना होता है, जूझना पड़ता है। यह द्वंदात्मक संघर्ष जरूरी है शर्त यही है कि वह रचना को केन्द्र बनाकर अपनी परिधि की संभावनाओं का विकास करे। आलोचना के भीतर से रचनाकार को खोजना होता है। इसीलिए रचना ओर आलोचना को एक दूसरे का विरोधी नहीं, वरन् सहयोगी भी कहा जा सकता है। तभी आलोचना रचना को अराजक होने से बचा सकता है।

इतिहास में ऐसे दौर आये हैं जब ईमानदारी आलोचना के अभाव में रचना अराजक हुई है। फलत: रचना के विकास मानवीय संवेदन से शून्य सिद्ध हुआ है। जब रचना और आलोचना दोनों का केन्द्र मनुष्य का केन्द्र मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन है तो फिर इन दोनों के रिश्ते में फाँक कहां से आ गयी। इसमें एक दूसरे पर जिम्मेदारी डालना साहित्य की राजनीति कहर की बात होगी। वस्तुत: इस स्थिति का सबसे बड़ा कारण अतिवाद रहा है और वह अतिवाद भी एक तरफा नहीं है। चरम स्वीकार और चलते, इन दोनों के रास्ते अलग हुए और दूरियां आगे बढ़ी। इतिहास की कुछ परिस्थितियों के कारण ऐसा होना अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता । इन स्थितियों ने आलोचना की परस्पर विरोधी पद्धतियों को जन्म दिया। लेकिन तब से अब इतिहास आगे बढ़ गया है। अब विरुद्धों का सामंजस्य हो गया है; ; चाहे रचना में हो या आलोचना में एक स्वस्थ परंपरा पुन: कायम हुई है। इसीलिए रचना और आलोचना के अन्तरावलम्बन का सवाल नये सिरे से उठाया जा रहा है। इन दोनों की मैत्री ने विकास की नयी संभावनाओं को जन्म दिया है। दोनों का उद्देश्य मनुष्य की सम्पूर्णता की खोज करना है। यह बात जरूर है कि आलोचना रचना के उन्हीं तत्वों को खोजने का कार्य करती है जो विकासमान होते हैं। इसीलिए वह रचना में झिलमिलाते गतिशील जीवन को पकड़ती है।

प्रकारान्तर से रचना में यह खोज रचनात्मक तरीके से की जाती है। यहाँ मैं आलोचना की यांत्रिक पद्धतियों की बात नहीं कर रहा हूँ जैसा कि अकादमिक, कलावादी या शैलीवादी आलोचनाओं में होता है, जिनके कि अपने पूर्वाग्रह होते हैं, जिनके मूल्यांकन के मानदण्ड रचना से बाहर के होते हैं। यदि रचना के अपने आन्तरिक नियम हैं तो आलोचना भी एक अनुशासन का नाम है। यह ठीक है कि रचना जीवन-संघर्ष और आत्मसंघर्ष के रास्ते से आती है तो आलोचना भी इस संघर्ष में रचना के साथ होती है। दोनों एक दूसरे की सहयोगी बनकर आती है। तो फिर रचना आलोचना की भूमिका को आसानीं से स्वीकार क्यों नहीं करती। आलोचना अपनी वस्तुपरक स्थिति के कारण रचना को बाध्य करती है। रचना से एक सतर्क विवेक की मांग करती है। मुक्तिबोध ने इसे ही संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना कहा है। आलोचना को पता है कि उसका उपजीव्य रचना ही है। इसलिए रचना और आलोचना का द्वंदात्मक रिश्ता दोनों के लिए अनिवार्य है। यदि रचनाकार रचने के लिए सतर्क और प्रतिबद्ध है तो आलोचना उसे जांचने-परखने के लिए संकल्पवान। इन दोनों के बीच एक सहज संघर्ष देखा जाता है। यह संघर्ष भी दोनों के लिए प्रेरणाप्रद है।

प्रकारान्तर से लेखक ने सांस्कृतिक निकाय में हम दोनों सफर हैं। दोनों की भूमिका समान रूप से जिम्मेदारी पूर्ण है। आज जब कि सभी कुछ वर्ग विभक्त हो गया है। रचना और आलोचना की शक्ति का निर्माण भी वर्ग की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति से होता है। इसलिए दोनों के तत्व भी बुनियादी रूप से एक समान हो सकते है। तभी यह भी कहा जा सकता है कि रचना और आलोचना सांस्कृतिक प्रक्रिया के अविभाज्य अंग हैं, जो विरुद्धों के सामंजस्य से बनती हैं। इसीलिए एक रचनाकार समय आने पर आलोचक के दायित्व का का निर्वाह भी करता है। आज आवश्यकता रचना और आलोचना के रिश्तों को मजबूत बनाने की है; फूट डालने की नहीं; क्योंकि रचना और दोनों को मिलाकर ही साहित्य पूर्णता प्राप्त कर सकता है। इसी के रचनाकार के अन्तर्बाह्य को जानना भी आलोचना के लिए आवश्यक है। इससे आलोचना को विश्वसनीय बनाया जा सकता है।

जीवन लक्ष्यों की वास्तविकता मानव यथार्थ का ज्ञान बँटवारे की चीजें नहीं हैं। ये रचना के लिए भी आवश्यक हैं, जितना आलोचना के लिए। सिद्धान्तों का समावेश भी इसी के अन्तर्गत है, इससे बाहर जाकर नहीं। फैसले दागने से ही सब कुछ नहीं हो जाता। आलोचना का काम फैसला करना नहीं है। विश्लेषण और विवेचन भी आवश्यक है। चाहे अच्छाई हो या बुराई स्पष्टीकरण की आवश्कता उचित है। आत्म निरपेक्ष होना रचना और आलोचना दोनों के लिए आवश्यक है। आलोचना भी एक तरह का कलात्मक चिंतन है और सृजन भी इसलिए वास्तविक मानव जीवन का ज्ञान हुए बिना वह विवेक विकसित नहीं हो सकता जो रचना तो क्या आलोचना कर्म के लिए भी आवश्यक है। ऐसी आलोचना रचना से कम प्रभावी नहीं होती। ऐसी आलोचना सार संग्रह का कार्य करती है। तभी रचना में जो अवांछनीय हैं, आलोचना उसका निषेध और विरोध भी करती है। यह विरोध भी रचनात्मक हैं।

आलोचना का काम भले ही रखवारे और प्रहरी का न हो पर उसे रचनात्मकता की रक्षा करनी पड़ती है। रचना उस़से यही अपेक्षा करती है। अत: यह देखना आवश्यक है कि आलोचना के पास चीजों को व्यवस्थित रूप देने की क्षमता है या नहीं, उसके पास ज्ञानात्मक और संवेदनात्मक प्रकाश है कि नहीं, वह जिन औजारों से रक्षा करना चाहती है वे औजार मोर्चे के लिए उपयुक्त भी हैं या नहीं। इसका बहुत ज्यादा सामान्यीकरण इस लिए संभव नहीं है; क्योंकि रचना प्रक्रिया भी एक सामान्यीकृत प्रक्रिया नहीं है और न ही रचनाप्रक्रिया को यांत्रीकृत किया जा सकता है। वस्तुत: रचना प्रक्रिया बहुत कुछ आत्मबद्ध क्रिया भी हो जाती है परन्तु आत्मकेंन्द्रित नहीं ; अत: उसकी सामाजिकता भी नष्ट नहीं होती है। अत: अलग-अलग रचनाकार रचना प्रक्रिया का भिन्न-भिन्न अनुभव अर्जित करता है और वह संवेदन की नवीनता की खोज करता है। आलोचना का काम सभी को एक लाठी से हांकने के समान नहीं है। उसे अपने औजारों का एक ही अनुपात और संतुलन सर्वत्र प्रयोग करने की छूट नहीं दी जा सकती। इसके परिणाम कभी भी अच्छे नहीं निकले हैं। ऐसी स्थिति रचना के साथ न्याय कतई नहीं कर सकती।

यह भी जरूरी नहीं है कि एक समीक्षक अलग-अलग रचनाकारों का एक जैसा एप्रीसियेटिव विश्लेषण और मूल्यांकन करे, पर इसका यह भी मतलब नहीं कि हम इस आलोचक के सम्पूर्ण आलोचना कर्म को ही खारिज करदें। कई बार पूरी आलोचना के भीतर हमें प्रकाश की एक ऐसी हल्की और बारीक किरण मिल जाती है कि हम उसी की रोशनी में रचना की गहराइयों तक पहुँच जाते हैं। इसलिए आलोचना से सार संग्रह की मांग करना भी गलत नहीं कहा जायेगा। जहाँ तक रचना का प्रश्न है चुनाव यहाँ भी करना पड़ता है। इसलिए वही रचना हमें अपनी ओर आकर्षित करने में समर्थ भी होती है, जो नवीनता को धारण करती है, जो जीवन को काव्यमय बना देती है।

(टीडीआईएल हिन्दी पाठ कार्पोरा से साभार)

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