नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ खोज कर पढ़ें -
 नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.

के. पी. सक्सेना के दो व्यंग्य

साझा करें:

किसान...बैल, और... आदमी और जानवर के बीच का सांस्कृतिक अन्तर जानते हैं आप ? नहीं जानते होंगे। मै बताता हूँ।...मोटे तौर पर अगर कोई जानवर मनु...

किसान...बैल, और...

आदमी और जानवर के बीच का सांस्कृतिक अन्तर जानते हैं आप ? नहीं जानते होंगे। मै बताता हूँ।...मोटे तौर पर अगर कोई जानवर मनुष्यों जैसा कर्म कर बैठे तो रातों रात प्रसिद्ध हो जाता है...खबरों में आ जाता है।...इसके विपरीत, आदमी जानवरों जैसा आचरण करता रहे तो इसे कोई खास खबर नहीं माना जाता।...आदमी के सारे गुनाह माफ हैं, क्योंकि जुर्म भी आदमी ही करता है और कानून भी आदमी ही बनाता है। ...आपको एक बैल की सच्ची श्री कथा सुना रहा हूं।...सुनिये और जन-तांत्रिक ढंग से गुनिये।...

भिन्ड (ग्वालियर) के इलाके में एक किसान अनाज बेचकर नोटों की मोटी गड्डी लाया। अपनी इस कमाई को सुरक्षित रखने के लिए, नोटों को भूसे के ढेर में दबा दिया। किसान जी की वाइफ ने रोजाना के नियमानुसार भूसा बैलों को डाला और साथ ही नोटों की गड्डी भी बैल महोदय के लंच में चली गई। बैल जी थके माँदे खेत से लौटे थे, सो दनादन भूसा खाना शुरू कर दिया। मालूम तब हुआ जब यान (चारे की जगह) की सफ़ाई करते समय नोटों के चबाये और अध चबाये टुकड़े पड़े मिले। बैल चुपचाप जुगाली कर रहा था और मुंह से नोटों के टुकड़े बह रहे थे। किसान जी माथा पीट कर रह गये। बैल जी निर्दोष खड़े थे।

इस सत्य कथा से सरकारी निष्कर्ष यह निकलता है कि आप अपने पैसे बैंक-पोस्ट आफिस में जमा करो और देश की तरक्की में योगदान दो। ...मेरे पास चूंकि आम हिन्दुस्तानी की तरह जमा करने के लिए पैसे ही नहीं बचते, सो मैं इस पूरे प्रसंग पर जरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चिन्तन कर रहा हूं। बैल क्या हैं ?...नोट क्यों है ?...चारा किसे कहते हैं ? वगैरा-वगैरा..इतना तो आपने किताबों में पढ़ा ही होगा कि हमारा भारत एक कृषि प्रधान और राजनीति प्रधान देश है। दोनों ही क्षेत्रों में बैलों की कमी नहीं है।...बैल उस पशु को कहते हैं जो चुपचाप आंखें मिलाये बगैर माल डकार लेता है और सिर झुकाये जुगाली करता रहता है।...उसके सम्बन्ध में कौन क्या कह रहा है, इसका बैल की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। एकदम निर्विकार...सीधा सादा।...खेती से 'भूतपूर्व' हो जाने के बाद भी बैल संचित माल की जुगाली करता रहता है।...उसे किसी की कटु आलोचनाओं की कोई चिन्ता नहीं।...जो चाहे कमीशन बिठा दे।...

अब प्रश्न यह उठता है कि जब एक-से-एक हाई पावर भूतपूर्व बैल नोटों की गड्डियाँ पर गड्डियाँ डकार गया और जुगाली तक न की तो फिर इस बेचारे भिन्ड के बैल को बदनाम करने से क्या हासिल। ...इसे परम्परा क्यों नहीं मान लिया जाता कि जो बैल है उसे नोट डकारने का हक है।...

आप भाई साहब, पिछले ३६ वर्षों का इतिहास और गणित उठाकर देख लो कि कितना किसान के हिस्से में आया, कितना बैलों के ? बैल हमेशा किसान के आगे-आगे चलता है। आगे चलने वाले का हिस्सा भी ज्यादा हो सकता है। किसान माथा पीट कर रह जाता है कि काश वह एक विशेष किस्म का 'सफेद बैल' हो जाता और उसे भी नोट चबाने की सुविधा रहती।...होटल एग्री-कल्चर पर निगाह डालें, आप! किसान वहीं का वहीं है...जमीन वहीं की वहीं हैं...बैल अपनी घण्टी बजाता हुआ आगे बढ़ गया है।...ग्रामसभा से कमेटी...कमेटी से असेम्बली, असेम्बली से संसद...संसद से...जाने कितने ही खेत-खलिहान लांघ गया बैल। किसान की आँख में अब भी उतने ही आंसू हैं जितने गाँधी बाबा या लार्ड कर्जन के टाइम में थे...बल्कि कुछ ज्यादा ही।

मैं यहाँ पर उन किसानों की बात नहीं कर रहा हूँ जिन्हें कृषि विकास प्रदर्शनियों के पोस्टरों में बीवी बच्चों के साथ हंसते गाते दिखाया जाता है। वे सब नुमायशी और काल्पनिक किसान हैं जो सिर्फ पोस्टरों पर सजते हैं... हल नहीं चलाते...उधर हर बैल हर किसान से अधिक पावरफुल होता है।...बैल बनते ही वह अपनी शक्ति आँक लेता है और किसान के भूसे के साथ-साथ उसके नोट भी चबा लेता है। किसान खामोश रहता है। वह जानता है कि इतिहास हमेशा बैलों से बनता है...किसानों से नहीं।

बैल की एक खास खूबी यह भी होती है कि चाहे वह किसी रंग का हो, खुद को किसानों का सच्चा हमदर्द कहता है।...किसान घबरा जाता है कि बैलों की इस भीड़ में सच्चा बैल कौन है।...उसकी आत्मा जानती है कि चाहे कोई सा भी बैल क्यों न हो चारे के साथ उसके नोट जरूर चवायेगा। फिर भी किसान रैली में जाता है और भेंट देकर लौट आता है। वह जानता है कि बैलों से उसका जनम-मरन का नाता है।...बैल ही उसका भाग्य विधाता है।...

मैंने यूंही बाई द वे, भिन्ड वाले बैल साहब से पूछा कि जनाब, आपने गरीब किसान की साल भर की कमाई क्यों चबा डाली ?...बैल साहब मुस्कराये ओर बोले-'चबाना और सींग मारना हमारी आदत है।...हम नहीं चबाते तो कोई दूसरा बैल चबा जाता।...किसान को नोटों की गड्डी की क्या जरूरत ? उसे सिर्फ अपना कर्म करना चाहिए और फल 'बैलों'के लिए छोड़ देना चाहिए, यही कृषक धर्म है ! जमींदारी युग से यही चला आ रहा है !...किसान के पास यदि नोट सही सलामत रह गये तो हम बैलों को पूछेगा कौन ?..वह ट्रैक्टर नहीं खरीद लेगा ?...श्री बैल के ऐसे श्रीवचन सुनकर बैलों के प्रति मेरी आस्था और भी बढ़ गई!...किसान का क्या? उसका यही धर्म है कि हर सुबह पीपल पर उगते सूरज की रोशनी में नई फसल का ख्वाब देखे और हम डूबते सूरज के साथ अपने सपने दफन कर दें !...उसे अपनी सारी उम्र बैलों के चारे का बन्दोबस्त करते हुए ही गुजारनी है !

इन दिनों 'बैल' और भी सक्रिय हो उठते हैं और अपनी आस्मानी हमदर्दी ऊपर से बरसाने लगते हैं।...किसान कृतज्ञ हो उठता है कि बैलों की हमदर्दी उसके साथ है !...बैलों की आंख़ों में भी आँसु हैं ! उसे और क्या चाहिये ?... मेरा ख्याल है कि अब आप आदमी और जानवर...किसान और बैल के बीच का फर्क समझ गये होंगे ! अत: भिन्ड के बैल ने किसान के नोट चबाकर सिर्फ अपना बैल धर्म निभाया है !...दोष किसान का है ! नोट भूसे में क्यों रखे?...क्या वह जानता था कि इन नोटों पर उसका कोई हक नहीं है ? क्या उसे पता था कि नोट अन्तत: 'बैल' के हवाले ही होने हैं। बैल से मैं बातचीत कर चुका हूँ...किसान का इटंरव्यू बेकार है !... सब कुछ दे चुकने बाद किसान इंटरव्यू देने लायक नहीं रह जाता है !

============.

चन्दनवुड चिल्ड्रन स्कूल...!

आँख मुलमुल...गाल...गुलगुल...बदन थुलथुल, मगर आवाज बुलबुल ! वे मात्र वन पीस तहमद में लिपटे, स्टूल पर उकडूं बैठे, बीड़ी का टोटा सार्थक कर रहे थे ! रह-रह कर अंगुलियों पर कुछ गिन लेते और बीड़ी का सूंटा फेफड़ों तक खींच डालते थे! जहां वे बैठे थे वहाँ कच्ची पीली ईंट का टीन से ढका भैंसों का एक तवेला था ! न कोई खिड़की न रौशनदान ! शायद उन्हें डर था कि भैंसें कहीं रोशनदान के रास्ते ख़िसक ने जाएं ! सुबह सवेरे का टाइम था और भैंसें शायद नाश्तोपराँत टहलने जा चुकी थीं ! तवेला खाली पड़ा था ! उन्होंने मुझे भर आँख देखा भी नहीं और बीड़ी चूसते हुए अंगुलियों पर अपना अन्तहीन केल्क्यूलेशन जोड़ते रहे !...

मैंने उनसे सन्दलवुड चिल्डन स्कूल का रास्ता पूछा तो उनकी आंखों और बीड़ी में एक नन्ही सी चमक उभरी !...धीरे से अंगुली आकाश की ओर उठा दी गोया नया चिल्ड्रन स्कूल कहीं अन्तरिक्ष में खुला हो ! मगर मैं उनका संकेत समझ गया ! नजर ऊपर उठाई तो तवेले की टीन के ऊपर एक तख्ती नजर आई, जिस पर गोराशाही अंग्रेजी में कोयले से लिखा था-दि सन्दलवुड चिल्ड्रन स्कूल !...प्रवेश चालू ! इंगलिश मीडियम से कक्षा ६ तक मजबूत पढ़ाई ! प्रिन्सिपल से मिलें !...

'तख्ती पढ़कर मैं दंग रह गया !...यही है चंदन लकड़ी स्कूल ?...चंदन दर किनार, कहीं तारपीन या कोलतार तक की बू नहीं थी ! मेरी मजबूरी अपनी जगह थी ! मुहल्ले के गनेशी लाल के पोते के दाखले की जिम्मेदारी मुझ पर थी ! खुद गनेशी लाल उम्र भर पढ़ाई लिखाई की इल्लत से पाक रहे और अपने बेटे को भी पाक रखा ! सिर्फ गुड़ की किस्में जान लीं और खान्दानी कारोबार चलाते रहे ! मगर पोता ज्यों ही नेकर में पांव डालने की उम्र को पहुंचा, उनकी पतोहू ने जिद पकड़ ली कि छुटकन्ना पढ़ि़ है जरूर, और वह भी निखालिस इंगलिश मीडियम से !...उसकी नजर में हिन्दी मीडियम से पढ़ने से बेहतर है कि गुड़ बेच ले !

पतोहू ने अपने मैके में देखा कि अंग्रेजी मीडियम से पढ़े छोकरे कैसे फट-फट आपस में इंगलिश में गाली गलौज करते हैं !...एक स्मार्टनेस सी रहती है सुसरी !...चुनांचे गनेशी लाल मेरे पीछे पड़ गये कि छोकरे को कहीं अंग्रेजी मीडियम में डलवा ही दूं !...उधर जुलाई-अगस्त की झड़ी लगते ही चिल्ड्रन स्कूलों में वह किच-किच होती है कि आदमी अपना मरा हुआ बाप भले ही दोबारा हासिल कर ले, मगर बच्चे को स्कूल में नहीं ठूंस सकता !...

अंग्रेजी के 'डोनेशन' और हिन्दी के 'अनुदान' का फर्क इसी वक्त समझ में आता है आदमी को ! अनुदान के बीस रूपयों में बच्चा हिन्दी मीडियम में धंस जाता है, मगर डोनेशन तीन अंकों से नीचे होता ही नहीं !...अंग्रेजी की ग्रेटनेस का पता यहीं पर चलता है ! खैर...! शिक्षा सन्दर्भ में यह एक अच्छी बात है कि बारिश में फूली लकड़ी पर उगे

कुकुरमुत्तों की तरह, जुलाई-अगस्त में चिल्ड्रन स्कूल भी दनादन उग आते हैं ! हर गली-मुहल्ले में भूतपूर्व लकड़ी की टालों और हलवाईयों की दुकानों पर नर्सरी मोन्टेसरी स्कूलों के बोर्ड टंग जाते हैं ! हर साइन बोर्ड का यही दावा होता है कि हमारे यहाँ बच्चा माँ की गोद जैसा सुरक्षित रहेगा और आगे चलकर बेहद नाम कमायेगा !...ऐसे ही दुर्लभ तथा नये उगे स्कूलों में 'सन्दल वुड चिल्ड्रन स्कूल' का नाम भी मेरे कान में पड़ा था !

नाम में ही चंदन सी महक और हाली-वुड जैसी चहक थी !...और अब मैं टीन जड़ीत, रोशनदान रहित उसी स्कूल के सामने खड़ा था !... बीड़ी तहमद वाले थुलथुल सज्जन ने आखिरी कश खींच कर बीड़ी को सदगति तक पहुंचाया, और तहमद के स्वतन्त्र कोने से मुंह पोंछ कर आंखों ही आंखों में पूछा कि क्या चाहिए ?...मैंने दोनों हाथों से बच्चे का साइज बताया और धीरे से पूछा कि प्रिंसिपल कहाँ हैं...कब उपलब्ध होंगे ? वे भड़क गये ! गुर्रा कर बोले-'हम आपको क्या नजर आवे हैं ? टाई-कमीज अन्दर टंगी है तो हम प्रिन्सिपल नहीं रहे ? जरा बदन को हवा दे रहे थे ! आप बच्चा और फीस उठा लाइए ! भर्ती कर लेंगे ! '

मैं सटपटा गया और इस बार उन्हें उस ढंग से अभिवादन पेश किया जिस ढंग से अमूमन अंग्रेजी मीडियम से होता है ! यह पूछने पर कि बाकी टीचिंग स्टाफ कहाँ है, उन्होंने बताया कि बाकी का स्टाफ भी वह खुद ही हैं ! क्लास थ्री स्टाफ भी, और क्लास फोर (झाडू, पोंछा, सफाई) भी !...दो अदद लेडी टीचस भी हैं, जिनमें से एक उनकी मौजूदा पत्नी हैं और दूसरी भूतपूर्व ! फिलहाल दोनों घर में लड़ाई-झगड़े में मसरूफ हैं ! चट से टीचिंग सेशन शुरू होते ही आ जाएगी !...अभी कुल तेईस बच्चे नामजद हुए हैं ! पच्चीस पूरे होते ही ब्लैक बोर्ड मंगवा लेंगे और पढ़ाई जो है उसे शुरू करवा देंगे !...मुझे तसल्ली हुई ! डरते-डरते पूछा-खिड़कियां, रोशनदानों, पंखों और बैंचों वगैरा का झंझट आपने क्यों नहीं रखा ?'...

वे दूरदर्शी हो गए !...आप चाहते हैं कि बच्चों को अभी से आराम तलब बना दें ?... ग्लासगो कभी गए हैं आप ? वहाँ के सन चालीस के पैटर्न पर हमने स्कूल शुरू किया है ! बच्चों को, उसे क्या कहते हैं...हां...हार्डशिप की आदत डालनी होगी !...फिर धीरे-धीरे सब कुछ हो जइहे !...अगले साल रोशनदान खुलवा देंगे...फिर अगले साल पंखों वगैरा की देखी जाएगी !...पईसा चाहिए, कि नाहीं चाहिए ?...पच्चीस बच्चों की फीस लईके सुरू में ही आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी खोल दें का ?...टाइम पास होते-होते सब कुछ हुई जयिहे !...बच्चा ले आवो !...दो ही सीटें बची हैंगी !...

'सो साहब, चंदन वुड चिल्ड्रन स्कूल के प्रधानाचार्य के श्रीवचन सुनकर मैं काफी से भी अधिक प्रभावित हुआ ! सारी हिम्मत बटोर कर एक अन्तिम प्रश्न पूछा- 'माहसाब ! वैसे तो अपने इण् डिया में चारे-भूसे की कमी चाहे भले ही हो, मगर बच्चों का टोटा नहीं है ! फिर भी मगर दो बच्चे और न हाथ लगे तो क्या आप स्कूल डिजाल्व कर देंगे ?' वे पुन: भड़क गये !...आये गए सूबे-सूबे नहूसत फैलाने !... जिस भगवान ने तेईस बच्चे दिये, वह दो और नाहीं भेजिहे का ? डिजालव कर भी दें तो कौन सी भुस में लाठी लग जईहे ?...पहले इस टीन में पक्के कोयला कर गुदाम रहा !...सोचा कि इस्कूल डाल लें ! डाल लिया !...इन्ते पढ़े लिखे हैंगे कि कक्षा ६ तक पढ़ाये ले जावें ! नाहीं चल पईहे इस्कूल तो कोयले का लैसंस कोई खारिज हुई गवा है का ?...लपक के बच्चा लै आओ !...' मैं लपक कर चल पड़ा !...

रास्ते भर प्रधानाचार्य की उस अंग्रेजी से प्रभावित रहा जो एक फिल्मी गाने 'आकाश में पंछी गाइंग...भौरां बगियन में गाइंग' जैसी थी ! मास्साब दूर तक टकटकी बांधे मुझे उम्मीदवार नजरों से देख रहे थे, गोया कह रहे हों-बच्चा लईहे जरूर ! जईहे कहां ? इधर मैं यह सोच रहा था कि गनेशी लाल के पोते के भविष्य के लिए गुड़ बेचना मुनासिब रहेगा या सन्दलवुड चिल्ड्रन स्कूल में अंग्रेजी मीडियम से शिक्षा अर्जित करना ?...

(नोट-यदि किसी स्कूल का नाम यही हो, तो अन्यथा न लें ! नाम काल्पनिक है !...)

-----

(टीडीआईएल के हिन्दी पाठ कार्पोरा से साभार)

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 2
  1. बहुत रोचक मजेदार .धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  2. Nice post..

    हिन्दी के गौरव, के.पी.सक्सेना को हमेशा उनकी लेखनी के लिये याद किया जाएगा..

    http://blog.kapilvarma.in/kp-saxena/
    https://youtu.be/kMU5y5wMCKM

    उत्तर देंहटाएं
रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

---प्रायोजक---

---***---

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1$height=75

---प्रायोजक---

---***---

|कथा-कहानी_$type=three$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$height=85

|हास्य-व्यंग्य_$type=complex$rm=1$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$height=85

---प्रायोजक---

---***---

|काव्य-जगत_$type=three$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$height=85

|संस्मरण_$type=complex$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$height=85

---प्रायोजक---

---***---

|लघुकथा_$type=three$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$height=85

|उपन्यास_$type=complex$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$height=85

|लोककथा_$type=three$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$height=85

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधा/विषय पर क्लिक/टच कर पढ़ें : ~

|* कहानी * |

| * उपन्यास *|

| * हास्य-व्यंग्य * |

| * कविता  *|

| * आलेख * |

| * लोककथा * |

| * लघुकथा * |

| * ग़ज़ल  *|

| * संस्मरण * |

| * साहित्य समाचार * |

| * कला जगत  *|

| * पाक कला * |

| * हास-परिहास * |

| * नाटक * |

| * बाल कथा * |

| * विज्ञान कथा * |

* समीक्षा * |

---***---



---प्रायोजक---

---***---

|आपको ये रचनाएँ भी पसंद आएंगी-_$type=complex$count=6$src=random$page=1$va=0$au=0$height=85

प्रायोजक

----****----

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3979,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,338,ईबुक,193,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,262,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,110,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2951,कहानी,2217,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,521,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,31,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,94,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,339,बाल कलम,25,बाल दिवस,3,बालकथा,62,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,10,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,26,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,240,लघुकथा,1197,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1992,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,697,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,774,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,75,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,196,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,75,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: के. पी. सक्सेना के दो व्यंग्य
के. पी. सक्सेना के दो व्यंग्य
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2008/06/blog-post_24.html
https://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2008/06/blog-post_24.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय SEARCH सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ