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सीताराम गुप्ता का आलेख - उम्र के अहसास को बदलकर ही मिलता है चिर यौवन

sitaram gupta

एक अधेड़ उम्र की महिला दुकान पर कुछ सामान ख्‍़ारीदने के लिए गई लेकिन दुकान पर भीड़ देखकर चुपचाप खड़ी हो गई। दुकानदार ने पहले उनको सामान देना चाहा तो उन्‍होंने मना कर दिया और कहा, ‘‘मैं बाद में आराम से ले लूँगी।'' भीड़ छँट जाने के बाद महिला ने धीरे से दुकानदार से कहा, ‘‘मुझे हेयर डाई चाहिए।'' प्रश्‍न उठता है कि क्‍या हेयर डाई ख्‍़ारीदने के लिए इतनी गोपनीयता की ज़रूरत है? क्‍या हेयर डाई का प्रयोग करना ग़लत है? यदि ऐसा नहीं है तो फिर हेयर डाई ख्‍़ारीदते वक़्‍त इतनी मानसिक उलझन क्‍यों?

जैसे-जैसे आयु बढ़ती है शारीरिक परिवर्तन होना भी स्‍वाभाविक है। बालों का सफेद होना, चेहरे पर झुर्रियाँ दिखलाई पड़ना, दृष्‍टि कमज़ोर होना तथा सुनाई कम पड़ना कुछ ऐसे लक्षण हैं जो बढ़ती उम्र की ओर संकेत करते हैं। कुछ लोग इस स्‍थिति से अत्‍यंत भयभीत हो जाते हैं और इन लक्षणों को छुपाने का प्रयास करते हैं। बालों को रंगना या विभिन्‍न प्रकार की दवाओं के प्रयोग से जवान बने रहने की कोशिश करना ठीक है लेकिन क्‍या इससे बढ़ती आयु या बुढ़ापे से मुक्‍ति संभव है? ये बढ़ती आयु या बुढ़ापे को दूर करने के नहीं अपितु बढ़ती आयु या बुढ़ापे को छुपाने के उपाय हैं।

जब आप बुढ़ापे के विरुद्ध कमर कसते हैं तो इसका सीध सा अर्थ है कि आपने बुढ़ापे को स्‍वीकार कर लिया है। बालों का सफेद होना अथवा शारीरिक क्षमता में कमी क्‍या बुढ़ापे के लक्षण हैं? कुछ हद तक तो ये बात ठीक है लेकिन बुढ़ापा या वृद्धावस्‍था वास्‍तव में मन की एक अवस्‍था है। बुढ़ापे से बचने का जो एकमात्र महत्त्वपूर्ण उपाय है वो है उसे स्‍वीकार ही न करना। जब तक आप स्‍वीकार नहीं करेंगे आप बूढ़े हो ही नहीं सकते और ये स्‍वीकृति होती है मन से। मन में हमेशा युवा बने रहेंगे तो न बुढ़ापा दस्‍तक देगा और न शारीरिक कमज़ोरी।

किसी व्‍यक्‍ति को देखने मात्र से उसकी वास्‍तविक उम्र का पता नहीं चलता। कुछ लोग कम उम्र में ही वृद्ध नज़र आने लगते हैं तो कुछ रिटायरमेंट के बाद भी युवा नज़र आते हैं और इसका कारण है उनकी शारीरिक बनावट तथा आनुवंशिकता के साथ-साथ उनका बुढ़ापे के प्रति दृष्‍टिकोण या मनःस्‍थिति। यदि हम आयु की बात करें तो आयु भी मुख्‍य रूप से दो प्रकार की होती है। एक होती है शारीरिक उम्र तथा दूसरी होती है मानसिक उम्र। इसी प्रकार वृद्धावस्‍था भी शारीरिक तथा मानसिक दोनों ही तरह की होती है। शारीरिक वृद्धावस्‍था को मन की शक्‍ति द्धारा रोकना संभव है लेकिन जो मन से बूढ़ा हो गया उसका कोई उपचार नहीं।

भारत-रत्‍न से सम्‍मानित डॉ. मोक्षगुण्‍डम विश्‍वेश्‍वरैया ने सौ वर्ष से अधिक की आयु पाई और अंत तक सक्रिय जीवन व्‍यतीत किया। एक बार एक व्‍यक्‍ति ने उनसे पूछा, ‘‘आपके चिर यौवन का रहस्‍य क्‍या है?'' डॉ. विश्‍वेश्‍वरैया ने उत्तर दिया, ‘‘जब बुढ़ापा मेरा दरवाज़ा खटखटाता है तो मैं भीतर से जवाब देता हूँ कि विश्‍वेश्‍वरैया घर पर नहीं है और वह निराश होकर लौट जाता है। बुढ़ापे से मेरी मुलाक़ात ही नहीं हो पाती तो वह मुझ पर हावी कैसे हो सकता है?''

जैसा मन वैसा तन। जब कोई बूढ़ा न होने की ठान लेता है तो वह चिर युवा बना रहता है और अंत तक सक्रिय व सक्षम भी। वस्‍तुतः मनुष्‍य उतना ही बूढ़ा या जवान है जितना वह अनुभव करता है। बुढ़ापा तन का नहीं मन का होता है। मन जवाँ तो तन जवाँ। आप की सोच इस दिशा में सबसे महत्त्वपूर्ण है अतः सोच में सकारात्‍मक परिवर्तन द्वारा सदैव युवा बने रहें और सक्रिय जीवन व्‍यतीत करें। वैसे भी यदि आप सक्रिय जीवन व्‍यतीत करते हैं तो बुढ़ापा पास नहीं फटकता।

दीपक चोपड़ा कहते हैं कि बढ़ती उम्र के अहसास को परिवर्तित करके, विषाक्‍त मनोभावों तथा आदतों से छुटकारा पाकर, जीवन में सक्रियता अथवा क्रियाशीलता बनाए रखकर, जीवन में लचीला होने की विधि सीखकर तथा अपने जीवन में प्रेम को अत्‍यधिक महत्‍वपूर्ण तत्त्व बनाकर हम सदैव युवा बने रह सकते हैं।

साभार ः ‘‘द स्‍पीकिंग ट्री'' नवभारत टाइम्‍स, नई दिल्‍ली, दिनाँक ः 03ः11ः2008

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संपर्क

सीताराम गुप्‍ता

ए.डी.-106-सी, पीतमपुरा,

दिल्‍ली-110034

ईमेल - srgupta54@yahoo.co.in

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