गुरुवार, 5 मार्च 2009

कुछ लघुकथाएँ

ख़याल

पुरू मालव

 

मैं बाइक चला रहा था, वो पीछे बैठा था। सामने दो फ़ैशनेबल लड़कियां जा रही थीं। अपनी आदत के अनुसार वो आहें भरने लगा।

-यार, क्‍या मस्‍त आइटम है। सॉलिड बॉडी, फिट कपड़े, लहराते बाल। चलने का स्‍टाइल तो देखो। और ये बाज़ू वाली लड़की। अबे देख। कितने मोटे-मोटे कूल्‍हे हैं। तू टच हो जाए तो... समझ निकल ही जाए।

मैं बाइक चलाता हुआ चुपचाप बढ़ गया। उसने मुड़कर पीछे देखा और लगभग चीख-सा पड़ा-अरे!

-क्‍या हुआ?

-ये तो शालिनी है।

-कौन शालिनी?

-मॉय सिस्‍टर।

...

 

महाकुम्‍भ

पुरू मालव

 

-अपनी मां को कुम्‍भ के मेले में क्‍यूं नहीं ले जाते? पत्‍नी ने परम्‍परागत कारगर उपाय बताया।

-इतना लम्‍बा सफ़र मैं कैसे तय कर पाउंगी बेटा ? बुढ़ापे में शरीर भी तो साथ नहीं देता। मेले में भीड़ भी तो कितनी होती है। बेकार में तुम्‍हे दिक्‍कत होगी। तुम दोनों चले जाओ। शायद इस पुण्‍य से बहू की गोद हरी हो जाए।

- पर मां तुम अकेली कैसे रहोगी? बेटे ने फिक्र ज़ाहिर की।

-मेरी चिंता मत करों तुम लोग जाओ। मां ने मुस्‍कराकर कहा।

-चलो ये भी अच्‍छा हुआ। हमें आने-जाने में महीन-दो महीने तो लग ही जायेंगे। इतने समय में बुढ़िया सिधार जायेगी और गांव वाले क्रिया-क्रम भी कर देंगे। पत्‍नी ने दूसरा उपाय बताया।

दो-ढाई महीने बाद-

-अरे, बेटा ! तुम अकेले कैसे? बहू कहां है? मां ने आश्‍चर्य से पूछा।

बेटा सिर पकड़ कर बैठ गया और रोने लगा।

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विकल्‍प

पुरू मालव

 

पहली घटना-

-बेटा, बहू को भी अपने साथ ले जा। शादी ब्‍याह में साथ जाओ तो अच्‍छा लगता है।

-मगर पिताजी। आपकी देखभाल कौन करेगा? वैसे भी दोस्‍त की बहिन की शादी है। मैं ही चला जाता हूं।

-अरे बेटा। हम इतने भी बूढ़े नहीं हुए कि देखभाल की जरूरत पड़े। तू बहू को ले जा। मां ने कहा।

- मैं अनपढ, गंवार और बदसूरत हूं ना इसलिए नहीं ले जाते। शर्म महसूस होती है। पत्‍नी ने मन ही मन कहा।

दूसरी घटना-

- अरे बेटा। बहू को ले जाकर क्‍या करेगा? दोस्‍त के भाई की ही शादी है। तू ही चला जा।

-मगर पिताजी।

-बेटा, घर में भी बहुत काम रहता है। फिर आजकल तेरे पिताजी की तबीयत भी ठीक नहीं रहती। तू ही चला जा। मां ने कहा।

- मां, तुम तो जानती हो। इस समय बसों- ट्रेनों में कितनी भीड़ होती है। डेढ-दो घण्‍टे क्‍यू में लगो तो टिकट मिलता है। और इस भीषण गर्मी में डेढ-दो घण्‍टे..!

-तो इसमें बहू क्‍या करेगी? पिताजी संयत स्‍वर में खीझते हुए बोले।

-लेडिज़ क्‍यू में...।

........

पुरू मालव

ग्राम/पोस्‍ट-दीगोद खालसा

तह.-छीपाबड़ौद, जिला-बारां ;राजस्‍थानद्ध 325221

purumalav@gmail.com

blog: http://purumalav.blogspot.com

 

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पहचाना नहीं

-सुनील गज्‍जाणी

‘‘भले ही तुम मेरी पत्‍नी होकर मेरा साथ ना दो, मगर मैं ये मानने को कतई तैयार नहीं हूं कि गजनी फिल्‍म के आमिर खान जैसा किरदार भी कोई इन्‍सान हक़ीकत में होता है क्‍या, कि जिसे याददाश्त सिर्फ पन्‍द्रह मिनट के लिये रहती है.....मैं इस मैगजीन में छपे आर्टिकल की कटु आलोचना करता हूं।''..... ‘‘डॉक्‍टर रिजर्व नेचर की मेरी पत्‍नी जाने कैसे तुमसे इतनी घुल-मिल गई जो इस आर्टिकल को लेकर तुम्‍हारा सपोर्ट कर रही है..... डॉक्‍टर......मुझे हस्‍पताल से छुट्टी कब दे रहे हो, मेरी मेडिकल रिपोर्ट का क्‍या हुआ। हॉँ..मेरी बीमारी तुम्‍हारे पकड़ में आयी है या नहीं या यूंही मुझ पर एक्‍सपेरीमेंट करे जा रहे हो, डॉक्‍टर लोग शायद मरीज को इन्‍सान नहीं जानवर समझकर अपने नित-नए प्रयोग करने की कोशिश करते हैं, हॉँ... तो डॉक्‍टर............।

‘‘क्‍या हुआ चुप क्‍ूयं हो गए ?'' बौखलाई सी पत्‍नी उसके पास जाती हुई बोली।

‘‘माफ कीजिए, मैने आपको जरा....पहचाना नहीं''

पत्‍नी डबडबाई आँखें लिए अपनी शादी का फोटो फिर से पति को दिखाने लगी।

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संपर्क:

 

Sunil Gajjani
President Buniyad Sahitya & Kala Sansthan, Bikaner
Add. : Sutharon Ki Bari Guwad
Bikaner (Raj.)

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