17 अप्रैल 2009

अनुज नरवाल रोहतकी की चंद व्यंग्य रचनाएं

जूते और नेता जी

समाज में मान्‍यता है कि किसी की औकात का पता लगाना है तो उसके जूतों को देखना चाहिए। लेकिन आज के समाज में जूतों को लेकर एक नई मान्‍यता सामने आ रही है वो जूता फेंकने की। इसका चलन कब षुरू हुआ इसके बारे में कोई नहीं जानता। लेकिन इसका पहला मामला ईराक में, दूसरा मामला भारत में और तीसरा मामला हरियाणा के कुरुक्षेत्र में दुनिया के सामने आया। तीनों मामलों में समानता एक ही है, वो है कि तीनों दफा जूता आवाम के नुमाईदों यानि सियायती लोगों पर फेंके गए।

जूता फेंकने को लेकर समाज में चर्चा हो रही है। चर्चा होनी भी चाहिए। ये चर्चा हंसने-हंसाने के लिए नहीं बल्‍कि जूता फेंकने की रवायत समाज में क्‍यों पनप रही है ? इस बात को लेकर होनी चाहिए। इसके लिए इन तीनों घटनाओं को नजदीक से मनन करने की जरूरत है। पहली घटना ईराक की है यहां एक ईराकी पत्रकार ने अमेरिका के राष्ट्रपति र्जोज बुश पर जूता फेंका था। दूसरा जूता भारतीय पत्रकार ने भारत के गृहमंत्री पी.चिदम्बरम पर फेंका और तीसरी ऐसी घटना हरियाणा के कुरुक्षेत्र में दिखने को मिली जहां एक व्‍यक्‍ति ने सांसद नवीन जिंदल पर जूता फेंका। तीनों ही घटनाओं में राजनेताओं पर जूता फेंका गया। ये तीनों घटनाएं ये संकेत करती हैं राजनेताओं से आम आदमी का यकीन उठ रहा है । समाज जिन उम्‍मीदों के साथ राजनेताओं का अपना नुमाईंदा बनाता है वे इन उम्‍मीदों पर पूरी तरह खरा नहीं उतर रहे हैं। इन तीनों घटनाओं में साफ-साफ देखा जा सकता है राजनताओं की ओर से समाज की अनदेखी की हुई। तब जाके समाज के सब्र का ये सागर छलका है। जो इन घटनाओं के रूप में हमारे सामने हैं।

अफसोस! ये कदम उठाने के लिए दो पत्रकारों और एक पूर्व प्राध्‍यापक ने सामने आना पड़ा। हमारे प्रबुध समाज ने इन घटनाओं पर विचार करने के स्‍थान पर इन घटनाओं को अपने मंनोरजन के दृष्टिकोण से देखा। ये हमारे समाज की कमजोरी है। अब भी वक्‍त है कि हम सोचे और विचार करें। समाज के लोग इन घटनाओं से कुछ सीखें। अपने नुमाईदों का चुनाव पूरे होश-ओ-हवाश में और दिल-ओ-दिमाग से करें।

विश्व के सभी नेताओं के सोचने का वक्‍त आ गया है। वे अब अपनी कुर्सी से पहले समाज के बारे में सोचे। समाज की भला कैसे हो ये सोचे। समाज कैस तरक्‍की करेगा ये सोचे। यदि कोई नेता ऐसा नहीं करता है तो वो तैयार रहें ................................. के लिए। क्‍यों आज का समाज ऐसा करने के लिए इन घटनाओं से काफी कुछ सीख चुका है।

dr.anuj narwal rohtaki

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मुद्‌दा है तो सियासत है

सियासत है तो ताकत है

नफरत है दिल में बगावत है

सबको सबसे शिकायत है

साधु-डाकू , नेता-अभिनेता

सबका सपना सियासत है

कुर्सी बाबत नफरत बोना

इनकी पुरानी आदत है

हर गुनाह है काबिले-मुआफी

गर नेता की ईनायत है

वो अपने सिवा किसी का नहीं

चापलूसी जिसकी आदत है

dr.anuj narwal rohtaki

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आजकल

कई लोग कहते मिलेंगे

कि

वोट दो

किसी का दो

पर वोट दो

ये हमारा अधिकार है

इससे बनती सरकार है

पर मैं पूछता हूं

अगर

चुनाव में उठे हुए

सभी उम्मीदवारों में से

मुझे कोई काम का न लगे

तो मैं क्‍या कंरू ?

वोटिंग मशीन का

कौन-सा बटन दबाउं

मैं किसकी सरकार बनाउं

वोटिंग मशीन में

नकारने का ऑप्शन नहीं है

किसी कोई टेंशन नहीं है

वोट एक पड़े या हजार

किसी न किसी की तो बनेगी सरकार

ये सरकार ही देश चलाएगी

और जनता को बरगलाएगी।

काश! अगर ये होता

वोटिंग मशीन में नकारने का ऑप्शन होता

मैं भी वोट देने के लिए लाईन में खड़ा होता

और मेरे जैसे करोड़ों का सपना सच होता

ऐसे में लोकतांत्रिक सरकार का सही परीक्षण होता।

2 प्रतिक्रियाएँ.:

  1. यथार्थ का बोध कराता व्यंग बहुत कुछ कह गया।
    बधाई।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. समयिक करारा व्यंग है शुभ्कामनायें

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं

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