बुधवार, 29 जुलाई 2009

आर. जयचन्द्रन का आलेख : सृजनात्मक समीक्षा के बदलते परिदृश्य

अक्षर विद्वेषी हमेशा साहित्य जगत में विद्यमान है, आगे भी रहेंगे । वे कवि, कथाकार व नाटककार के रूप में सामने आ सकते हैं, लेकिन अक्षरों पर विश्वास रखनेवाले अक्षर प्रेमियों के लिए यही बेहतर है कि वे इस बात को लेकर क्षोभ व निराशा न प्रकट करें । वे अपने स्नेह एवं विश्वास के बल पर आगे बढ़ते रहें । दर असल प्रेम एवं विश्वास ही उनकी रक्षा कर सकते हैं पर इस ओर भी अवश्य ध्यान रखना है कि कहीं नकली सिक्कों की खोज की व्यस्तता में असली निकालने का मौलिक फर्ज भूल न जाय ।

सभ्य मानव की दुनिया से पुस्तकों को हटाना असंभव है । आदिकाल में यहाँ सिर्फ प्रकृति एवं मानव ही थे । बाद में भौतिक संस्कार के साधन तथा ज्ञान विज्ञान के संचय ग्रन्थों की संख्या बढ़ती गई इसलिए ही समकालीन दौर में इनकी उत्कृष्टता बढ़ी है , आगे इनकी जनप्रियता और भी बढ़ेगी। पुस्तक सभ्य मानव के समस्त जीवन का अनिवार्य अंग है। जीवन के दूसरे तथ्यों के समान यह गंभीर अध्ययन एवं आलोचना का विषय है ,इसका संबंध सिर्फ साहित्य से नहीं अपितु समस्त जिंदगी से भी है।

कहा जाता है कि शल्य चिकित्सक ( सर्जन) जिन्दगी की व्याख्या करता है तो आलोचक साहित्य की व्याख्या देता है। कवि ,कहानीकार एवं नाटककार के लिए प्रेरणा उनके जीवनानुभव है ,लेकिन समीक्षकों के लिए तो प्रेरणा का स्रोत जीवन के अनुभवों को अभिव्यक्त करती कथा,कविता या नाटक रूपी पुस्तक है। पुस्तकों का अध्ययन जीवनानुभव का एक घटना होने के कारण एक हद तक समीक्षक भी जिन्दगी के व्याख्याता है । लेकिन जब सर्जनात्मक साहित्य भावना की राह स्वीकारता है तो आलोचना युक्ति एवं विश्लेषण की राह अपनाती है।

जब आलोचना, समग्र अनुभूतियों को संजोकर भावनात्मक आविष्कार के रूप में प्रस्तुत होती है दरअसल यही आस्वादन है तब वह भी सृजनात्मक साहित्य की हैसियत प्राप्त करती है। फिर भी इस बात को लेकर आस्वादकों के बीच शंका शेष रह जाते हैं कि आलोचना मौलिक रूप में सृजनात्मक साहित्य से भिन्न वैज्ञानिक साहित्यिक शाखा के अंतर्गत आती है या पूर्णतः सृजानात्मक साहित्य ही है ।

पश्चिमी साहित्य *जगत में इस बात पर लंबी बहस हुई है कि आलोचना की वास्तविक भूमिका और महत्ता क्या है? ‘ लेविस नामक पाश्चात्य विद्वान ने जब अपनी पुस्तक ऐन एक्सपेरिमेंट इन कि्रटिसिज्म्लिखी थी, तो उनके सामने मुख्य रूप से दो प्रश्न उपस्थित थेः

१.क्या यह आरोप सही है कि आलोचक एक नितांत परजीवी (पैरासाइट) व्यक्ति हुआ करता है और उसके आलोचना-कर्म का महत्व प्राथमिक नहीं हो सकता ?

२.क्या आलोचना की भी कोई प्रविधि या सिस्टेम हो सकता है?

इन दोनों प्रश्नों के उत्तर खोजते*खोजते लेविस इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि आलोचना कर्म न द्वैतीयक महत्व का होता है और न ही यह प्रविधि-विहीन हो सकता है ।

लेविसने घोषणा की थी कि आलोचना एक गैर-साहित्यक रचना कर्म तब होती है ,जब वह साहित्य की आलोचना हुआ करती है, साहित्य में निहित कला की आलोचना नहीं । उनकी मान्यता थी कि यह आलोचना रचना में अंतर्निहित कला की आलोचना तभी कर सकती है जब वह प्रविधि-भरी (सिस्टेमैटिक) हो, अविचारित, पूर्व निर्धारित , लक्ष्याभिगामी तथा स्वेच्छाचारी न हो । इसलिए रचना की ठीक-ठीक और सही पहचान कराना ही उसका परम अभीष्ट हो जाता है ।

किसी आलोचना की सार्थकता इस बात में निहित रहती है कि वह किसी रचना की बनावट या बुनावट को यथासंभव निस्संगता के साथ इस प्रकार निरूपित कर दें कि रचना का अंतरंग और बहिरंग इस प्रकार उद्भासित हो उठें और उनका सामंजस्य उसके कलामर्म की स्वतः ही समझ देने लगे। इस लक्ष्य की सिद्धि के लिए जिस निस्संगता और विवेक की आवश्यकता होती है, उसकी संभाव्यता प्रविधि के अंतर्गत ही हो सकती है।

प्रविधि न केवल कृति की समझ के लिए एक क्रमबद्ध वैज्ञानिकता देती है ,वरन् आलोचक के निराधार बात पर रोक लगाती भी है।

सूर-सूर ,तुलसी-ससि जैसी उक्तियाँ प्रविधि विहीन आलोचना का ही उदाहरण है ,वैसे ही एक आलोचक के द्वारा अज्ञेय को हिन्दी कथा साहित्य में गुलशन नंदा के समतुल्य प्रतिष्ठित किये जाने में इसी प्रविधिहीनता का आभास होता है या उनके द्वारा यह कहे जाने पर कि अज्ञेय ने भाषा का व्यावसायीकरण कर दिया है,इस प्राविधिक असंपृक्ति से उत्पन्न आलोचना की विद्रूपता का आभास पाया जा सकता है । स्वयं अज्ञेय ने एक स्थान पर लिखा है कि उनको अपने समकालीन लोगों में से आलोचक नहीं मिला, इसलिए उनको रचनाकर्म तथा आलोचन कर्म दोनों का ही निर्वाह करना पडा ।

मित्रता के नाम पर आलोचक ऐसी कृतियों की भी आलोचना कर दिया करते है जिन पर लिखना कदापि उचित नहीं कहा जा सकता । आचार्य मम्मट के विषय में प्रसिद्धि है कि उन्होने अपने भांजे की कृति पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया था। आज की हिन्दी आलोचना में कृति-विषयक चयन विवेक पूरी तरह अनुपस्थित है ,जो रचना ही नहीं बन पाती है उस पर भी लिखने के लिए टीका-टिप्पणी करने के लिए आलोचक सुलभ हो जाते हैं ।

आलोचना की सफलता *असफलता इतिहास और दर्शन की अंतः संगति की पहचान पर निर्भर रहती है। निराला और पंत जैसे कवियों की रचनाओं की पहचान या संवेदना तभी हो सकती है जब हम उस कालखंड के सामाजिक राजनैतिक इतिहास से पूरी तरह अवगत हो । इतिहास और दर्शन को आमने सामने रखकर ही तमस’, रागदरबारी’, महाभोज आदि रचनाओं की संवेदना को आत्मसात् किया जा सकता है ।

पुस्तक समीक्षा के कई भाव और रूप है । कभी इनमें से एक ही प्रकट होता है तो कभी अनेकों का समन्वित रूप भी आलोचना में निहित रहता है। कभी-कभी तो पुस्तकास्वादन रूपी अनुभूति को काव्यात्मकता के साथ प्रस्तुत करती समीक्षा भी नजर आती है । उस अनुभूति के स्रोत को स्पष्ट करती विश्लेषणात्मक आस्वादन रीति भी प्रचलित है । इन दोनों के समन्वय से ही प्रायः ग्रंथ समीक्षा संभव होती है । पूर्ण सहानुभूति के साथ जो रचना का मूल्यांकन करता है वह उसके ज्ञान सौन्दर्य क्षेत्र के सूक्ष्म भावों की ओर हमारा ध्यान अवश्य आकृष्ट करता है ,साथ ही साथ उन सौन्दर्य भावों एवं क्षेत्रों की व्याख्या भी करता है । यहाँ आलोचक एक हद तक रचना के साथ तादात्म्य की स्थिति में है । यहाँ आलोचक का उद्देश्य अपनी अनुभूति दूसरों के साथ बाँटना है। आत्मनिष्ठ आलोचक ,कवि या कहानीकार का आराधक होता है और पाठकों के सखा भी ।

समीक्षा की एक और रीति है उसका आधार गुण दोष विवेचन है जो वस्तुनिष्ठ भी रहता है । वस्तुनिष्ठता के आधार पर कहानी या कविता का विश्लेषण करनेवाले आलोचक की हैसियत एक न्यायाधीश या पथ प्रदर्शक की होती है । उस वक्त आलोचक को एक मान्यता प्राप्त साहित्यिक मीमांसा का मानदंड स्वीकारना पड*ता है। प्रारंभ में हमारे आलोचक संस्कृत काव्य मीमांसा को आधार के रूप में स्वीकारते थे , बाद में पाश्चात्य समीक्षा पद्धति के आधार पर समीक्षा करने की प्रथा भी उद्भूत हुई; आजकल अपने ही साहित्य दर्शन के आधार पर रचनाओं का मूल्यांकन करनेवाले आलोचक भी मौजूद है । कभी-कभी आलोचक समान स्तर की अन्य रचनाओं तथा प्रतिष्ठित मानक ग्रन्थों की तुलना करके तुलनात्मक अध्ययन रीति भी अपनाता है ।

साधारणतः समीक्षा में आस्वादन एवं मूल्यांकन का समन्वय ही द्रष्टव्य होता है ।कभी किसी एक अंश का उतार या चढ़ाव कहीं नजर आना भी स्वाभाविक मात्र ही है । लेकिन आस्वादन एवं मूल्यांकन के अलावा अन्य समीक्षा पद्धति भी पाश्चात्य देशों में प्रचलित है । मनोविज्ञान की सहायता से साहित्यकार के अवचेतन मन में उतरना, साहित्यकार की भावना ,शब्द संपदा आदि का बारीकी से विश्लेषण करना जैसे आलोचना की नई पाश्चात्य रीतियाँ आस्वादन एवं मूल्यांकन की सहायता तो करेगी लेकिन एक दायरे से बाहर खतरनाक भी है ।

रचना की सामाजिक एवं भाषा वैज्ञानिक पृष्ठभूमि तथा रचनाकार की जिन्दगी के आधार पर समीक्षा करने की प्रथा हमारे देश में भी संक्रमित होने लगी है । इस प्रकार साहित्यकार की जिन्दगी रचनाओं के आंतरिक अर्थों के विभिन्न पहलुओं को उन्मीलित करने योग्य भी हो सकती है । लेकिन साहित्यकार के जीवन और सामाजिक पृष्ठभूमि को ज्यादातर महत्व देने पर साहित्येतर बातें आलोचना में परिलक्षित होगी परंतु आलोचक के लिए यह बात अत्यंत वांछनीय है कि रूप और भाव के उचित सामंजस्य से उद्भूत रचनाकार का विशेष व्यक्तित्व ही आलोच्य विषय है ।

कुछ समय पहले रचना की साहित्यिक विशिष्टताओं के बदले उनसे भिन्न विशेषकर सामाजिक हित को तरजीह देती समीक्षात्मक पद्धति हमारे यहाँ जबरदस्त प्रतिष्ठित थी । आज भी ऐसी शैली ज्यादातर विद्यमान है । कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि इससे मुक्ति का समय बीत चुका है । किसी एक नाटक , कविता या कहानी का मर्म उसका साहित्यिक मूल्य है । उसका परम उपयोग भी उन साहित्यिक मूल्यों पर अधिष्ठित है ।

आलोचक के लिए एक समदर्शी दृष्टिकोण अपेक्षित है । समदर्शी से तात्पर्य यह नहीं कि आलोचना में लेखक की वैयक्तिक पसंद नापसंद का स्पर्श नहीं ,लेकिन ये पसंद और खासियतें गैर साहित्यिक न हो क्योंकि साहित्यिक रचना के प्रति आलोचक की प्रतिक्रिया ही आलोचना है। आलोचना कितना भी वस्तुनिष्ठ हो,उसमें लेखकीय व्यक्तित्व की झलक अवश्य पड़ेगी । लेकिन आलोचक की ईमानदारी पर तब संदेह उत्पन्न हो सकता है जब साहित्यकार के साथ उसका रिश्ता समीक्षा को विकल बनाने लगे । रही बात आलोचक की आस्वादन क्षमता की तो सभी विधाओं की साहित्यिक रचनाओं का समान आस्वादन आलोचक के लिए असंभव है । वैसे और भी कई सीमाऍं हो सकती है । इनसे आलोचक को खुद बेफिक्र होना है जहाँ तक हो सके अपनी आस्वादन क्षमता से परे की रचनाओं को यों ही छोड़ देना ही बेहतर है । जिसे कविता पसन्द नहीं है उसे कविता की आलोचना नहीं करनी चाहिए । यह दुखद बात है कि अपने आस्वादन से परे के एक काव्य को इस कोटि के एक समीक्षक द्वारा निम्नस्तरीय कहना और भी त्रासद होगा । इसलिए आलोचक को फक्कड़पन से बचना चाहिए,उसे विनम्र और सहिष्णु होना ही है।

समीक्षक का नींवाधार गुण सहृदयता है,असाधारण सहृदयता के अभाव में समीक्षा करना दुस्साहस है। सहृदयता के अभाव में समीक्षा के क्षेत्र में प्रविष्ट होना और सहज प्रतिभा के बिना सृजन करना दोनों समान है। यह भी द्रष्टव्य है कि सिर्फ सहृदयता से ही काम नहीं चलेगा,आलोचना के लिए ग्रंथों का परिचय ,जीवन की अवधारणा तथा साहित्यिक आलोचना का गहरा ज्ञान भी अनिवार्य है ।

साहित्यिक धारायें प्रांतीय सीमाओं से बाहर बहने तथा सृजन की पृष्ठभूमि अत्यंत जटिल होने की वजह से समीक्षकों के लिए अपेक्षित ज्ञानार्जन एक दुष्कर काम है ।

एक आलोचक के बारे में दूसरे एक आलोचक ने कहा है कि उन्होने एक किताब पढ़ी ,समझ में कुछ भी नहीं आया इसलिए उन्होंने सोचा कि इसकी समीक्षा की जाय । कई उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कोई अतिरंजित बात नहीं है । सृजनात्मक साहित्यकार का रवैया भी इससे बेहतर नहीं है । हमारा साहित्य ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ साहित्यकार अप्राप्य को वरदान समझता है एवं आलोचक अज्ञान को आभूषण मानता है और बुद्धिजीवी केवल अपनी तुच्छता के घमंड को अपनी निजी पूंजी महसूस करता है । इससे ऐसा तात्पर्य नहीं है कि सभी साहित्यकार एवं आलोचक मूढ़ स्वर्ग में जी रहे हैं , उद्देश्य सिर्फ यही है कि प्रायः यही लोग अग्रणी होते हैं। हमें उन लोगों की जरूरत है जो इनके लिए समय बर्बाद किये बिना उत्कृष्ट साहित्य एवं समीक्षा में दृष्टि अडिग रखकर अग्रसर हो ।

अच्छी आस्वादन क्षमता एवं स्तरीय ज्ञान से युक्त सहृदय दल आज हमारे देश में है। इन सहृदय पाठकों की आकांक्षाओं की पूर्ति करने योग्य साहित्य और समीक्षा की रचना हमारे यहाँ पर्याप्त मात्रा में होती नहीं है । अच्छे साहित्य एवं शुद्ध समीक्षा में विश्वास रखनेवाले एक साथ मिलकर इस समस्या पर विचार करें। समीक्षा एवं सृजनात्मक साहित्य में कोई आपसी प्रतियोगिता नहीं है ,उसकी आवश्यकता भी नहीं है । यदि कोई उसकी उपस्थिति महसूस करता है तो वह गलतफहमी ही है । ऐसी हालत न आ जाय कि हमारे आम पाठक ,साहित्यकारों एवं समीक्षकों को क ख गसिखाने लगें ।

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संपर्क:

डॉ. आर.जयचन्द्रन

रीडर, हिन्दी विभाग,

मनोन्मणियम सुन्दरनार विश्वविद्यालय

तिरुनेलवेली,तमिलनाडु ,भारत.

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