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साबिर घायल की ग़ज़ल – दर्द उठता है मजा देता है

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दर्द उठता है मज़ा देता है !
ये भी नेमत है खुदा देता है !!


ज्यों ही लिखता हूँ तेरा नाम मुक़द्दर में !
कोई आ के लकीरों को मिटा देता है !!


कभी तेरी यादें चैन से रहने नहीं देतीं !
कभी तेरा ख्याल चुपके से सुला देता है !!


मुझसे ज़्यादा मुझे जानता है वो !
हर कदम पर मुझे मेरा पता देता है !!


इस्लाह पसंद नहीं शायद उसको !
इसीलिए हर बात पे तूफान उठा देता है !!


ग़मे उल्फत, दर्द, बेक़रारी, बेचेनी !
देने वाला देता है तो क्या -क्या देता है !!


दोनों ही करते हैं काम अपना बराबर !
मैं बुझाता हूँ शरारे वो हवा देता है !


मैं मसीहा कहूँ उसको या कुछ और "घायल"
दर्द यूँ देता है कि लगता है दवा देता है !!
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साबिर घायल
बुंदेला नगर दातिया

टिप्पणियाँ

  1. वो लिख तो देता तेरा नाम मेरे हाथों की लकीरों में
    पर खुदा मेरे हाथ में लकीरें बनाना भूल गया ...
    खूबसूरत ग़ज़ल ...मुबारकबाद स्वीकार करें

    उत्तर देंहटाएं
  2. ज्यों ही लिखता हूँ तेरा नाम मुक़द्दर में !
    कोई आ के लकीरों को मिटा देता है !!

    khoobsurat sher raha gazal ka

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेनामी11:28 pm

    vah sabir,
    badhaiyan.
    rajnarayan bohare

    उत्तर देंहटाएं

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