रचनाकार.ऑर्ग की विशाल लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

साबिर घायल की ग़ज़ल – दर्द उठता है मजा देता है

 Image071

दर्द उठता है मज़ा देता है !
ये भी नेमत है खुदा देता है !!


ज्यों ही लिखता हूँ तेरा नाम मुक़द्दर में !
कोई आ के लकीरों को मिटा देता है !!


कभी तेरी यादें चैन से रहने नहीं देतीं !
कभी तेरा ख्याल चुपके से सुला देता है !!


मुझसे ज़्यादा मुझे जानता है वो !
हर कदम पर मुझे मेरा पता देता है !!


इस्लाह पसंद नहीं शायद उसको !
इसीलिए हर बात पे तूफान उठा देता है !!


ग़मे उल्फत, दर्द, बेक़रारी, बेचेनी !
देने वाला देता है तो क्या -क्या देता है !!


दोनों ही करते हैं काम अपना बराबर !
मैं बुझाता हूँ शरारे वो हवा देता है !


मैं मसीहा कहूँ उसको या कुछ और "घायल"
दर्द यूँ देता है कि लगता है दवा देता है !!
----

साबिर घायल
बुंदेला नगर दातिया

3 टिप्पणियाँ

  1. वो लिख तो देता तेरा नाम मेरे हाथों की लकीरों में
    पर खुदा मेरे हाथ में लकीरें बनाना भूल गया ...
    खूबसूरत ग़ज़ल ...मुबारकबाद स्वीकार करें

    जवाब देंहटाएं
  2. ज्यों ही लिखता हूँ तेरा नाम मुक़द्दर में !
    कोई आ के लकीरों को मिटा देता है !!

    khoobsurat sher raha gazal ka

    जवाब देंहटाएं
  3. बेनामी11:28 pm

    vah sabir,
    badhaiyan.
    rajnarayan bohare

    जवाब देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.