गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – रविकांत अनमोल का व्यंग्य : गद्यं कवीनां निकषं वदंति

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(प्रविष्टि क्रमांक - 47)

“गद्यं कवीनां निकषं वदंति” महाकवि दण्डी की यह उक्ति मुझे विचित्र लगती रही है। ऐसे समय में जबकि पद्य छंदशास्त्र के जटिल नियमों में बंधा था, छंद और कथ्य दोनों को सामने रखते हुए उसमें अलंकार भी पैदा करना कोई सरल काम तो नहीं था। गद्य तो कोई भी लिख सकता है। सीधे-सीधे वाक्यों में बात कहना क्या मुश्क़िल है? इसमें कसौटी जैसी क्या चीज़ है? और दण्डी महोदय कहते हैं कि गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति। मैं तो मानने को तैयार ही नहीं था लेकिन फिर एक मित्र ने बताया कि छ्न्द में एक लय रहती है, एक संगीत उत्पन्न होता है और यह श्रोता को, पाठक को जल्दी से प्रभावित कर लेता है, लेकिन गद्य में पूरा प्रभाव साधारण वाक्यों और अपने भावों के द्वारा ही पैदा करना होता है। छ्न्द में तो अनुशासन में रहने से स्वतः संगीत पैदा हो जाता है और उसके लिए कवि को कई तरह की छूट भी होती है। गद्यकार बिना भाषा की कोई छूट लिए और बिना छ्न्द का सहारा लिए एक लय, एक संगीत पैदा करता है तभी श्रोता और पाठक को प्रभावित कर पाता है। यही कठिन कार्य है और इसी के कारण दण्डी ने गद्य को कवियों की कसौटी माना है। ख़ैर उक्ति कुछ भी रही हो, लेकिन उस ज़माने में कविता लिखना आसान काम नहीं था। साधारण व्यक्ति तो सपने में भी कविता लिखने के बारे में नहीं सोच सकता था। लघु, गुरु को समझना और यगण, रगण, सगण आदि में मगन होना हर किसी के लिए संभव न था। हिन्दी में भी आरंभिक काल में कविता के लिए छ्न्द बहुत आवश्यक था।

समय बदलाव लेकर आता है। कुछ युगपुरुष होते हैं, जो इस बदलाव का माध्यम बनते हैं। निराला जी को ऐसे ही युग पुरुष माना जाता है। उनकी यह कह कर प्रशंसा की जाती है कि उन्होंने कविता को हर प्रकार के बंधनों से आज़ाद कर दिया, जिससे कविता नए आसमानों को छू सके। किन्तु वास्तविकता यह नहीं है। असलियत तो यह है कि निराला जी ने केवल प्राचीन छ्न्दों का त्याग किया, लय और भाव के मामले में वे रुढ़िवादी ही रह गए । उनकी कविताओं में भाव भी हैं और लय भी। प्रमाण यह है कि अपनी छ्न्दमुक्त कविताओं को वे स्टेज पर लय से गाते थे और श्रोता भाव विह्वल हो जाया करते थे। निराला जी को केवल इसी बात का श्रेय दिया जा सकता है कि उन्होंने सबसे पहले छन्द मुक्त कविता का नाम लिया। वास्तव में कविता को छ्न्द से ही नहीं, लय और भाव से भी मुक्त बाद के कवियों ने किया। ऐसे कवियों ने कविता से छ्न्द और लय इत्यादि का पूर्ण बहिष्कार किया। दुर्भाग्यवश हम यह नहीं जानते कि यह महान कार्य सबसे पहले किस महानुभाव ने किया। संभवतः कई कवियों ने एक ही समय में यह क्रांतिकारी कार्य किया हो। जैसे बाड़े का दरवाज़ा खुलते ही कई भेड़ बकरियाँ एक साथ निकल पड़ती हैं और आप यह नहीं बता सकते कि कौन सी भेड़ या बकरी सबसे पहले बाहर आई थी। निराला जी केवल बाड़े का दरवाज़ा खोलने के अर्थों में ही क्रांतिकारी हैं । वास्तव में कविता को मुक्त करने वाले कवि और हैं और वही महान हैं।

इस सारी प्रक्रिया में कुछ लोगों नें यह भी बवाल खड़ा किया कि छ्न्द के बिना कविता और गद्य में अंतर कैसे होगा? लेकिन यह केवल क्रांति को रोकने का एक बहाना भर था। जानकार लोग जानते हैं कि पहचान बहुत सरल है। जिस रचना में वाक्य विन्यास सीधा हो, व्याकरण सम्मत हो वह गद्य है और जिस रचना में वाक्य विन्यास विचित्र हो,व्याकरण सम्मत न हो वही कविता है। यदि कहा जाए राम जाता है तो समझो गद्य पढ़ रहे हो और यदि लिखा हो जाता है राम तो समझो कि आप किसी महान कविता का पाठ कर रहे हो। एक और छोटा सा अंतर है- गद्य की पंक्तियों को सारे पृष्ठ पर फैला कर लिखा जाता है और कविता की पंक्तियों को यहाँ-वहाँ से तोड़ कर इस तरह से लिखा जाता है कि उनकी लंबाई समान न होने पाए और यदि किताब को आड़े रुख पकड़ा जाए तो ये पंक्तियाँ शहर की ऊँची नीची इमारतों की तरह नज़र आएँ। इस तरह कोई भी कविता की पहचान कर सकता है। अब तो कोई भी सरलता से कविता लिख सकता है। मान लीजिए आप के दोस्त ने आप को कोई चुटकला सुनाया, आप उसे विचित्र वाक्य-विन्यास में लिखिए, पंक्तियों को यहाँ- वहाँ से तोड़ कर लिख लीजिए। बस आपकी कविता तैयार है। आप बाज़ार गए, किसी स्कूटर वाले ने आपकी साइकिल ठोक दी। इस घटना का वर्णन अजीबो-गरीब तरीके से टूटे-फूटे वाक्यों में करके उन्हें असमान लम्बाई वाले हिस्सों में तोड़कर लिख लीजिए। एक महान कविता तैयार है।

कविता को छ्न्द के बंधन से मुक्त हुए लगभग ८० बरस हो गए। इसी बीच एक और बड़ी क्रांति हो चुकी है। कुछ और ज़्यादा महान कवियों ने कविता को अर्थ से भी मुक्त कर दिया है। छन्द और भाव से मुक्त होने के बाद भी एक बेड़ी कविता के पैरों में थी-अर्थ की। लेकिन अब इस बेड़ी को भी काट दिया गया है। अब कविता सचमुच उन्मुक्त हो कर खुले आकाश में उड़ सकती है। अब कविता लिखने के लिए आपको चुटकला सुनने या बाज़ार जाने की भी ज़रूरत नहीं है। आराम से घर में बैठिए, कुछ भी चित्र-विचित्र कल्पना कीजिए और यह भी न हो तो ऐसे ही कुछ शब्दों को किसी भी क्रम में लिखते जाइए, बस कविता तैयार है। अर्थ की चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। जैसे डॉक्टर की लिखावट को और कोई समझे न समझे, कैमिस्ट पढ़ ही लेता है। उसी तरह कवि की रचना के अर्थ को और कोई समझे न समझे, आलोचक समझ ही लेता है। आलोचक यदि कविता का अर्थ न समझ सके तो आलोचक अयोग्य है, कवि नहीं।

आज कविता सही मायनों में आज़ाद है। छ्न्द से आज़ाद, लय से आज़ाद, भाव से आज़ाद, अर्थ के बंधन से भी आज़ाद, यहीं बस नहीं श्रोता और पाठक भी कविता के मोह से आज़ाद हो गए हैं। पहले जहाँ श्रोता बिना बुलाए ही कवि सम्मेलनों में पहुँचते थे, रात भर बैठ कर कविता सुनते थे, अब बुलाने पर, चाय नाश्ते का लालच देने पर भी इस मोह-पाश में नहीं बंधते। किताबें मुफ़्त मिलने पर भी पाठक कविता नहीं पढ़ते। वे कविता के मोहजाल से मुक्त हो चुके हैं। जब से कविता मुक्त हुई है, पाठकों और श्रोताओं की संख्या चाहे कम हुई हो, कवियों की संख्या में उत्तरोत्तर बढ़ौतरी होती रही है। जहाँ शहर भर में दो-चार कवि हुआ करते थे, आज हर गली में छः-आठ कवि मिल जाते हैं। जो व्यक्ति अपने रिश्तेदारों को पत्र लिखने से कतराता है, कविता वह भी धड़ल्ले से लिखता है। एक-दो नहीं पूरी किताब भर कविताएँ लिख डालने में उसे कोई परेशानी नहीं होती, लेकिन किताब की भूमिका लिखने के लिए किसी गद्य लिखने वाले को ढूंँढना पड़ता है । जब किताब छपकर आ जाती है तो उसे अपने पहचान वालों के पास भेजते समय जो पत्र लिखना पड़ता है उसे लिखने में कवि को पसीना आ जाता है। आज के प्रसंग में दण्डी की उक्ति में मुझे सच्चाई लगती है कि गद्यं कवीनां निकषं वदंति।

इति

रवि कांत अनमोल

पठानकोट, पंजाब

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  1. गुरूजी का टाइम पास.... इतना सरल और सहज व्यंग्य है कि पढ़ कर मजा आ गया. इतने वर्षों बाद इनका व्यंग्य पढने को मिला. लगभग ८६-८७ में दीनदयाल जी की एक किताब आई थी मैं उल्लू हूँ... इसके बाद १९९४ में व्यंग्य की इनकी दूसरी किताब आई ... सारी खुदाई एक तरफ ...आज फिर रचनाकार पर ये आलेख पढ़ कर मन को सुकून मिला. रचनाकार की टीम और दीनदयाल जी को बधाई. नरेश मेहन, राजस्थान.

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  2. कविता से पाठकों के मुक्त होने का बडा गहन कारण बताया गया है ,व्यन्ग्य जो ठहरा( वस्तुतः कारण तो हमारी पाश्चात्य से नकल की हुई ’रोज़गारोन्मुखी शिक्षा प्रणाली " है, और कविता रोज़गार के लिये नहीं मानवता की ठोस नींव/ आधार को व्यक्ति के मानस में ढालने के लिये होती है, जो स्वयम सभी उचित रोज़गार का कारण है
    ----भाव व अर्थ से कविता या कोई भे कथन कब अलग हो सकता है,हां भाव व अर्थ -सार्थक व निरर्थक हो सकते हैं । कविता छन्द से मुक्त नहीं हुई ,न हो सकती है, हां छन्द , मुक्त छन्द , होते हैन।
    ----निराला से आगे यह महान कार्य --रन्ग नाथ मिस्र ’सत्य’ , जगत नारायण पानडेय व डा श्याम गुप्त ने कविता में "अगीत" विधा की सन्स्थापना वअग्रगामी बना कर , उसे आगे नये नये अतुकान्त छंदों से सम्रिद्ध करके कियाकिया।
    -----अच्छा व्यन्ग्य है।

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