व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – अपराजिता का व्यंग्य : हंस चला कौवे की चाल

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(प्रविष्टि क्रमांक - 48) विष्णुलोक में भगवान विष्णु माता लक्ष्मी के साथ बैठे विश्राम कर रहे थे कि तभी नारायण-नारायण की आवाज सुनाई ...

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(प्रविष्टि क्रमांक - 48)

विष्णुलोक में भगवान विष्णु माता लक्ष्मी के साथ बैठे विश्राम कर रहे थे कि तभी नारायण-नारायण की आवाज सुनाई देती है जिसे सुनकर भगवान विष्णु हर्षित हो पूछते हैं - कहो नारद इतने दिनों बाद इधर का रास्ता कैसे भूल गये ? न कोई चिट्ठी, न पत्री, न कोई फोन, कहो कैसे हो? आजकल मृत्युलोक के क्या समाचार हैं ? नारदजी ने वीणा के तार छेड़ते हुए कहा - नारायण-नारायण ! ये कैसे हो सकता है प्रभु, मैं आपको कैसे भूल सकता हूं ? वो तो मैं ट्रैफिक में फंस गया था प्रभु । आजकल उपर आने वालों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि घंटों लाइन में खड़ा होना पड़ता है । क्षमा करें प्रभु ! और चिट्ठी-पत्री का तो अब जमाना ही नहीं रहा आजकल तो डाकघरों में ताला लटकने वाला है । अब तो फोन, ईमेल और एसएमएस का जमाना आ गया है । आपका फोन भी मैंने कितनी बार किया हमेशा इंगेज ही आता है, मुझे क्षमा करें प्रभु !

आजकल तो मृत्युलोक की काया ही पलट गई है प्रभु ! आजकल वहां समानता की शहनाई बजने लगी है । गरीब क्या अमीर भी आजकल दाल रोटी खाकर फर्क महसूस करते हैं । लोगों को पानी तक खरीदकर पीना पड़ता है । सरकार भी इसके लिए नये-नये कानून बना रही है ।

तब तो लगता है नारद ! जल्दी ही सारी धरती स्वर्ग जैसी सुंदर बन जाएगी, जहां कोई भेदभाव नहीं होगा ।

तभी नारद बीच में ही चिल्लाते हुए बोले - बन जाएगी क्या, बन गई है प्रभु ! आप एक बार मृत्युलोक की सैर तो कर लीजिए । ऐसे भी आपने बहुत दिनों से भ्रमण नहीं किया है ।

यह सुनकर प्रभु ने कहा - नारद तुम्हारी इस बात पर हम विचार करेंगे । पहले तुम तनिक विश्राम तो कर लो । नारायण-2 प्रभु ! मेरे पास तो सांस लेने की भी फुरसत नहीं है । अभी मुझे धर्मराज महोदय के पास भी जाना है । मैं तो बस आपके दर्शन के लिए आ गया था । आज्ञा दीजिए प्रभु ! नारायण-2 कहते हुए नारद मुनि यमलोक के लिए चल पड़े ।

नारदजी जब यमराज के पास पहुंचे तो वे बहुत व्यस्त नजर आये । उन्हें देखकर नारदजी ने कहा - हे मृत्यु के देवता ! आप इतनी जल्दी-2 लोगों को क्यों अपने दरबार में आमंत्रित करते हैं । इससे आपको तो ओवरटाइम करना ही पड़ता है और उधर स्वर्ग आने जाने का मार्ग भी बाधित हो जाता है ।

मैं क्या करूं नारद इन्हें मैंने नहीं बुलवाया । ये तो बिन बुलाये मेहमान हैं जो जब इच्छा हो चले आते हैं । तुम्हें तो ज्ञात ही होगा आज पृथ्वी की क्या दशा हो गई है । मनुष्य जल्दी-जल्दी के चक्कर में दिन क्या रात क्या लगातार काम काम के पीछे भाग रहा है । हमने व्यवस्था की थी कि मनुष्य दिन में काम करे और रात में आराम करे । पर मनुष्य तो इतनी जल्दी में हैं कि प्रकृति से अभद्र खिलवाड़ कर रहा है । आये दिन लोग पेड़ों को काटते जा रहे हैं, खेतों को उजाड़कर इमारतें और कारखाने बनाये जा रहे हैं । गाड़ियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है । जिससे वातावरण में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है । क्या बच्चे क्या बड़े सभी व्यसन में लिप्त होकर अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार रहे हैं । प्रकृति मनुष्य से इतना खिलाफ होती जा रही है कि बाढ़, सूखा आदि प्राकृतिक संकटों का खतरा दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है । इस जल्दी के कारण आज मनुष्य समय से पहले ही मृत्यु के ग्रास में समाता जा रहा है ।

इधर नारदजी के जाने के बाद लक्ष्मीजी ने कौतूहलवश प्रभु से मृत्युलोक जाने की इच्छा प्रकट की । प्रभु लक्ष्मीजी के आग्रह को टाल न सके और लक्ष्मीजी के साथ गरूड़ पर सवार हो पृथ्वीलोक के भ्रमण के लिए निकल पड़े ।

पृथ्वी पर पहुंचते ही सभी उन्हें यूं आश्चर्य से देखने लगे जैसे किसी फिल्म की शूटिंग चल रही हो । और उसमें से एक व्यक्ति ने तो हद ही कर दी वह आटोग्राफ लेने लक्ष्मीजी के पास जा पहुंचा । यह देखकर गरूड़जी ने कहा - यह क्या फिल्म की शूटिंग चल रही है । अरे ये तो साक्षात् भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी हैं जो विष्णुलोक से यहां आये हैं । इनके चेहरे पर तुम्हें दिव्य आभा नहीं दिखाई दे रही । इतना सुनना था कि सभी लोग लक्ष्मीजी की ओर आशीर्वाद लेने लपके । मां ने कहा - अरे सभी मेरे पास ही क्यों आ रहे हो ऐसे में तो गिर जाओगे । आशीर्वाद ही लेना हैं तो प्रभु से ले लो । तभी लोगों की आवाज आयी मां हमें तो तुम्हारा ही आशीर्वाद चाहिए । तुम आशीर्वाद दोगी तो घर में धन की वर्षा होगी । विष्णु भगवान आशीर्वाद में क्या देंगे बस मोक्ष ही न । हम लेकर क्या करेंगे । प्रभु ने लोगों की मनःस्थिति देखकर वहां से पलायन करना ही उचित समझा और तीनों अदृष्य हो गये । आज तो बाल बाल बचे प्रभु वर्ना पता नहीं क्या होता । लगता है आजकल तो पृथ्वी पर केवल धन की ही पूजा होती है । गरूड़जी ने कहा । अरे अभी देखा ही क्या है अभी तो सारी पृथ्वी बाकी है । चलो घूमकर आयें लेकिन इस बार अपना-अपना वेष बदल लो, ताकि हमें कोई पहचान न पाये । जो आज्ञा प्रभु !

अब वे लोग अपना रूप बदलकर पुनः पृथ्वीलोक का भ्रमण करने निकले । बड़ी - बड़ी पुलें, इमारतें, गाड़ियां देखते हुए वे एक जगह से दूसरे जगह घूम रहे थे तभी सामने एक अतिसुंदर इमारत देखा, जिसमें बहुत से लोग आ जा रहे थे । लोगों को जाते देखकर वे तीनों भी इमारत में प्रवेश कर गये । अंदर जाकर देखने पर पता चला ये तो कोई कार्यालय है । लेकिन यह क्या यहां तो सभी अधूरे व्यक्ति ही नजर आ रहे हैं गरूड़ । ब्रह्माजी ने तो अपनी सृष्टि में इतनी अधूरी रचनायें कभी नहीं बनाई हैं । फिर ये सब क्या है ? आपको नहीं पता प्रभु ! यहां सरकार ने विशेषतः असाधारण लोग जैसे महिलाएं, विक्लांग, पिछड़ी जाति आदि के लिए ही नौकरी मुहैया करायी है । अतः नौकरी लेने के लिए लोग जान बूझकर अपने आपको असाधारण कर लेते हैं ।

हे गरूड़ तब तो हमें ब्रह्मदेव को यह खुशखबरी देनी चाहिए कि वे मानवों को संपूर्णता प्रदान करने में व्यर्थ अपना समय नष्ट न करें, प्रभु ने कहा ।

तभी गरूड़जी ने कहा - प्रभु चलिए आगे चलें । आगे बढ़ने पर उन्हें एक ओर आलीशान और सजे हुए बंगले और बिल्डिंगें दिखाई दीं तो दूसरी ओर छोटी - छोटी झोपड़ियों से गरीबी झांकती नजर आयी, यह देखकर लक्ष्मीजी की आंखें भर आयीं । उन्होंने छलछलायी आंखों से प्रभु से कहा - कहीं लोगों को दो वक्त की रोटी नहीं मिल पाती, तन ढ़कने को कपड़ा नहीं मिल पाता और जिनके पास सभी साधन उपलब्ध हैं वे विकासशीलता के नाम पर पैसों का दुरुपयोग करते हैं, ये कैसी विडम्बना है प्रभु ! परमाणु बम, मिसाइल आदि का निर्माण कर वे लोगों की जिंदगी छीन सकते हैं उन्हें जिन्दगी दे तो नहीं सकते, फिर ये विकास कैसा । क्या विकास की यही परिभाषा है ? यह सुनकर प्रभु ने कहा - नहीं देवी ! विकास तो वह है जिससे प्रकृति को और उसमें रहने वाले प्राणियों को लाभ और केवल लाभ पहुंचे । लेकिन आज मनुष्य की प्रवृत्ति एक पशु से भी निकृष्ट हो गई है । वह केवल अपने फायदे के लिये सोचता है वह कोई भी चीज मेहनत से नहीं बल्कि छीनकर हासिल करना चाहता है । ऊंचाई पर पहुंचने के वह मेहनत नहीं करना चाहता अपितु दूसरों को गिराकर खुद बड़ा बनना चाहता है । और इसी लालच के कारण आज मानव निर्माण से ज्यादा विध्वंस के लिए अपनी अकल का इस्तेमाल कर रहा है । वह यह नहीं जानता कि आज वह जो गड्ढा दूसरों को गिराने के लिए खोद रहा है, कभी वह खुद भी उसमें गिर सकता है ।

चलो अब वापस लौट चलें अपनी सबसे अनमोल कृति मानव का ऐसा विकास देखकर आज मेरा दिल भर आया । मुझे तो विश्वास ही नहीं होता कि यह वही धरती है जिसे ऋषि मुनियों ने अपने जप तप से पावन कर सोना बना दिया था । जहां जन्म लेने के लिये देवता क्या त्रिदेव भी सदा लालायित रहते हैं । जिसमें कभी मैंने राम, कृष्ण, बुद्ध बनकर जन्म लिया था । जहां मैंने गीता के रूप में लोगों को जीवन जीने की कला सिखायी थी, कर्तव्यपालन का अनूठा आदर्श प्रस्तुत किया था ।

क्या कर सकते हैं प्रभु ! वो सतयुग था और आज कलियुग है तब आपने बनाया था इंसान आज वो बन गये हैं हैवान, गरूड़जी ने कहा ।

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व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – अपराजिता का व्यंग्य : हंस चला कौवे की चाल
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