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संदीप गौर की कविताएँ - लड़कियां रंगों में जीती हैं और रंगों में ही मर जाती हैं.

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मां

तुमने कभी भी

कुछ भी नहीं कहा मुझसे.

तब भी नहीं

जब पहली बार

शराब पीकर घर लौटा था देर रात.

और तब भी नहीं

जब किसी ओर जात की लड़की को

बहू बनाकर ले आया था

तुम्हारे ही घर में.

पोता होने के खबर

दस दिन बाद मिलने पर भी तुमने

आशीर्वाद ही भेजा था पाती में,

शिकायत नहीं.

और जब तुम्हें सबसे ज्यादा जरूरत थी

अपने बच्चों की,

मैं अपने बच्चों में व्यस्त था.

मां

तुमने कभी भी

कुछ भी क्यों नहीं कहा मुझसे?

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मुंबई

प्यादे की तरह सीधे चलता है

और अचानक तुम्हारी उम्मीदों पर थूकते हुए

एक टांग पर उछलकर

करता है तिरछी मार.

जब तुम बिल्ली की तरह

अपने नाखूनों और आंखों में धार लगाकर

घात लगाकर बैठते हो

हाथी की चाल चलते हुए

रौंदते हुए, जमींदोज करते हुए

निकलता है तुम्हारे सिर के ऊपर से.

और कभी नब्बे डिग्री के कोण पर

ऊंट की तरह, निकलता है छीलते हुए कंधों को.

और जब तुम

किसी कोने में खड़े होते हो निश्चिंत

घोड़े की ढाई चाल चलकर

भौंचक्का कर देता है तुम्हें.

और हां, वजीर की चाल ये शहर

हमेशा तब चलता है

जब तुम सोचते हो कि तुमने शह दे दी है.

---

लड़कियां

लड़कियों में मुझे

रंग दिखते हैं

हजारों-हजार, लाखों-लाख

रंग ही रंग.

ताजे रंग, इठलाते रंग

लजाते रंग, जगमगाते रंग, मुस्कुराते रंग.

लड़कियां रंगों को ओढ़ती हैं

और रंगों को ही बिछाती हैं

उम्र के हर पड़ाव को

रंगों में ही बताती हैं.

लड़कियां रंगों की खिड़कियां खोलती हैं

इंद्रधनुष को बुलाती हैं.

चूल्हे पर रंगों के सपने पकाती हैं.

लड़कियां रंगों में जीती हैं

और रंगों में ही मर जाती हैं.

टिप्पणियाँ

  1. संदीप गौर जी की तीनों रचनाएं बहुत अच्‍छी लगी !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. संदीप जी आपकी सभी कवितायेँ केवल अच्छी ही नहीं बहुत अच्छी लगीं .माँ को परिभाषित करने के लिए तो शायद भागवान ने शब्द ही नहीं गढ़े.माँ पर मेरी एक अत्यंत मार्मिक रचना
    "आज भी "मेरे ब्लॉग पर जरुर पढ़ें .rachanaravindra.blogspot.com
    मुंबई तो क्या अब हर शहर एक समाज नहीं रहा शतरंज की बिसात है
    लड़कियों के रंग तो लोगों को दीखते हैं पर ये नहिं दिखता की जितने रंग बाहर हैं उससे कहीं ज्यादा अँधेरा अक्सर अन्दर होता है.मेरी रचनाकार पर सितम्बर माह में प्रकाशित कविता "सृष्टि" भी देखें
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  3. संदीप जी की तीनो रचनायें द्सिल को छू गयी पहली रचना तो बहुत कमाल की है। धन्यवाद और बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  4. निर्मला कपिला ji ke shabd meri taraf se bhi ..

    उत्तर देंहटाएं
  5. teeno hi rachnayein ek se badhkar ek hain..........alag alag rang zindagi ke samete huye hain.

    उत्तर देंहटाएं
  6. लड़कियां रंगों की खिड़कियां खोलती हैं
    इंद्रधनुष को बुलाती हैं
    चूल्हे पर रंगों के सपने पकाती हैं.
    बहुत सुंदर रचना है आभार

    उत्तर देंहटाएं

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