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कान्ति प्रकाश त्यागी की हास्य व्यंग्य कविता : मैं और मेरी परछाई

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परछाई

डा० कान्ति प्रकाश त्यागी

मैं और मेरी परछाई
क्या है?, समझ न आई
भ्रमित करती यह परछाई
भूत बन डरा रही परछाई

परछाई में छिप गई परछाई 
परछाई में दिख रही परछाई
जहां देखूं, वहां पाऊं परछाई
ये मुझको छल रही परछाई

कभी साथ साथ चलती है
कभी पीछे पीछे चलती है
कभी दांये ओर चलती है
कभी बांये ओर चलती है

कभी आगे आगे चलती है
अचानक गायब हो जाती है
अचानक वापिस आ जाती है
एक के अन्दर एक चलती है

अन्धेरे का अहसास दिलाती है
उज़ाले का अहसास दिलाती है
परछाई, रात में साथ छोड़ देती है
अपनी जगह, तन्हाई छोड़ देती है

तन्हाई कहती, तुम्हें परछाई की याद क्यूं
परछाई को गुस्सा, तुम तन्हाई के पास क्यूं
मैं बहुत परेशान, इन्हें आपस में द्वेष क्यूं
दोनों को प्रेमी हूं, फिर इतना अविश्वास क्यूं

जब सबने साथ छोड़ा, दुनिया ने की रुसवाई
ऐसा भी समय आया, न परछाई, न तन्हाई
दोनों ने मिल कर मुझ से की थी बेवफाई
हमारी हमारे अहसास से हो गई जुदाई

  अपने से ज़्यादा बुरा कौन,
औरों की कम करता बुराई
हर बात पर लगता इल्ज़ाम
इसलिये नहीं देता सफ़ाई
तू न समझेगा, यह गहराई

तू जहां जहां चलेगा प्रिय
वहां वहां चलेगी तेरी परछाई
मुझे छल रही परछाई
मुझसे जल रही तन्हाई
यह दुनिया है हरज़ाई
मैं और मेरी परछाई

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