अपर्णा भटनागर की कविता

ये डर क्यों -
सारे अवसाद तुम्हारे हिस्से ?
परत जमाते ....शनैः शनैः
टिक गए हैं
समय के धरातल पर !
नुकीले
पथरीले
बलुआ
दुखों के जीवाश्म
सर्द बर्फ
एकाकी
बर्फीली चट्टान
पालथी मारे पसरे हो
सीने में दबाये
अवरुद्ध लावे को .....?
आहत हो ?
श्रांत ?
क्लांत ?
अपने इस "मैं " में झाँक कर देखो -
एक हिलोर
पारदर्शी
उज्ज्वल
मधुर पयस्विनी
शीतल
शुभ्र निर्मल
तनिक मीठी
गंगा प्रवाहिनी है
चट्टानों की तह ऐसी ही होती है .....
एक अंकुर- भर
अंजुरी-भर चाह !

टिप्पणियाँ

  1. भावपूर्ण अभिव्यक्ति. shabdo ka sunder sanyojan.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर मर्मस्पर्शी कविता ,बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.