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अपर्णा भटनागर की कविता

ये डर क्यों -
सारे अवसाद तुम्हारे हिस्से ?
परत जमाते ....शनैः शनैः
टिक गए हैं
समय के धरातल पर !
नुकीले
पथरीले
बलुआ
दुखों के जीवाश्म
सर्द बर्फ
एकाकी
बर्फीली चट्टान
पालथी मारे पसरे हो
सीने में दबाये
अवरुद्ध लावे को .....?
आहत हो ?
श्रांत ?
क्लांत ?
अपने इस "मैं " में झाँक कर देखो -
एक हिलोर
पारदर्शी
उज्ज्वल
मधुर पयस्विनी
शीतल
शुभ्र निर्मल
तनिक मीठी
गंगा प्रवाहिनी है
चट्टानों की तह ऐसी ही होती है .....
एक अंकुर- भर
अंजुरी-भर चाह !

2 टिप्पणियाँ

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