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अशोक गौतम का व्‍यंग्‍य : तो क्‍या कहते हैं आप!!

ashok gautam

साहब बाधा से मुक्‍ति के लिए बीसियों उपाय कर चुका हूं, पर साहब बाधा है कि जाने का नाम ही नहीं ले रही। इस बाधा से मुक्‍ति के लिए टोने टोटकों पर जितना धन, समय बरबाद कर सकता था कर चुका। अब तो हर अखबार में छपे हर तांत्रिक के यहां दस्‍तक दे चुका हूं। जिसने जहां बताया गया। पर नतीजा शून्य। हाय! कोई भी शर्तिया इलाज करने वाला मेरी साहब बाधा का इलाज न कर सका, मुझे साहब बाधा से मुक्‍त न कर सका। आजकल तो मेरा यह हाल हो गया है कि शहर के शौचालयों की दीवारों पर, अखबारों में खबरें कम तो क्‍लासीफाइड में शर्तिया इलाज वालों के विज्ञापन अधिक ढूंढता हूं।

कल जब चारों ओर से निराश हो पता नहीं कहां खोया था कि फिर अखबार में एक बाबा की घोषणा पढ़ी तो डूबते को तिनके का ज्‍यों सहारा मिल गया। बाबा ने सहर्ष घोषणा की थी कि- जब कहीं न मिले समाधान, जब बंदा हर ओर से हो जाए परेशान तो हमसे घर बैठे ले फोन पर समाधान! प्रेम बाधा, गृह बाधा, पर पत्‍नी बाधा मुक्‍ति, जुए, सट्‌टे, झूठे कोर्ट केस आदि में जीतने के लिए संपर्क करें। हर बाधा का इलाज स्‍टांप पेपर पर लिखित गारंटी के साथ। मरता क्‍या न करता! और मैं बिन चप्‍पलों के ही सीधा वहां जा पहुंचा। पता करते- करते उनकी दुकान पर पहुंचा तो भीड़ देख परेशान हो गया। यार, इस देष में तो सभी किसी न किसी बाधा के मारे हैं। खैर, मेरी बारी आई तो मैंने उनके आगे घुटने टेके । उन्‍होंने पत्‍नी की तरह मुझे धुआं देते पूछा,‘ बोल क्‍या चाहता है?प्रेम विवाह का इच्‍छुक है? अभी करवा देता हूं। चार- चार बीवियों वालों के भी करवाए हैं मैंने। तू सही चौखट पर आ गया है बच्‍चा!'

‘नहीं बंगाली बाबा! मेरे से तो एक पत्‍नी ही नहीं संभाली जा रही। एक विवाह कर ही पछता रहा हूं। अब तो हर पल भगवान से यही मांगता हूं कि जब तक इस देश में जन्‍म हो लिव इन रिलेशन में ही चलूं। शादी कर इसी जन्‍म में काफी बरबादी करवा ली।' मैंने हाथ जोड़े कहा तो अपनी बाधाओं से मुक्‍ति के लिए इंतजार में बैठे हंसे। बाबा ने मोर पंख के पंखे से मेरे शरीर को फिर छूते पूछा,‘ सरकारी बंदा है?'

‘हां!!'

‘तो क्‍या दफ्‌तर के मनचाहे प्‍यार पर कोई और डाका डाल रहा है?'

‘मैंने कभी इस बारे में सोचा ही नहीं बाबा! जो मातहत यह सोचने की गलती करता भी है बिन चार्ज के चार्ज शीट हो जाता है। दफ्‌तर की हर चीज पर पहला हक तो साहब का होता है न बाबा! वैसे भी पत्‍नी के प्‍यार तले ही इतना दबा रहता हूं कि किसी और के प्‍यार को उठाने का दुस्‍साहस करने की सोच ही नहीं पाता', मैंने पूरी ईमानदारी से कहा तो बाबा कुछ घबराए पर हिम्‍मत न हारे। कुछ देर तक धमा चौकड़ी करने के बाद हुंकार भरते बोले,‘ तो पत्‍नी के दूसरे पति से छुटकारा पाने आया है? अभी करता हूं उसका इलाज! सात जन्‍म के बाद भी तेरी पत्‍नी की ओर देख जाए तो धंधा छोड़ दूं।'

‘ बाबा मैं तो खुद ही उसे छोड़ना चाहता हूं। अब बहुत हो गई गृहस्‍थी। गृहस्‍थी की चक्‍की में पिसते -पिसते चौथाई भी नहीं रह गया हूं देखो!' मैंने उनको अपना आटा- दाल ढो टूटा कंधा बताया तो वे पीछे हटे पर तुरंत संभल भी गए,‘तो गृह क्‍लेश से मुक्‍ति चाहता है रे जीव?'

‘गृहस्‍थी है तो गृह क्‍लेश है बाबा! तुम क्‍या जानो गृह क्‍लेश में क्‍या मजा है? टाइम का पता ही नहीं चला कि कब कट गया।' मैंने कहा तो वे फिर भड़के,‘ तो कारोबार में आई रूकावट से मुक्‍ति चाहता है?'

‘नहीं बाबा! कारोबार है तो नफा नुकसान तो चलता ही रहता है।'

‘तो खाया पिया नहीं लग रहा क्‍या??'

‘ बाजार में खाने पीने को आज रह ही क्‍या गया है? जहर तक को तो छूने से डर लगता है।'

‘तो यहां किस लिए आया है? मेरा उल्‍लू बनाने ?'

‘मैं तो खुद उल्‍लू बन भटक रहा हूं बाबा! उल्‍लू भी रात को तो देख लेता है पर मुझे रात को भी कुछ नज़र नहीं आता।‘

‘तो क्‍या चाहता है बोल? क्‍या समस्‍या है तेरी?? पितर बाधा से मुक्‍ति चाहता है? बच्‍चों को बिन पेपर दिए डिगरी चाहता है?' मेरे से अधिक वे कांपने लगे थे।

‘नहीं बाबा! पितर बाधा से मुक्‍ति के लिए शास्‍त्रों में गया- पिहोवा का जिक्र है। बिन पेपर दिए डिगरी दिलाने वाले हर विश्वविद्यालय में टांगें पसारे ग्राहकों के इंतजार में बैठे हैं। ! मैं साहब बाधा से मुक्‍ति चाहता हूं। इस बाधा के चलते महीनों से दफ्‌तर जाने की हिम्‍मत ही नहीं हो रही। विद आउट पे चल रहा हूं,' मैंने मन की गहराइयों से अपनी पीड़ा कही तो वे मुझे सबसे किनारे ओट में ले जा मेरे आगे दोनों हाथ जोड़ते बोले,‘सच मान मेरे बाप! मैं हर प्रेत बाधा से मुक्‍ति दिला सकता हूं ! मैं जुए ,सट्‌टे में जीता सकता हूं ! मैं विवाहित का भी अपने जादू से प्रेम विवाह करवा सकता हूं ! मैं अपने तंत्रों से बूढ़े को भी घोड़ी चढ़ा सकता हूं। मैं कब्र में पांव लटके को भी मनचाहा प्‍यार दिला सकता हूं। पर साहब बाधा से मुक्‍ति नहीं दिला सकता। उसी बाधा के कारण तो मुझे नौकरी छोड़ ये काम करने को विवश होना पड़ा। साहब बाधा और साहबों से इस देश को उस रोज मुक्‍ति मिलेगी जिस रोज यहां कोई साहब नहीं होगा, सभी मातहत होंगे। फिर देखना, देश कहां जाता है। हिम्‍मत है तो साहब का सामना कर।'

‘नहीं कर पाया तो?'

‘तो मेरे साथ थड़ा लगा ले । सरकारी नौकरी के बाद सबसे अधिक मजे इसी धंधे में हैं। जनता का उल्‍लू बनाने में तो तुम माहिर हो ही! ' वैसे इस आप्शन के बारे में क्‍या राय है आपकी?

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अशोक गौतम

गौतम निवास, अप्‍पर सेरी रोड, सोलन -173212 हि.प्र.

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मज़ा आ गया साहब।
हम भी आते हैं पीछे पीछे।

saare taantrik babaon ko yah lekh padhana chahiye. lagata hai tamaam satae huye daftar ke
lipik mukhya lipik sahabon ke satae baba ban gaye hain. suandar prastuti ke liye vadhaee !

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