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सरोजनी प्रीतम की हास्य कविताएँ : सौ सुनार की एक नार की!

हँसिकाएँ

नाक

आयकर अधिकारी ने

रूपसी अभिनेत्री के घर छापा मारा

तो उसका रूप सौंदर्य देखकर ठगे से

हिरणी सी आँखें, तोते सी नाक देख

इतना ही कह सके,

‘आपके सौंदर्य की धाक रहेगी

हाथों के ही तोते उड़ेंगे…

नाक तो रहेगी.’

 

मनचले

तंदूरी ढाबे पर

रोटी के साथ दाल मुफ़्त लिखा देखकर

मुंह से लार टपकी

पूछने लगे घर की मुर्गी दाल बराबर

मांसाहारी हो या शाकाहारी

सबको मुफ़्त तो मिलेगी?

 

नाच

पति को रोज थैले दे-देकर भेजती

ढेरों सामान मंगाती

रोज उन्हें अपनी उंगलियों पर नचाती

बेचारे थके निढाल

दबे स्वर में गाने लगे… (बस करो)…

अब (तो) मैं नाच्यो बहुत गोपाल

 

रंग

जब शेर और बकरी एक ही घाट पर

पानी पीते हैं, तो पानी रंग लाता है

बकरी गुर्राती है शेर मिमियाता है

 

तथ्य

तुलसीदास, कालिदास

पत्नियों के तानों के कारण

इतनी ऊंचाईयों पर जा पहुँचे

साहित्य में ख्याति मिली

किंतु उनकी पत्नियों को तो सबने

भर्त्सना बार-बार की

वस्तुतः तथ्य तो यही

सौ सुनार की, तो एक नार की

 

विज्ञापनी

छात्राओं ने शिक्षकों का हाल बताया

अध्यापक आते हैं…

बिना पढ़ाए चले जाते हैं…

पीरियड में भी

पीरियड न होने का अहसास दिलाते हैं

 

व्यवसाय

उन्होंने विवाह के लिए विज्ञापन दिया यूँ

मृगनयनी हो गजगामिनी

शुकनासिका, मोरनी सी ग्रीवा हो

सुडौल, हंसिनी की आवश्यकता है

मां जी ने पढ़कर बेटी से कहा

‘यह तो सिरफिरा कवि है

या पशु-पक्षियों का डॉक्टर लगता है’

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(आउटलुक मार्च 2010 से साभार)

2 टिप्पणियाँ

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