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दामोदर लाल जांगिड की कविता : फुटपाथ

फुटपाथ

फुटपाथ भी पैदा होते हैं, फुटपाथ जवानी पाते हैं।

फुटपाथ से डोली उठती तो, माँ बाप के आँसू आते हैं।

 

फुटपाथ भी रोते मय्‍यत पे, ये मंगल गीत भी गाते हैं।

इ न कीच भरे फुटपाथों पर, भगवान भी पूजे जाते हैं॥

 

हालात से कर के समझौता, फुटपाथ पे ही मर जाते हैं।

फुटपाथ वसीसत में अपनी, फुटपाथ ही देकर जाते हैं॥

 

अभिजात्‍य शब्‍द की व्‍याख्‍या में, फुटपाथ धरातल होता है।

थक हार परिश्रम भी आखिर, फुटपाथ पे आकर सोता है॥

 

फुटपाथ के नेता का बँगला , फुटपाथ के उपर होता है।

फुटपाथ का अपना साल गिरह गणतंत्र दिवश पर होता है।

 

फुटपाथ बनाता सरकारें, सरकार इन्‍हें बनवाती है।

आजन्‍म यहां पर रहने का, अघिकार इसे दिलवाती है।

 

हर बार दिवाली आती तो, दिल काम दीये का करते हैं।

फिर स्‍वप्‍न पतंगे आकर के , फुटपाथ पे आकर मरते हैं।

 

और आतिशबाजी बन कर के, कुण्‍ठित अरमान बिखरते हैं।

नवजात अभावों के चूजे, फुटपाथ के नाम से डरते हैं।

 

अपराध जो भूखा पेट करे, कभी माफ किया नहीं जाता है।

बलवान की उँची गर्दन तक, कानून पहुँच नहीं पाता है।

 

फुटपाथ के उभरे हिस्‍सों को, हर आँख निहारा करती है।

फुटपाथ के होठों की लाली, कुछ और इशारा करती है।

 

फुटपाथ के दामन की सिलवट, कोई नाम पुकारा करती है।

फुटपाथ की कातर नजरों से, हर आँख किनारा करती है।

 

जब कर्ण जन्‍म लेता कोई, फुटपाथ पे आकर पलता है,

यह हवश में अंघा स्‍वार्थ यहां, यूं मजबूरी को छलता है।

 

सैलाब वो छिछली नदियों का, फुटपाथ किनारा बनते हैं।

कमजोर अपाहिज कवियों का, फुटपाथ सहारा बनते हैं।

 

इन पाँच सितारों की रौनक, फुटपाथ निखारा करते हैं।

बँगलों को कालिख पुतने से, फुटपाथ उबारा करते हैं।

 

कोठी की विघवा आखिर में, फुटपाथ की दुल्‍हन बनती है।

पश्‍चात्‍य सभ्‍यता की जूठन, फुटपाथ की उलझन बनती है।

 

फुटपाथ की सूखी छाती पर, नवजात मचलते देखे हैं।

फुटपाथ पे आकर रिश्‍तों के, आघार बदलते देखे हैं।

 

व्‍यभिचार सदाचारों जैसे, आकार में ढ़लते देखे हैं।

फुटपाथ के रिसते धावों से, अवसाद निकलते देखे हैं।

 

यूं पाप पुण्‍य की परिभाषा, खुद एक प्रश्‍न बन जाती है।

जब जिस्‍म फरोशी कर ममता, बच्‍चे को दूघ पिलाती है।

 

फुटपाथ के जज्‍बातों में क्‍यों, ये सरकारीपन मिलता है।

बुनियाद में इसकी किस्‍मत में, क्‍यों अत्‍याचारीपन मिलता है।

 

उपकार के रुप में हक पाकर, क्‍यों आभारीपन मिलता है।

फुटपाथ के मरने जीने में, इक दस्‍तूर सा लगता है।

 

लक्ष्‍यहीन चलते रहने को, वो मजबूर सा लगता है।

दो हाथ याचना को पसरे, क्‍यों आभारीपन लगता है।

 

पुचकारने उठते ममता के, दो हाथ हिचकते देखे हैं।

कभी बाप का नाम बयां करते, दो होंठ हिचकते देखे हैं।

 

नैतिकता के उपदेशों के, वो शब्‍द सिसकते देखे हैं ।

सब घर्म शिकस्‍ता पां होकर, धबरा के सिमटते देखे हैं।

 

गांघी के तीन बंदरों की, माकूल जगह फुटपाथ ही है।

खामौश देख सुन रहने की, अनुकूल जगह फुटपाथ ही है।

 

रोटी के आविष्‍कारक को, फुटपाथ कोसता रहता है।

इतिहास के पन्‍नों में अपना, वो नाम खोजता रहता है।

 

राशन की लाइन में पीछे, कभी बाल नोचता रहता है।

फुटपाथ की कौख में पलने का, वो दण्‍ड भोगता रहता है।

 

पश्‍चिम की पुत्री निर्घनता, सैलानी बन कर आयी थी

यहां अभयदान हासिल करके, फुटपाथ की नींव लगायी थी।

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दामोदर लाल जांगिड

पोस्‍ट लादड़िया

जिला नागौर राज.

विषय:

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gehra avlokan aur gehri anubhuti
neelesh jain mumbai


दिनांक 10/03/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
धन्यवाद!

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मैं प्रतीक्षा में खड़ा हूँ....हलचल का रविवारीय विशेषांक.....रचनाकार निहार रंजन जी

बहुत सशक्त रचना है.

tareef ke liye shukriya,meri mehant ka paritoshik mil gaya hai

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