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सुनील संवेदी की कविता : लेडीज फर्स्ट

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लेडीज फर्स्ट

आधुनिक साहित्य ने

जब- औरत के सदियों पुराने

दबे-कुचलेपन, आकांक्षाओं, संभावनाओं

आस्थाओं, संवेदनाओं की

असमय-अस्वाभाविक मृत्यु

एवं इससे उपजी

अस्सीम पीड़ा युक्त हताशा-कुंठा को

शब्दों के भरपूर आंदोलन की

शक्ल देने का जिम्मा उठा ही लिया है

तो- औरत का रोना

सुनाई भी दे दिखाई भी

लेकिन-

आदमी का हंसना मात्र।

आदमी की-

असहनीय व्यथा- व्याकुलता को

भीड़ से खचाखच भरे चौराहों पर

कुचल कर नष्ट हो जाने के लिए, फेंककर,

औरत की डकार को

आकाश दे दो।

 

औरत में-

जबरन प्यास जगाओ

परंतु-

आदमी के फफदियाये होठों से

पपड़ियाये गले तक को

पानी की एक बूंद मयस्सर न हो।

औरत के-

जीर्ण-शीर्ण पल्लू के भीतर

आदमी के माथे की

दुर्भाग्य की पराकाष्ठा नापती लकीरें

खो जाएं।

 

चूल्हा-चक्की, झाडू़-पोंछा

बच्चों की चिल्ल-पों के

सुर में सुर मिलाकर

जैसे-तैसे निबटती औरत के कद में

इतना अप्रत्याशित उछाल आए कि,

छीना-झपटी से लेकर

मार-काट की हद तक

एक-दूसरे को

नोचती-खसोटती भीड़ की

सुर्ख आंखों से घिसट-घिसट कर

जैसे-तैसे बचकर

घर लौटता कटा-फटा आदमी

बौना लगने लगे।

 

ऐ आधुनिक औरत-

छीन ले आगे बढ़कर

आदमी के कपड़ों-लत्तों, हाव-भाव

चाल-ढाल,पीना-पिलाना

उठना-बैठना आदि-आदि को

परंतु-

आज से सदियों पूर्व तक के

दर्द की दुहाई देकर

अंततः, उसे परे धकेल दे

कि, तेरा और कुछ आवश्यक नहीं।

जैसे भी हो-

आदमी को निकृष्ट, निर्लज्ज, दुरूपयोगी,

डरावना, असहज, अमित्र, असहयोगी ही तो

साबित करना है।

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सुनील संवेदी

उप संपादक

हिंदी दैनिक‘जनमोर्चा, बरेली

email-

bhaisamvedi@gmail.com

1 टिप्पणियाँ

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