सोमवार, 9 अगस्त 2010

सुनील संवेदी की कविता धर्मदान

sunil samvedi

मनुष्‍य-

जादू के तमाम करतबों से भरा

एक विलक्षण पिटारा।

कुछ भी नहीं है

सार्थक,यथार्थ से पूर्ण

मात्र धर्म छोड़कर

वह भी-

कपड़ों की तरह

दबाये होता है शरीर को

अपने भीतर।

शरीर के भीतर नहीं

ऊपर होता है धर्म।

परंतु मनुष्‍य-

जादू के तमाम करतबों से भरा

एक विलक्षण पिटारा,

करता है एक नया जादू

एकत्रित कर लेता है भीड़

कर देता है ऐलान

कि देखो एक खेल

पहले देखा न सुना

लो-धर्म लो धर्म

फैलाओ झोलियां

ले जाओ- ले जाओ।

श्रदालुओं की भीड़-

बटोरने में जुट जाती है

वह मुक्‍त होता जाता है

एक-एक कर

फेंकने लगता है- धर्म को

भीड़ बटोरने में लगी रहती है।

लो..

अब वह बन गया

ईश्वर का अवतार

रोज एक नया धर्म सृजित किया

और उछाल दिया

भीड़ की ओर

भीड़ ... जय हो ईश्वर!

धर्म से मुक्‍त होकर भी

शुद्ध ... धर्मदेव कहलाना

जादू ही तो है!

अब..

पियो धोकर पांव

नाक रगड़ो, कदमों पर

उचको पंजों के बल

एक अदद-

दया दृष्‍टि के लिए।

वह-मुंह में थूक दे

तो प्रसाद मान ग्रहण करो

वह सिर पर मूत दे

तो मान लो कि-

धुल गये सारे पाप,

वह गाली दे

तो मंत्र मान ग्रहण कर लो

आखिर-

उसे देना है

और तुम्‍हें लेना।

और बचा ही क्‍या है उसके पास

धर्मदान के बाद

थूक, मूत्र, गाली .... और क्‍या?

कभी न कभी तिलमिलाओगे!

जागने लगेंगे तुम्‍हारे ज्ञान चक्षु!

वह नहीं चीर कर दिखाएगा

तुम्‍हें कभी .... अपनी छाती,

कि देखो-

मैंने भी पी रखा है धर्म

नशें मे डूबा हूं,

वह तो उसने पहले ही दान कर दिया तुम्‍हें।

अधिक उछलोगे!

तो यकायक

खोलेगा अपना पिटारा

थमा देगा तुम्‍हारे

परतंत्र हाथों में

एक जादू।

तम्‍हें नहीं दिखेगा कुछ

दिखेगा भी कैसे

ईश्‍वरीय अनुभूति दर्शन के लिए नहीं होती

वह इतना ही बोलेगा बस्‍स...

और तुम

सुध बुध खोकर नाचने लगोगे।

----

सुनील संवेदी

उपसंपादक, हिन्‍दी दैनिक ‘जनमोर्चा'

54,सिविल लाइंस, बरेली, यूपी

bhaisamvedi@gmail.com

suneelsamvedi@rediffmail.com

1 blogger-facebook:

  1. मनुष्‍य-

    जादू के तमाम करतबों से भरा

    एक विलक्षण पिटारा।

    कुछ भी नहीं है

    सार्थक,यथार्थ से पूर्ण

    मात्र धर्म छोड़कर
    ..wah suneel ji, pehlee hee pankti ne man moh liya. aapki rachna wakai bahut ruchi. itnee khoobasoorat aur yathaarth rachna ke liye dil se badhai. aadarniy Ravi ji ka bhee dil se abhinandan is rachna se roobaroo karwane ke liye. Reg. Ravi Ratlami ji hamaare liye hamesha prernadaayak aur margdarshak rahe hain..aapko kotishah pranam !

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------