विजय वर्मा की हास्य व्यंग्य कविता : बीती विभावरी

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बीती बिभावारी
[जयशंकर प्रसाद जी की आत्मा से क्षमा -याचना सहित]

बीती बिभावारी,

जाग री !

कैसे तू इनके

चंगुल में आन पड़ी

शिघ्रातिशिघ्रम तू

यंहा से भाग री.

इनके मधुर वचन औ'

शुभ वस्त्रों पे मत जा ,

दिखाते है वक

पर है तो ये काग री .

इनकी शिकायत

तू करेगी जाकर थाने

कर दूं सचेत तुझे

तू जाने कि ना जाने

ये तो है सांपनाथ

वहां बैठे है नाग री.

बहुत सोचकर ही

पग उठाना इस ज़ग में

वरना जीवनभर धोती

रह जाओगी दाग री.

बीती बिभावारी

जाग री !,

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v k वर्मा

vijayvermavijay560@gmail.com

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