मंगलवार, 31 अगस्त 2010

जया अपर्णा की कविता – अभी सभ्य होना शुरू ही किया है…

image

अभी सभ्य होना शुरू ही किया है....

पसरे हुए जंगल के किनारे वाला

वह पहला गाँव

मेरा ही तो है...

एक दिन वह जंगल ...

ओझल हो चुका होगा

आँखों से...

एक दिन हमारा गाँव दूर होता

पहुँच जायेगा शायद

बीहड़ चाँद पर....

अभी सभ्य होना शुरू ही किया है....

मैंने देखा है -

तुम्हारा गाँव

उसी वैमनस्य से लड़ता -झगड़ता ,

फसलें घृणा की काटता ..

.नस्लें उपेक्षा की बांटता

अलगाव के बीज रोपता

किसी दुर्दम्य वासना से

चाँद पर सृजन में लगा है

और करवट लेने लगे हैं -

धर्म सत्ताएं ....!

मानव का वही महाकार!

चाँद कुछ सहमा -सा है ...

बस्तियों का प्रसार ..

मेरे बंजर होने में

क्या जीवन यूँ छिपा था ?

आह ! अब धरती कितनी दूर हो चली है ...

और कोई प्रत्याशा?

तृषित रेगिस्तान में खोयी ..

.समय की झुर्रियाँ...

एक और ग्रह की मौत हो गयी

पर कन्धा देने को कौन था ?

तुम तो परदेश बसे थे !

है न !

---.

(लेखिका द्वय की टिप्पणी -

ये रचना हम दोनों का संयुक्त प्रयास है. इसे एक संवाद या परिचर्चा कहना गलत न होगा.

- जया-अपर्णा )

4 blogger-facebook:

  1. अत्यन्त सुन्दर शैली में रची गई इस कविता को बाँच कर आनन्द मिला
    बधाई !

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुंदर कविता, सुंदर भावाभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बदलते वक़्त के दर्द को पिरोये एक भाव पूर्ण अभिव्यक्ति के लिये मुबारक बाद।

    उत्तर देंहटाएं
  4. bahut hii saarthak vishay par likhii gayii sundar kavita

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------