सूरज प्रकाश का संस्मरणात्मक आलेख : कहानी की चोरी और चोरी की कहानी

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  कथाकार तेजेन्‍द्र शर्मा ने कुछ दिन पहले एक ई-मेल भेज कर सब दोस्‍तों को बताया था कि कहानीकार राजीव तनेजा ने उन्‍हें बताया है कि किसी ने उ...

 

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कथाकार तेजेन्‍द्र शर्मा ने कुछ दिन पहले एक ई-मेल भेज कर सब दोस्‍तों को बताया था कि कहानीकार राजीव तनेजा ने उन्‍हें बताया है कि किसी ने उनकी (राजीव तनेजा की) चार कहानियां चुरा ली हैं। तेजेन्‍द्र जी ने इस मुद्दे को सार्व‍जनिक करते हुए मित्रों से इस मामले से जुड़े नैतिकता , अनैतिकता , चोरी और सीनाजोरी , मूल लेखक के प्रति आभार मानने जैसे सवालों के जवाब चाहे हैं और एक तरह से इस मामले पर रोचक बहस छेड़ी है।

कुल मिला कर किस्‍सा मज़ेदार है और इस पर बहस की जा सकती है।

शायद तेईस चौबीस बरस पहले की बात रही होगी। तब कमलेश्‍वर जी गंगा नाम की एक पत्रिका के संपादक हुआ करते थे। उसी गंगा में एक दिन गरमागरम मुद्दा उछला। प्रसिद्ध कहानीकार , नाटककार और उपन्यासकार स्‍वदेश दीपक जी ने एक बांग्‍ला लेखक (इस समय लेखक का नाम याद नहीं आ रहा है।) पर आरोप लगाया था कि उस लेखक ने दीपक जी की कहानी बाल भगवान (बाद में इस कहानी पर नाटक भी आया था।) को चुराया है और उस पर बांग्‍ला में देवशिशु नाम से कहानी लिखी है।

कमलेश्‍वर जी ने इसे एक सार्वजनिक बहस का मुद्दा बनाया और अपनी पत्रिका के जरिये एक तरह की मुहिम शुरू कर दी कि इस तरह की साहित्यिक चोरी के खिलाफ क्‍या किया जाना चाहिये। कमलेश्‍वर जी ने यहां तक किया था कि पाठकों को दीपक जी के पक्ष में मुफ्त पत्र तक भेजने की सुविधा दे डाली थी और इन पत्रों का भुगतान गंगा पत्रिका द्वारा किया जाता।

बाद में पता चला था कि देवशिशु के लेखक की बहुत पहले इसी नाम से इसी कहानी पर आधारित बांग्‍ला फिल्‍म भी आ चुकी थी। वे फिल्‍में अलग नाम से बनाते थे और लेखन अलग नाम से करते थे। अब चोरी का मामला उलटा पड़ चुका था और नये मोड़ के हिसाब से बाल भगवान की कहानी देवशिशु से चुरायी गयी थी।

मुझे ठीक से याद नहीं कि बाद में पूरे मामले का क्‍या हुआ लेकिन राजीव तनेजा के मामले से उस मामले की याद हो आना स्‍वाभाविक ही था।

फिलहाल इसी मामले पर बात करें। न तो राजीव जी ने और न ही तेजेन्‍द्र ने ही बताया है‍ कि कहानी (एक नहीं चार कहानियां) किस स्‍तर पर चुरायी गयीं। हम यहां चार स्थितियों की कल्‍पना कर सकते हैं।

स्थिति एक : राजीव जी किसी दारू पार्टी में अपने कहानीकार दोस्‍तों को अपनी नयी कहानियों के प्‍लॉट सुना रहे थे और ये प्‍लॉट ही पहली बार दूसरे लेखक या लेखकों की कहानियों के रूप में सामने आये। नशा उतरने पर या अपने प्‍लाटों पर दूसरे के बसे घरों को देख कर (खोसला का घोंसला) उन्‍होंने पाया कि वे लुट चुके हैं।

स्थिति दो : राजीव जी अपनी कहानियां लिख चुके थे और किन्‍हीं मित्रों को पढ़ने या सुधारने के लिए दीं और ये कहानियां वापसी में राजीव के घर का पता भूल कर अलग अलग पत्रिकाओं के दफ्तर में जा पहुंची और बेवफा सनम की तरह दूसरे लेखकों का वरण करके उनके नाम से छप गयीं।

स्थिति तीन : ये भी हो सकता है कि राजीव जी ने अपनी कहानियां टाइप करने के लिए किसी टाइपिस्‍ट को दी हों और पैसों के अभाव में अपनी कहानियां वहां से उठवा न पाये हों। अब टाइपिस्‍ट ने अपना मेहनताना वसूल करने के लिए सिर्फ टाइपिंग की कीमत पर से कहानियां किसी दूसरे लेखक को टिका दी हों (दर्जी आम तौर पर यही करते हैं।) ये भी हो सकता है कि टाइपिस्‍ट खुद उभरता लेखक रहा हो और कहानियां अपने नाम से छपवा डाली हों।

स्थिति चार : राजीव जी की छपी हुई कहानियां ही किसी पहलवान छाप लेखक ने अपने नाम से दूसरी पत्रिकाओं में छपवा ली हों। क्‍या कर लेगा राजीव।

हो सकता है मेरे पाठकों को इसके अलावा कोई और स्थिति भी सूझ रही हो। मुझे जरूर बतायें।

ऐसा मेरे साथ भी हो चुका है। एक ही कहानी की दो बार चोरी। अलग अलग भाषाओं में।

बताता हूं आपको।

1989 में हँस में मेरी कहानी ये जादू नहीं टूटना चा‍हिये छपी थी। कहानी काफी चर्चित रही और कई भाषाओं में अनूदित हुई। शायद 1998 की बात होगी। मेरे एक गुजराती मित्र , जो मेरी ये कहानी गुजराती में पहले ही पढ़ चुके थे , ने फोन करके बताया कि ये कहानी भारतीय विद्या भवन की गुजराती पत्रिका नवनीत में छपी है और मूल लेखक की जगह किसी मुसलमान लेखक का नाम है। हिंदी से अनुवाद में बेशक किसी गुजराती अनुवादक का नाम है। मेरे मित्र ने जब उस कहानी की फोटोकापी मुझे दी तो मैं हैरान रह गया। कहानी के अंजर पंजर ढीले कर दिये गये थे। कहानी की अंतिम पंक्ति जो पूरी कहानी की दिशा तय करती थी और मेरे लिए और पाठक के लिए भी बहुत मायने रखती थी , बदली जा चुकी थी। मैंने बहुत निराश हो कर नवनीत के संपादक को पत्र लिखा और अपने पत्र के साथ अपनी मूल कहानी , गुजराती में पहले से अनूदित पाठ और अब नवनीत में छपी कहानी की कापी भेजी और जानना चाहा कि किसी भी रचना का अनुवाद छापने के लिए उनके क्‍या नियम हैं।

ये सरासर चोरी का मामला था।

जब कई दिन तक कोई जवाब नहीं आया तो मैंने फोन पर ही बात की। उनके उत्‍तर गोल मोल थे और कहीं से भी मुझे संतुष्‍ट न कर सके। हार कर मैंने अनुवादक का पता और फोन नम्‍बर मांगा। अनुवादक ने जो कुछ बताया , उस पर सिर ही धुना जा सकता था। मैंने भी वही किया। अनुवादक ने बताया कि वह राह चलते फुटपाथ से रद्दी में हिंदी पत्रिकाएं खरीदता है और कोई कहानी अच्‍छी लगने पर उसका अनुवाद कर लेता है। ये कहानी उसने सरिता नाम की मैगजीन के‍ किसी पुराने अंक से ली थी। जब मैंने पूछा कि हिंदी में कहानी क्‍या इसी रूप में और इसी अंत के साथ छपी थी और क्‍या वे मुझे सरिता का वह अंक दे सकते हैं। अनुवादक के जवाब किसी भी लेखक को आत्‍म हत्‍या करने के लिए प्रेरित कर सकते थे। मैंने वह नहीं की। उसने बताया कि वह अनुवादक के रूप में अपनी जिम्‍मेवारी समझता है और जो खुद उसे अच्‍छा नहीं लगता या समझ में नहीं आता , उसे बदल डालता है और अपने हिसाब से तय करता है कि कहानी का अंत क्या होना चाहिये। मेरी कहानी के साथ भी उसने यही किया।

जहां तक सरिता का वह अंक मुझे देने की बात थी , अनुवादक महोदय ने बताया कि वे अपना काम हो जाने के बाद पत्रिकाओं को वापिस रद्दी में बेच देते हैं।

अब मेरे पास अपनी ही कहानी , जो किसी और के नाम से सरिता में छप चुकी थी , पढने का एक ही जरिया था कि पिछले 10 बरस के सरिता के सभी पुराने अंक खंगालूं और चोर लेखक को और सरिता के संपादक मंडल को प्रणाम करूं। ये सब करना संभव नहीं होता। मैंने भी नहीं किया। सरिता , चोर लेखक और चोर अनुवादक को बधाई दी जिन्‍होंने बेशक मेरी कहानी को खराब करके ही सही , और पाठक दिये।

हमारे आफिस में कर्मचारियों के लिए हर बरस पत्रिकाएं छापी जाती हैं। इस बार एक वरिष्‍ठ कर्मचारी ने बच्‍चन जी की एक चर्चित कविता अपने नाम से छपने के लिए दी। मैंने उस नवोदित कवि से पूछा कि ये कविता बच्‍चन जी के नाम से छपेगी , कर्मचारी के नाम से छपेगी या दोनों के नाम से। जवाब में हुआ ये कि कर्मचारी ने चपरासी को भेज कर कविता वापिस मंगवा ली।

राजीव जी , मन छोटा न करें। हम मायानगरी मुंबई में रहते हैं और रोज़ाना पचासों गीतों , आइडियाज़ , धुनों , सिचुएशनों , पूरी की पूरी फिल्‍म की चोरी की घटनाएं सुनते पढ़ते हैं। चोरी तो होती ही है और जब चोरी एक बार से ज्‍यादा बार होती है , ये तय करना मुश्‍किल हो जाता है कि पहले चोरी किसने की। पहले अ ने अंग्रेजी धुन चुरायी और फिर ब ने अ द्वारा चुरायी धुन को अपनी बना कर अपना कहा या उसने भी मूल अंग्रेजी से चुरायी फिर अपना कहा , कहना मुश्किल होता है।

राजीव जी , किसी ने आपका आइडिया चुराया तो क्‍या चुराया। विश्‍व भर के लेखक सदियों से चले आ रहे उन्‍हीं ग्‍यारह आइडियाज़ में से अपने काम का आइडिया ले कर पूरा जीवन लेखन करते हैं। अब आप ही बतायें कि मेरे घर में मौजूद बूढ़े पिता पर लिखी गयी मेरी कहानी गोविंद मित्र द्वारा अपने पिता पर लिखी गयी कहानी से बहुत जुदा कैसे हो सकती है जबकि सच तो ये है दो अलग अलग घरों में दो अलग अलग बूढ़े एक ही वक्‍त को कमोबेश एक ही तरीके से जी रहे हैं। सिर्फ कहानी का ट्रीटमेंट ही एक कहानी को दूसरी कहानी से अलग करता है।

छपी हुई कहानी चुरायी , पढ़ने के लिए या टाइपिंग के लिए दी कहानी अपने नाम से छपवा ली तो आपके पास तो प्रूफ होगा कहानी को अपना कहने के लिए। चढ़ बैठिये , चोर के सीने पर और कीजिये एक्‍सपोज उसे।

बात खत्‍म करने से पहले अपनी ही एक और कहानी का उदाहरण देता हूं। मैंने अपनी पत्‍थर दिल कहानी 1992 में लिखी थी और मेरा आरोप है कि बी आर चोपड़ा जी ने इस कहानी के लिखे जाने से 25 बरस पहले ही इस पर अपनी मशहूर फिल्‍म गुमराह बना ली थी। बेशक उसमें फिल्‍मी लटके झटके डालने के लिए बहुत सारे चेंजेज किये थे। ये बात अलग है कि गुमराह मैंने पहली बार पिछले हफ्ते ही देखी और बी आर चोपड़ा ने मेरी कहानी शायद ही पढ़ी हो। बेशक उनकी फिल्‍म और मेरी कहानी की बेसिक थीम एक ही है।

सूरज प्रकाश

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रचनाकार: सूरज प्रकाश का संस्मरणात्मक आलेख : कहानी की चोरी और चोरी की कहानी
सूरज प्रकाश का संस्मरणात्मक आलेख : कहानी की चोरी और चोरी की कहानी
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