गुरुवार, 12 अगस्त 2010

अमिता कौंडल की कविता

हे मालिक
भटके हुए  कदमों को
राह दे दे
मानव को मानवता की
चाह  दे दे

 
रोते रोते
इंसानियत की आँखे
फूल गईं
सुख और शांति की बहारें
रूठ गईं
होली के रंगों में जहर
भर  गया
दिवाली की मिठाइयों  में
मिलावट घुस गई

 
भ्रष्टाचार ने राजनीति को 
घर बनाया
झूठ ने सच को उसीके
घर से भगाया
मात्र धन कमाना ही
उद्देश्य बन गया

 
शिक्षा को व्यापारियों ने
है व्यापार  बनाया
मंदिरों  में भी वी आई पी
लाइनें बन गई
तुझे  भी
इन्सान  ने है अब
बंदी बनाया

 
लड़ता है तेरे नाम
पर ये नादान
सुबह शाम
यह भूल कर
कि  ये  जहाँ सारा
तूने ही तो है  बनाया

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3 blogger-facebook:

  1. अच्छी कविता पर कुछ और समय देने से और अच्छी हो सकती थी।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी6:54 pm

    sunder bhav hai aur sachchi baat
    kavita bahut achchhi hai
    badhai
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  3. amita kaundal9:39 am

    रविजी मेरी कविता को मंच देने के लिए धन्यवाद. रचना जी आपके सुंदर शब्दों के लिए धन्यवाद संजय जी सच में कविता को में उचित समय नहीं दे पाई थी. आपकी इस सच्ची टिपण्णी और प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद.
    आभार अमिता कौंडल

    उत्तर देंहटाएं

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