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गंगाधर ढोके की ग़ज़लें

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ग़ज़ल 1

वह हदें बनाता है मैं दीवारें ढहाता हूं

वह नज्‍म कहता है मैं बातें बनाता हूं

 

कोई मां मुझे क्‍यों पसन्‍द करने लगी

मैं बच्‍चों के लिये पटाखें बनाता हूं

 

बरसात मुझे अपना दुश्‍मन समझती है

मैं लोगों के लिये छातें बनाता हूं

 

लड़कियां मुझसे मुझसे पर्दा नहीं करती

मैं घरों के लिये दरवाजे बनाता हूं

 

यूं चलती है एक दूसरे की रोजी-रोटी

वह चने बेचता हैं मैं लिफाफे बनाता हूं

 

सियासत से मेरी पटरी नहीं बैठती

वह वादें करती है मैं इरादे बनाता हूं

 

ग़ज़ल 2

बात हिन्‍दू की, ना मुसलमान की

सेहत अच्‍छी नहीं हिन्‍दुस्‍तान की

 

कातिल के हाथ सौंपी जा रही

आजकल नस्‍तियाँ तहकीकात की

 

प्‍याले में विकास गले में व्‍हिस्‍की,

हद हो गई अब तो खुराफात की

 

चर्चा रूखसार की बहुत हो चुकी

अबकी बात हो उनके जज्‍बात की

 

ये सुन सुन कर सूख सा गया हूं

कभी तो बात कीजे बरसात की

 

गगन छूने लगी उनकी बुलंदी

बड़ी कीजे चौखट ख्‍यालात की

 

इस घर के दीये बुझने लगे

बंद कीजै मुख्‍बिरी आफ्‍ताब की

 

जवाब देते सदियां गुजर गई

अब बारी, उनके सवालात की

 

यादें चुनरी में लगे दाग-सी

धुलती नहीं पहली मुलाकात की

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परिचय

नाम - डा0 गंगाधर ढोके

जन्‍म- 28 जून-1967 ग्राम गायखुरी

जिला छिन्‍दवाड़ा मध्‍यप्रदेश

शिक्षा- एम0ए0, पीएच.डी हिन्‍दी साहित्‍य

प्रकाशन- नया ज्ञानादेय एवं कथादेश में

ई मेल& ganga744@rediffmail.com

3 टिप्पणियाँ

  1. प्‍याले में विकास गले में व्‍हिस्‍की,
    हद हो गई अब तो खुराफात की

    wahhhhhhhhhhhh ji kya baat kahi hai

    yun kaho sara chintan ek hi sher mein kah diya
    ise kahte hai sagar mein gagar
    awaysome sher ...daad hazir hai kubool karen

    जवाब देंहटाएं
  2. बेनामी9:31 pm

    बहुत अच्छी हैं दोनो

    जवाब देंहटाएं
  3. पहली ग़ज़ल में पटाखें छातें की जगह पटाखे व छाते सही होगा, साथ ही मतला की पहली लाइन में रदीफ़ दोष पूर्ण है। दूसरी ग़ज़ल में मुसलमान् हिन्दुस्तान के साथ बरसात , ख़ुरापात, ज़ज़बात फ़िर आफ़ताब
    दोषपूर्ण काफ़िये हैं कम से कम ग़ज़ल के दायरे में।

    जवाब देंहटाएं

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