मंगलवार, 10 अगस्त 2010

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : सखि री, बाढ़ आई

yashwant kothari new

हे प्राणप्यारी, सुमुखी, मयूर-पंखिनी, कमल लोचनी, सुनयने,सखि, तुम कहां हो। देखो, बाहर सम्पूर्ण आर्यावर्त मंे कैसा हाहाकार मचा है। कभी ब्रज में ऐसी विनाश लीला हुई थी और भगवान कृष्ण ने गोवर्धन को ऊपर उठाकर सम्पूर्ण ब्रज की रक्षा की थी। देख सखि, आज देख, देवराज (दिनेश) इन्द्र ने कैसा कहर बरपा दिया है। हर ओर पानी.....पानी और पानी। सर्वत्र जल-प्लावन का सुन्दर दृश्य उपस्थित है, तुम भी अपनी आंखों से यह महान घटना देख लो। चुनावों के आवश्यक कर्मकाण्ड के बाद नेता कभी अपने क्षेत्र में नहीं जाते। लेकिन आज देखो, सभी नेता हैलिकॉप्टरों में बन्द होकर बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों का मुआइना करने में लगे हुए हैं। छुटभैये कैसे दौड़-दौड़ कर पानी में स्वागतद्वार बना रहे हैं। और देखो, तुम भी देखो, इन्हीं स्वागत-द्वारों के पड़ोस में बाढ़ग्रस्त जनता के कैम्प लगे हैं। कैम्प में स्वयंसेवी संस्थाएं, रेडक्रास वाले, दवा वाले दौड़-दौड़कर चक्कर लगा रहे हैं। सखि, मुझे लगता है कि सचमुच बाढ़ आ गयी है।

देख सखि, बाहर देख, खिड़की के बाहर झांक। हर शहर पानीदार हो गया है। कैसी तेज मूसलाधार बारिश हो रही है। वृक्ष टूट-टूट कर जमीन पर गिर गये हैं, और सड़कों पर राज्य परिवहन निगम की बसों के बजाय नावें चल रही हैं। प्रेस वाले फोटो उतार रहे हैं। हेलिकॉप्टरों से रोटियां और बासी आलू की सब्जी गिर रही है। लगता है वास्तव में ही बाढ़ आ गई है। जल का राज आ गया है, और हम सभी इस भंवर में डूब जायेंगे। सखि, देर मत कर और इस अलौकिक चमत्कार को किसी आधुनिक भगवान का चमत्कार समझ कर नमस्कार कर।

बाढ़ ने क्या-क्या नहीं किया। जिले, गांव, शहर और मोहल्ले तबाह हो गये। पुल ढह गये, पुलियाएं बह गयीं और हमारे निर्माण विभाग वाले हैं कि रेत की बोरियां और फर्जी मस्ट्रोल लेकर दौड़े फिर रहे हैं। चीफ साब आ रहे हैं और एक्सइन साब जा रहे हैं। रेत में सीमेन्ट या सीमेन्ट में रेत, कोई फर्क नहीं पड़ता। तो देख, उस ओर एक अफ्सर पत्नी अपनी सरकारी कार में, अपनी कान्वेट पढ़ी पच्चीस वर्षीया बेबी को बाढ़ दिखा रही है।

यू सी बेबी, इट इज फ्लड। और बेबी कह रही है,

ममी, हाऊ लवली। रियली फनी। मम्मी, ऐसी सुन्दर बाढ़ रोज क्यों नहीं आती। आओ हम पिकनिक मनाएं....।

और उधर देख, वहां बाढ़ पीड़ित जवानी अपनी अस्मत का सौदा कर रही है, ताकि पेट भरे और घर में चूल्हा जले। इन्जिनियरों, स्वयंसेवकों, नेताओं, सरकारी अफसरों, चोरों, गिरहकटों और उठाईगिरों के लिए तो बाढ स्वर्ण अवसर है। वो तो इसे दीवाली की तरह मना रहे है। मरणासन्न लोगों के हाथ पांव के आभूषण उतारना, कपड़े उतारना बाढ़ में बह गए कपड़ों, सामानों को अपने घर में भर लेने का नया कर्मकाण्ड शुरू हो गया है। हे सखि, हर तरफ यही मनोरम दृश्य दिखाई दे रहा है। जम्बू द्वीप में तो बाढ़ ही बाढ़ है।

अब तुम ही सोचो, यदि कोई गांव समुद्री टापू हो गया है तो इसमें सरकार क्या करे। सरकार सड़क ठीक होने का इन्तजार करती हैं और ठीक होते ही अफसर अपने अमलों के साथ गांव का दौरा करते हैं। पटवारी हाजरी भरते हैं, हुक्का, चिलम भरते हैं। दौरा खत्म होता है। बाढ़ का पानी भी उतर जाता है, और सरकार किसी नई बाढ़ का इन्तजार करने लगती है।

सखि, तुझे एक राज की बात बताऊं बाढ़ भी हमारी तरह स्त्रीलिंग है, अतः इसके चरित्र का भी सरकारी चरित्र की तरह भगवान ही मालिक है। वास्तव में बाढ़ की जवानी, किसी तरुणी की जवानी से भी ज्यादा खतरनाक है ऐसा शास्त्रों में लिखा है, सो जानना और इस पर विचार करना।

बाढ़ के समय मानव मात्र का चरित्र बदल जाता है। मनुष्य- मनुष्य का भक्षण कर लेता है। गिद्ध और कौवों की तरह मनुष्य को खाता हैं। सखि, यह सब देखकर मेरी आत्मा ग्लानि से भर गई है, और अब नहीं लिखा जाता। सखि रे, भगवान को पुकार कि इस बाढ़ से देश को बचाए।

तुम्हारी सखि

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यशवन्त कोठारी

86, लक्ष्मी नगर,, ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर-302002 फोनः-2670596

2 blogger-facebook:

  1. yeshwant jee,
    aapane kalyugee neta, mantrion aur sanatrion ke charitr ko apanee lekhanee ke foolon se guldasta bana diya hai, badhaaee !

    उत्तर देंहटाएं

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