सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता

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surender agnihotri-222 (Mobile)

गुलामी से भी दर्दनाक होते है

बच्‍चों की जेल के एक दिन

चूतड़ पर मार पड़ते-पड़ते

चलना-फिरना हो जाता कठिन

कटे पंख सा पिंजरे में फड़फड़ाता

भाग ने का करता रहता जतन

खतरे फुंफकारते रहते है इर्द-गिर्द

पाशविक बलात्‍कार होता प्रतिदिन

आंखों पर पट्‌टी बांधकर ले जाते

चीख के बिना दर्द करता सहन

रुंधे कंठ से किससे कहे आज हम

अधिकारों का रोज होता दमन

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

120/132, बेलदारी लेन, लालबाग, लखनऊ

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2 टिप्पणियाँ "सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता"

  1. बेनामी1:10 am

    कड़वा सच कहती प्रभावी कविता

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही सुन्दर व यथार्थ का आईना दिखाती रचना। "चूतड़ " शब्द से बचते तो ज़ियादा उचित होता।

    उत्तर देंहटाएं

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