एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य : हास्यरसिकों की दुआएं

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कु छ विद्वानों का कहना है कि हास्यरसिक कुछ लोगों को बर्बाद कर देने पर तुले हुए हैं। इनका मुख्य काम रस लेना ही है। लेकिन जिन्हें ये बर्बाद कर...

कुछ विद्वानों का कहना है कि हास्यरसिक कुछ लोगों को बर्बाद कर देने पर तुले हुए हैं। इनका मुख्य काम रस लेना ही है। लेकिन जिन्हें ये बर्बाद करते हैं वो भी रस के वश कुछ समझ नहीं पाते अथवा समझने की जरूरत ही नहीं समझते। जैसे लोग जूता और जूती को इस्तेमाल करते हैं। वैसे ही हास्यरसिक लोगों को। एक मॉडल पुराना हो जाने पर अथवा घिस-पिट जाने पर, उसे छोड़ दूसरा, दूसरे को छोड़ तीसरा अपनाते रहते हैं। एक साथ भी तो कई रख सकते हैं। और रखते भी हैं। एक साथ नहीं भी पहन सके तो क्या हुआ ? बारी-बारी से तो पहना ही जा सकता हैं। एक ही मॉडल से मन भी तो ऊब जाता है। इसलिए भी मजबूरी में छोड़ना पड़ता है। जिसे छोड़ा उसकी खोज-खबर सपने में भी नहीं लेते, चाहे पानी में पड़े-पड़े सड़े और चाहे किसी दूसरे के हाथ लगे । गांव, शहर, घर, स्कूल-कॉलेज, दफ्तर से लेकर चौराहों, गलियों व नुक्कडों पर हास्यरसिक घूमते-झूमते व मंडराते रहते हैं। मकसद एक ही है रस लो, बेवश करो और रही-सही कसर पूरी करके जागरण व सशक्तीकरण के माहौल में ही जूता और जूती बना के ही छोड़ो ।

ये तो रहीं विद्वानों की बातें। कुछ लोग बताते हैं कि हास्यरसिकों का काम कुछ भ्रमरों जैसा होता है। इन्हें सिर्फ रस चाहिए। शुद्ध रहे तो ज्यादा ठीक, नहीं तो भी अपना काम चला ही लेते हैं। पास से न सही तो दूर से ही सही, हास्य रसिक रस लेने का प्रयास करते हैं। धीरे-धीरे पास भी आ जाते हैं। नयन-वयन तक पहुँच हो जाने के बाद आगे की यात्रा के लिए तैयारी शुरू कर देते हैं। भिखारी कुछ पाते हैं तो दुआ करते हैं। लेकिन हास्यरसिक पायें या न पायें दुआ ही करते हैं। रही बर्बाद करने वाली बात तो अपने फायदे में यह किसे पड़ी होती है कि कौन बर्बाद हो रहा है और कौन बन रहा है ?

आजकल सभी भिखारी ‘ जो दे उसका भी भला और जो न दे उसका भी भला ’ की दुआ नहीं करते। कुछ तो गाली से लेकर श्राप तक भी देते हैं। चाहे धीरे या मन में ही क्यों न दें। कुछ तो अठन्नी और रुपया उठाकर देने वाले के मुंह पर फेंक देते हैं। सबका अपना स्टेटस होता है। परन्तु लोग अपना स्टेट्स तो बनाते हैं, सवांरते और सहेजते हैं। लेकिन दूसरे के बने बनाए इस्टेट्स पर भी पानी उंड़ेल देते हैं। अठन्नी देना भिखारी के भी स्टेटस का माखौल उड़ाना ही होता है। इसे भिखारी अपना अपमान समझता है। अपना स्टेटस सबको प्रिय होता ही है।

भिखारियों की दुआएं फलती हैं कि नहीं, क्या पता ? फलती भी होंगी तो कम। लेकिन हास्यरसिकों की दुआएं बहुत फलती हैं। यह हास्यरसिकों के दुआवों का ही नतीजा है कि जो लोग कभी हाथ भर के घूघट में चलते थे, आज उनके शरीर पर कुल-मिलाकर हाथ भर भी कपड़ा नहीं होता। फिर भी हास्य रसिक संतुष्ट नहीं हैं। ये आधे-अधूरे खेल को पूरा कर डालने के उस्ताद होते हैं। जी-जान से लगे रहते हैं। और पूरा करके ही छोड़ते हैं। विज्ञानी कहते हैं कि ‘जीरो के ’ की स्थिति तो लायी जा सकती है। लेकिन इससे नीचे नहीं हो सकता। बहुत से प्रयोग में ‘जीरो के ’ की स्थिति यानी जीरो केल्विन की स्थिति लायी भी जाती है। हास्यरसिक भी ‘जीरो के ’ की स्थिति ही लाना चाहते हैं। इनका कहना है कि विग्यानी चाहे नीचे पताल में जाएँ चाहे उपर आसमान में हमें तो बस ‘जीरो के ’ यानी ‘ जीरो कपड़ा ’ वाली स्थिति ही चाहिए। जीरो हो जाये बस, इसके आगे और कहाँ ले जायेंगे ? बहुत से विज्ञानी भी इस ‘जीरो के’ की स्थिति में भी पहुंचे हैं। दुआ फलेगी। धीरे-धीरे ही सही लेकिन एक न एक दिन जीरो के की स्थिति आ ही जायेगी। तब तक ये चाहते हैं कि जिपों और बटनों का रिमोट इनके आँखों में आ जाये। आँख दबाए या नजर घुमाए नहीं कि ‘ जीरो के ’ के लगभग की स्थिति सामने आ जाये।

आज ‘लव एट फर्स्ट साईट ’ यानि ‘लाफ्स ’ का जमाना है। जिसका एक मतलब है कि देखते ही प्यार। ‘लाफ्स’ का मतलब हँसता है भी होता है। जानकर बताते हैं कि हँसने का सम्बन्ध फँसने से भी होता है। अतः कुलमिलाकर ‘लाफ्स’ फँसने-फँसाने का खेल ही है। आज प्यार हास्य रस के परे भी है। कहना मुश्किल है। कुछ भी हो लेकिन लोंगों को क्या पता कि यह स्थिति अपने आप ही नहीं आ गयी है। यह भी हास्यरसिकों की दुआओं का ही फल है। वर्षों की दुआ रंग लायी है। पहले दूर-दूर, तब किसी तरह पास, तब नयन-वयन तक, फिर आगे की यात्रा मुश्किलों भरी और बहुत ही समय खपा देने वाली होती थी। आज एक झटके में ही काम हो जाता है, लोग कहते और समझते हैं कि प्यार हो गया है । हास्यरसिक दिलवाले होते हैं और दिलवालों को ही देखते ही प्यार होता है। एक दिलवाले ने सड़क पर जाती हुयी एक लड़की को देखा। वो भी पहली बार देखा था। तुरंत सीटी बजाया । यानि प्यार होने का सिग्नल दिया। लड़की ने उधर देखा तो लड़के को उसने भी पहली बार देखा। उसे भी पता ही था कि लाफ्स का बोलबाला है। तो सारा शरीर झनझना उठा। क्योकि प्यार हो गया था। आज का प्यार भी बिजली यानि करेंट के तरह ही लगता है।

प्यार तो हो ही गया था, लेकिन लड़का उदास होकर बोला। यह दुनिया प्यार हो जाने के बाद भी करने नहीं देती। सबकी नजर प्यार करने वालों पर ही लगी रहती है। खुद चाहे ठोकर खाकर गिर पड़ें। कहाँ जाएँ ? होटलों तक के कमरों में लोग कैमरा लगाये बैठे हैं।

शर्म-लिहाज कितने दिन तक रास्ता रोकती। आखिर हास्यरसिक कब तक सब्र करें। अतः लोग अंधे हों अथवा न हों वे धीरे-धीरे लोगों को अंधा ही समझना शुरू कर दिए। यह भी वैज्ञानिक पद्धति है। माइक्रो-फिजिक्स में दो तरह के वैज्ञानिक बिचार हैं। एक जिसमें कोई देखे तो फर्क पड़ता है, दूसरे बिचार में देखने और न देखने से कोई फर्क नहीं पड़ता। अपना काम होता रहता है। इसे ओवजरवर डिपेंडेंट और ओवजरवर इनडिपेंडेंट थेरी कहते हैं। अतः कोई कुछ भी कहे लेकिन आज के हास्य रसिक भी उच्चकोटि के वैज्ञानिक हैं। और कुछ दिन बाद निम्न पक्तियों को पूरा-पूरा चरितार्थ कर दिखायेंगे –

पहले वालों के दिल न था, दिलवाले अब जाये हैं।

खुलकर कहते खोलके रहते अपनी धाक जमाए हैं।।

दिलवालों को डरना ही क्या कुछ भी न शर्मायेंगे।

कुछ दिन बीते खुल्लमखुल्ला सब कुछ कर दिखलायेंगे।।

कुछ जानकर बताते हैं कि हास्यरसिको का दिन हँसे-बोले और इसके आगे फँसे और फँसाये ही बीतता है। कुछ की तो चौराहों आदि पर नजरे बिछाए ही बीतता है। यह इनके दुआवों का ही नतीजा है कि अधिक से अधिक लोग इन्हें नयन रस देने के लिए जीरो के की स्थिति की ओर लगातार बढते हुए घरों की चारदीवारियों को तोड़ते, फांदते निकल रहे हैं।

हास्यरसिकों के दुआवों से भी बहुत लोगों का तलाक होता है। आज कल हास्यरसिक बढ़ रहे हैं और साथ ही तलाक की घटनाएँ भी। तलाक हो लेकिन पूर्व कथित पति से ही खर्चा-पानी मिलता रहे तो हास्य रसिक ‘हर्रे लगे न फिटकिरी रंग भी चोखा आये’ का आनंद उठाते हैं। हास्यरसिक हित भले ही लगे लेकिन वह हित नहीं होता। होगा भी तो टेम्परोरी। हास्यरसिक कभी परमानेंट नहीं हो सकता। ऐसा कह सकता है, वादा कर सकता है। अभी देखो हास्यरसिक क्या-क्या नहीं कर गुजरते हैं। जब तक पांवों की जूती व जूते की स्थिति तक पहुंचा नहीं देंगे । यह मानने वाले नहीं।

हास्यरसिक जब अविवाहित लड़कियों से हास्यरस करते हैं तो बहुत स्पेशल दुआ करते हैं। और आजकल यह दुआ भी बहुत फलने लगी है-

जिस घर में तुम्हारी शादी हो।

चाहे धोने को कपड़ों की लादी हो।।

पहनने को सूती व खादी हो।

रूखा-सूखा, बासी खाने को आदी हो।।

चाहे जितनी बर्बादी हो।

पर मिलने की पूरी आजादी हो।।

मेरे बच्चों की सास तुम्हारी दादी हो।

जिस घर में तुम्हारी शादी हो।।

( नोट: हास्य रस के बारे में जानने के लिए कृपया हास्य रस के नए आयाम पढ़ें। )

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- एस के पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.)।

URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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रचनाकार: एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य : हास्यरसिकों की दुआएं
एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य : हास्यरसिकों की दुआएं
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