बुधवार, 15 सितंबर 2010

प्रमोद भार्गव के सामाजिक सरोकारों के आलेखों की ई-बुक – आम आदमी और आर्थिक विकास : 4

आम आदमी और आर्थिक विकास

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प्रमोद भार्गव

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पिछले अंक से जारी…

इस अंक में -

11. भूख की मारी महिलाएं

12. बढ़ते तापमान से डूबता किसान

13. आर्थिक समृद्धि की भारतीय परंपरा

14. भूख से भयभीत देश 55

15. जल समाधि लेता भारतीय उपमहाद्वीप

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भूख की मारी महिलाएं

आर्थिक विकास के दौर में सुरसामुख की तरह फैलती भूख की सबसे ज्‍यादा त्रासदी दुनियां की आधी आबादी यानी महिलाओं को झेलनी पड़ रही है। दुनिया की साठ फीसदी महिलाएं भूख, कुपोषण और रक्‍ताल्‍पता की शिकार हैं। नव-उदारवाद के चलते लगातार बढ़ रही विषंगति व असमानता ने गरीब महिलाओं के हालात इतने दयनीय बना दिए हैं कि आंध्रप्रदेश के खम्‍मम जिले के सरकारी अस्‍पताल का बिल नहीं चुका पाने के कारण एक परित्‍यक्‍ता को अपने सात दिन के नवजात शिशु तक को बेचना पड़ा। इस घटना से जहां एक ओर महिला सशक्‍तीकरण के दावों की पोल खुलती है, वहीं हकीकत भी सामने आती है कि लाचार लोगों के लिए देश और प्रदेश सरकारों द्वारा चलाई जा रही जनकल्‍याणकारी योजनाओं की महत्ता व उपादेयता कितनी रह गई है?

प्रकृतिजन्‍य स्‍वभाव के कारण औरतों को ज्‍यादा भूख सहनी पड़ती है। दुनियाभर में भूख की शिकार हो रही आबादी में से 60 प्रतिशत महिलाएं ही होती हैं। क्‍योंकि उन्‍हें स्‍वयं की क्षुधा-पूर्ति से ज्‍यादा अपनी संतान की भूख मिटाने की चिंता होती है। कुछ ऐसी ही वजहों के चलते भूख, कुपोषण व अल्‍प पोषण से उपजी बीमारियों के कारण हर रोज 12 हजार औरतें मौत की गोद में समा जाती हैं। मसलन महज सात सेकेण्‍ड में एक औरत!

आधी दुनियां की हकीकत यह है कि परिवार को भरपेट भोजन कराने वाली मां को एक समय भी भोजन आधा-अधूरा ही नसीब हो पाता है। परिजनों की सेहत के लिए तमाम नुस्‍खे अपनाने वाली ‘‘स्त्री'' खुद अपना जीवन बचाने के नुस्‍खे का प्रयोग नहीं करती। अपनी शारीरिक रचना की इसी विलक्षण सहनशीलता के कारण भूखी महिलाओं की संख्‍या में इजाफा हो रहा है।

1996 में हुये विश्‍व खाद्य शिखर सम्‍मेलन के 12 वर्ष बाद भी दुनिया में ऐसे लोगों की संख्‍या करोड़ों में है, जिन्‍हें अल्‍प पोषण पाकर ही संतोष करना पड़ता है। ऐसे सर्वाधिक 82 करोड़ लोग विकासशील देशों में रहते हैं। विश्‍व के करीब 15 करोड़ बच्‍चे और 35 करोड़ कुपोषित महिलाओं में 70 फीसदी सिर्फ 10 देशों में रहते हैं और उनमें से भी आधे से अधिक केवल दक्षिण एशिया में।

बढ़ती आर्थिक विकास दर पर गर्व करने वाले भारत में भी कुपोषित महिला व बच्‍चों की संख्‍या करोड़ों में है। मध्‍यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और बिहार जैसे राज्‍यों में कुपोषण के हालात कमोबेश अफ्रीका के इथोपिया, सोमालिया और चांड जैसे ही हैं।

मध्‍यप्रदेश में तमाम लोक लुभावन कल्‍याणकारी योजनाओं के सरकारी स्‍तर पर लागू होने के बावजूद नौ हजार से 11 हजार के बीच गर्भवती महिलाओं की मौत प्रसव के दौरान हो जाती है। गर्भावस्‍था या प्रसव के 42 दिन के भीतर यदि महिला की मृत्‍यु हो जाती है तो इसे मातृत्‍व मृत्‍यु दर माना जाता है। इन मौतों में 50 फीसदी प्रसव के 24 घंटों के भीतर, गर्भावस्‍था के दौरान 25 फीसदी और प्रसव के 2 से 7 दिन के भीतर 25 प्रतिशत महिलाओं की मौत होती है। 25 प्रतिशत महिलाओं की मौत अत्‍याधिक रक्‍तस्त्राव, 14 फीसदी संक्रमण, 13 फीसदी उच्‍च रक्‍तचाप से और 13 ही फीसदी गर्भपात के कारण महिलाएं काल के मुंह में समा जाती हैं। शहरी क्षेत्र में 28.2 और ग्रामीण इलाकों में 41.8 प्रतिशत महिलाएं मानक स्‍तर से नीचे जीवन यापन करने को अभिशप्‍त हैं।

महानगरों की झुग्‍गी बस्‍तियों में रहने वाली महिलाओं की स्‍थिति बेहद चिंताजनक है। इन बस्‍तियों में रहने को अभिशप्‍त कुल आबादी में से 75 प्रतिशत महिलाएं कमजोरी, एनीमिया, आंत्राशोथ, एमिबायोसिस की शिकार हैं। कुपोषण के चलते लकवाग्रस्‍त हो जाना इनकी मौत का प्रमुख कारण है। मुंबई की झुग्‍गी बस्‍तियों में रोजाना 700 बच्‍चे पैदा होते हैं जिनमें रोजाना 205 मर भी जाते हैं। कथित उदारीकरण की चमक ने गरीब के हालात इतने बद्‌तर बना दिए हैं कि स्‍थिति निचोड़ कर सुखाने की भी नहीं रह गई है।

पिछले डेढ़-दो दशक के भीतर वैश्‍विक आर्थिकी ने असमानता के हालात इतने भयावह बना दिए हैं कि आज दुनियां के 20 प्रतिशत लोगों के हाथों में विश्‍व का 86 प्रतिशत सकल राष्‍ट्रीय उत्‍पाद, विश्‍व का 82 प्रतिशत निर्यात और 68 प्रतिशत विदेशी प्रत्‍यक्ष निवेश है। फोर्ब्‍स पत्रिका के आवरण की सुर्खियां बनने वाले इन पूंजीपतियों में से भी ज्‍यादातर विकसित देशों के रहनुमा हैं। इसके ठीक उलट विकासशील देशों में रहने वाले 20 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो मात्रा एक डॉलर प्रतिदिन की आमदनी पर जीवन गुजारने को अभिशप्‍त हैं। भारत में तो 7 करोड़ 30 लाख लोग ऐसे हैं जो 9 रूपये प्रति रोज की आय पर जीवन यापन करने को विवश हैं। ऐसी ही बद्‌हाली की चलते विकासशील देशों के दो करोड़ शहरी बच्‍चे प्रतिवर्ष दूषित पेयजल के सेवन से काल के गाल में समा जाते हैं।

असमानता के ऐसे ही हालातों ने भारत में ऐसी स्‍थितियां उपजा दीं हैं कि खम्‍मम में एक लाचार महिला केा अस्‍पताल का बिल न चुका पाने के कारण अपने कलेजे के टुकड़े को बेचना पड़ा। हालांकि गरीबी और भुखमरी की लाचारी जो करा दे, सो कम है कि तर्ज पर छत्तीसगढ़,उडीसा, बुन्‍देलखण्‍ड सहित देश के अन्‍य राज्‍यों में बच्‍चों को बेचे जाने की घटनाएं सुर्खियों में आना आम हो गई हैं। इन प्रदेशों में गरीबी के अभिशाप के चलते मां-बाप जवान बेटियों को भी बेचने को अभिशप्‍त हैं।

वैश्‍विक आर्थिकी के चलते महिलाओं के आर्थिक रूप से मजबूत व स्‍वावलंबी होने का प्रतिशत बहुत छोटा है। लेकिन इस आर्थिकी के चलते जिस तेजी से असमानता की खाई चौड़ी हुई और बढ़ती मंहगाई के कारण आहारजन्‍य वस्‍तुएं आम जन की क्रय शक्‍ति से जिस तरह से बाहर हुईं, उसका सबसे ज्‍यादा खामियाजा गरीब महिला को भुगतना पड़ा है। अपने बच्‍चों की परवरिश की जिम्‍मेबारी के चलते भूख और कुपोषण की शिकार भी वही हुई। गरीब महिला को यदि भूख और कुपोषण से उबारना है तो जरूरी है कि उदारवादी नीतियों पर अंकुश लगे और ग्रामीण आबादी को प्रकृति और प्राकृतिक संपदा से जोड़े जाने के उपक्रम जारी हों? तभी नारी के समग्र उत्‍थान व सबलीकरण के सही अर्थ तलाशे जा सकते हैं। और तभी खम्‍मम जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति थमेगी।

बढ़ते तापमान से डूबता किसान

भूमण्‍डलीकरण, उदारीकरण, मुक्‍त बाजार ओर सेज का संकट झेल रहे किसान पर जलवायु परिवर्तन के कारण उपजने वाली त्रासदियां भी कालांतर में भारी पड़ने वाली हैं। जलवायु में बदलाव से खाद्यान्‍न संकट गहराता जा रहा है और इसकी सबसे ज्‍यादा मार किसान और मजदूर को झेलनी होगी। दुनिया में 85 करोड़ 40 लाख लोग भुखमरी से अभिशप्‍त हैं। इस आबादी का बड़ा हिस्‍सा विकासशील देशों का रहवासी है। अतः तय है कि खाद्याान्‍न संकट का कहर भारत की खेती ओर उससे जुड़े लोगों पर टूटने वाला है।

जलवायु परिवर्तन के चलते बढ़ते वैश्‍विक तापमान के कारण संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के खाद्य और कृषि संगठन ने चेतावनी दी है यदि जलवायु बदलाव से निपटने की कोशिशें तत्‍काल तेज नहीं की गईं तो खाद्य संकट गहराने में लंबा वक्‍त नहीं लगेगा। ग्रीनहाउस गैसों के उत्‍सर्जन में निरंतरता बनी रहने के कारण कहीं अतिवृष्‍टि तो कहीं सूखे की समस्‍या बढ़ती जा रही है। समुद्र का जलस्‍तर बढ़ते जाने से कई देशों के तटवर्ती प्रदेशों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे ही आसन्‍न खतरों के चलते बाढ़ हर मौसम में एक निरंतर एवं बड़ी समस्‍या हो जाएगी। वहीं हम उत्तर भारत में अनुभव कर रहे हैं कि सूखे के चलते क्षेत्रों में ¯सचाई के लिए पानी की बात तो छोड़िए, पेयजल के लिए भी एक बड़ी आबादी को कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। ऐसी जटिल विपरीत स्‍थितियों में एक ओर तो फसलें बोई नहीं जा सकेंगी वहीं दूसरी ओर खड़ी फसलें जमींदोज होंगी। स्‍वाभाविक है खाद्य सुरक्षा का संकट गहरा जाएगा। गरीब ओर वंचित कहलाने वाली भारत की तीन चौथाई आबादी ग्रामों और समुद्रतटीय इलाकों में ही रहती है इसके जीविकोपार्जन हेतु उपरोक्‍त साधन ही मुख्‍य माध्‍यम हैं।

भारत में ग्रामीण व कृषि विकास की नीतियों के आधार जमीनी हकीकत नहीं होने के कारण इस तबके की लगातार अनदेखी की जाती रही। नवउदारवाद के वैश्‍विक सरोकारों की चमक में वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने खेती, किसान और मजदूर हितों को यह कहकर और पशोपेश में डाल दिया है कि खेती संविधान के अनुसार राज्‍यों का मसला है इसलिए इसे केंद्र की जिम्‍मेदारियों में न जोड़ा जाए। इससे जाहिर होता है कि केंद्र सरकार खेती के बुनियादी हितों से मुंह मोड़ना चाहती है?

कमोबेश हमेशा ही किसान के हितों को हाशिये पर डाल एक पक्षीय विकास की अवधारणा कायम रही है। इसीलिए कृषि विकास की जो दर 1980-1990 के बीच 3.13 एवं 3.28 प्रतिशत थी वह पिछले 5 वर्षों (2002-07) के मध्‍य 1.75 से 2.7 फीसदी पर ठहर गई है। जबकि इस दौरान देश में करोड़पतियों ओर अरबपतियों की संख्‍या बढ़ी है। ये नतीजे खेती और उससे जुड़े लोगों के बुनियादी हितों को नजरअंदाज किए जाने के पुख्‍ता सबूत हैं। किसान व खेती की अनदेखी किए जाने की दिशा में नीतिगत फैसला लेते हुए राजग सरकार ने सन्‌ 2004 में खाद्यान्‍न क्षेत्र के विदेशी व्‍यापार को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया था और देशी खाद्यान्‍न के निर्यात के लिए अन्‍नसंग्रह के द्वार भी निजी कंपनियों के लिए खोल दिए थे और अब तो मौजूदा यूपीए सरकार ने अमेरिका से आटा आयात करने की छूट निजी क्षेत्र को दे दी है। इससे यह अंदाजा लगाना सहज है कि खाद्य व कृषि उत्‍पादकों के बाजार का दायरा राष्‍ट्रीय न रहकर अंतर्राष्‍ट्रीय हो गया है। लेकिन अमेरिका से आटा भारत आएगा तो क्‍या भारतीय किसानों के हित सुरक्षित रहेंगे? आज कुपोषण दूर करने व भोजन के अधिकार से वंचितों को ‘रोटी' मुहैया कराने के लिए केंद्र सरकार की योजनाएं जैसे भी हालातों में हैं अमल में तो हैं, कल क्‍या अमेरिकी हित पोषण करने वाली संस्‍था विश्‍व व्‍यापार संगठन के दबाव में इन योजनाओं के लिए जब अमेरिकी आटा प्रदाय किए जाने का दबाव बढ़ेगा तो क्‍या भारत सरकार वंचितों के हित में फैसला लेने की इच्‍छाशक्‍ति रखती है? जारी है जो किसान अपने उत्‍पादकों को बेचते वक्‍त देशी मंडियों में लुटता-पीटता रहा है उसे अब विदेशी बाजार के हमले की मार भी झेलनी होगी। वैसे भी उदारीकृत भूमंडलीकरण की मुक्‍त बाजार व्‍यवस्‍था सही मायनों में एकाधिकारवाद का हित पोषण करेगी।

किसान विरोधी ऐसी नीतियों से यह निष्‍कर्ष निकलता है कि इस कृषि प्रधान देश में साढ़े सात लाख ग्रामों में रहने वाले सत्‍तर करोड़ किसान की ¯चता किसी को भी नहीं है। यूएनडीपी के ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि सन्‌ 1996 के बाद से अब तक भूखे लोगों की संख्‍या में 1.8 करोड़ की वृद्धि हुई है। सन्‌ 1951 में भारत में किसान 19 प्रतिशत कृषि भूमि के मालिक थे वहीं 2001 की जनगणना में घटकर 13 प्रतिशत रह गए हैं। इसके विपरीत सन्‌ 1951 में जिन खेतिहर मजूदरों का प्रतिशत 7.5 था वह 2001 में बढ़कर 10.5 प्रतिशत हो गया। यही कारण है कि खेती से जुड़े किसान-मजदूर एक ओर तो बड़ी संख्‍या में जल, जंगल और जमीन से बेदखल होकर आत्‍महत्‍या कर रहे हैं। वहीं भूख से मरने वाले भी लाचार हैं।

किसान व मजदूर के ये हालात हरित क्रांति और कृषि प्रगति की उपलब्‍ध्‍यिों के सरकारी दावों की पोल खोलते हैं। आधुनिक यांत्रिक और वैज्ञानिक विकास के बहाने खेती की ऐसी विध्‍वंसकारी प्रणालियां भी विकसित हुईं जिनसे एक ओर तो भूमिगत जल का इतना दोहन किया गया कि जल संकट ही पैदा हो गया दूसरी ओर आनुवंशिक खेती के बहाने भूमि की उर्वराशक्‍ति ही जाती रही। तीसरे किसानों को कृषि उपकरणों के लिए कर्ज को सरल बनाकर उसे ऐसा कर्जदार बना दिया गया जिससे वह जीवनपर्यंत उबर ही न सके। सहकारी बैंक जिन्‍हें खेती और किसान का आसान वित्तपोषक माना जाता है की ब्‍याज पद्धति इतनी जटिल है कि एक किश्‍त की चूक हो जाने पर ही ब्‍याज मूलधन में शामिल हो जाता है। लिहाजा ऋण किसान को 12 प्रतिशत की दर से चुकाना होता है। इसलिए बैंक ऋण भी किसानों की बर्बादी और आत्‍महत्‍या का कारण बने। ऐसी जटिल, विपरीत और अपमानजनक परिस्‍थितियों से जूझ रहे किसान और मजदूर पर जलवायु के बदलाव ने संकटों को और गहरा दिया है। अब यदि वैश्‍विक तापमान के बढ़ने की प्रबल संभावनाओं के मध्‍य यदि खाद्य संकट बढ़ता है तो इसके पहले शिकार भारत समेत विकासशील देशों के किसान, खेतिहर मजदूर और वंचित ही होंगे।

आर्थिक समृद्धि की भारतीय परंपरा

वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने अपने बजट उद्‌बोधन में कहा कि ‘भारत ओर चीन में एक समय वस्‍तुओं के वैश्‍विक सकल उत्‍पादन का आधा उत्‍पादन हुआ करता था, हम चाहते हैं कि हमारी पुरानी स्‍थिति बहाल हो।' जिस कालखंड में हम विविध फसलों, मसालों, वस्त्रों, चिकित्‍सा और तकनीक के उत्‍पादक व निर्यातक देश थे तब हमारी बौद्धिक कुशाग्रता और श्रम शक्‍ति पंरपरागत रूप से ज्ञानाश्रित थी। ठेठ देशज ¯चतन हमारी अर्थव्‍यवस्‍था का ठोस आधार था। वर्तमान बदले परिवेश में जिस तकनीकी ज्ञान पर हम इतरा रहे हैं उसकी सारी क्षमताएं आयातित प्रौद्योगिक तकनीक से जुड़ी प्रबंधन व्‍यवस्‍था में निहित हैं। जब तक हम उत्‍पादक के मूल स्रोत, खेती और उसके साधक किसान की सुध नहीं लेंगे तब तक आख्रथक समृद्धि की पुनरावर्ती संभव नहीं है। गांधी भी भारत की परंपरागत अर्थव्‍यवथा और स्‍थानीयता के धरातल पर रोजगारमूलक शिक्षा पद्धति के प्रबल पक्षधर थे। लेकिन हमारी समृद्धि प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा और गांधी की सोच दोनों को ही कामोबेश नकार दिया गया है। आज हमें सर्वप्रथम आख्रथक समृद्धि की दिशा तय करनी होगी कि क्‍या हम गांधी की सोच से उपजने वाली देशज अर्थव्‍यवस्‍था चाहते हैं अथवा मुक्‍त बाजार और उपभोग को बढ़ावा देने वाली अमेरिकी पूंजीवादी अर्थव्‍यवस्‍था?

प्राचीन भारतीय समृद्धि और समरसता के मूल में प्राकृतिक संपदा, कृषि और गोवंश थे। प्राकृतिक संपदा के रूप में हमारे पास नदियों के अक्षय और पवित्रा जल स्रोत थे, हिमालय ओर उष्‍ण कटिबंधीय वनों में प्राणी और वनस्‍पति की विशाल जैव विविधता वाले अक्षुण्‍ण भंडार और ऋतुओं के अनुकूल पोषक तत्‍व पैदा करने वाली जलवायु थी। मसलन मामूली सी कोशिश जीविका उपार्जन के लायक पौष्‍टिक खाद्य सामग्री उपलब्‍ध करा देती थी। इसीलिए नदियों के किनारे और वनप्रांतरों में भारतीय संस्‍कृति और सभ्‍यता विकसित हुई। आहार की उपलब्‍धता सुलभ हुई तो ¯चतन और सृजन के पुरोधा सृष्‍टि के रहस्‍यों के अनुसंधान में जुट गए। आर्थिक संसाधनों को समृद्ध बनाने के लिए ऋषि मनीषियों ने नए-नए प्रयोग किए। कृषि भी विविध उत्‍पादनों से जुड़ी। नतीजन अनाज, दलहन, चावल आरैर मसालों की हजारों किस्‍में प्राकृतिक रूपों में फली-फूलीं व पल्‍लवित हुईं। 167 फसलों, 350 वन प्रजातियों की पहचान की गई। 89 हजार जीव-जंतुओं और 47 हजार प्रकार की वनस्‍पतियों की खोज की गई। प्रकृति और जैव विविधता के उत्‍पादन तंत्र की विकास संरचना और उसकी प्राणी जगत के लिए उपयोगिता की वैज्ञानिक समझ हासिल की। इनकी महत्ता दीर्घकालिक बनी रहे इसलिए धर्म से अलौकिक तादात्‍म्‍य स्‍थापित कर इनके उपभोग ओर दोहन पर व्‍यावहारिक अंकुश लगाया गया। हमारे दूर दृष्‍टा मनीषियों ने हजारों साल पहले ही लंबी ज्ञान-साधना व अनुभव से जान लिया था कि प्राकृतिक संसाधनों का कोई विकल्‍प नहीं है। वैज्ञानिक तकनीक से हम इनका रूपांतरण अथवा कायांतरण तो कर सकते हैं लेकिन तकनीक आधारित किसी भी ज्ञान के बूते इन्‍हें प्राकृतिक स्‍वरूप में पुनर्जीवित नहीं कर सकते? फलस्‍वरूप हमारी कृषि और गोवंश आधारित अर्थव्‍यवस्‍था उत्तोरोत्तर विकसीत व विस्‍तारित होती रही और आख्रथक रूप से जनता व देश स्‍वावलंबी भी बने रहे। इसीलिए हम सोने की चिड़िया कहलाए।

कथा-सरित्‍सागर और जातक कथाओं में समुद्रपार जाकर माल का क्रय-विक्रय करने वाले युवा-उत्‍साहियों की कथाएं भरी पड़ी हैं। ईसवी संवत की दूसरी सदी से लेकर ग्‍यारहवीं-बारहवीं सदी तक भारतीयों के लिए हालात काफी अनुकूल थे। लेकिन कालांतर में ग्‍यारहवीं सदी में मंगोल और अरबों के व बारहवीं सदी में तुर्कों के आक्रमण ने भारत में उनकी सत्ता स्‍थापित कर दी। भारत के राजनीतिक क्षरण के कारण व्‍यापार का आख्रथक आधार विघटित होने लगा। भारत की समृद्धि लूट तंत्र का हिस्‍सा बनकर रह गई।

अंग्रेजों ने भी व्‍यापार के बहाने भारत का रुख किया और आख्रथक दोहन में लग गए। जनपदों में बंटे और भोग विलास में डूबे सामंत कोई प्रतिरोध करने की बजाय उनकी सत्ता-कायमी में सहयोगी बन गए। अंग्रेजों ने कुटिल चतुराई से भारत की प्राकृतिक संपदा व आख्रथक समृद्धि दोनों का ही दोहन योजनाबद्ध तरीके से किया। हालांकि अंग्रेजों ने यहां थोड़ा बहुत औद्योगिक विकास भी किया। अलबत्ता इस विकास के पीछे उनकी मंशा युद्ध संबंधी आवश्‍यकताओं की आपूख्रत ही थी।

अंग्रेजों ने भारत की ज्ञान परंपरा पर अंग्र्रेजी शिक्षा पद्धति लागू करके हमला बोला। वहीं सांस्‍कृतिक धरोहर आमजन के लिए महत्‍वहीन बनी रहे इस नजरिए से संपूर्ण प्राचीन भारतीय संस्‍कृत साहित्‍य को आध्‍यात्‍मिक साहित्‍य की संज्ञा देकर ज्ञान-विज्ञान के सूत्रा को पूजा की वस्‍तु बना देने की रणनीति चला दी। इन धूर्त उपक्रमों को हमने पूरी कृतज्ञता से स्‍वीकार भी लिया। जबकि हमारे उपनिषद ब्रह्माण्‍ड के रहस्‍यों की जिज्ञासाएं हैं। रामायण और महाभारत ऐतिहासिक कालखंडों की सामाजिक, भौगोलिक, राजनीतिक, आख्रथक य युद्ध कौशल के वस्‍तुपरकचित्राण हैं। आयुर्वेद व पातंजलि योग औषधीय चिकित्‍सा शास्त्र हैं। 18 पुराण ऐतिहासिक क्रम में शासकों के समयकाल की गाथाएं हैं। कौटिल्‍य का अर्थशास्त्र ओर वात्‍स्‍यायन का कामसूत्रा अर्थ ओर काम विषयक अद्धितीय व सर्वथा मौलिक ग्रंथ हैं। चार्वाक के दर्शन ने हमें प्रत्‍यक्षवाद दिया जो समस्‍त ईश्‍वरीय अवधारणाओं को नकारता है। चार्वाक ने ही कहा था कि सुख के लिए कर्ज लेकर भी घी पीना पड़े तो पीना चाहिए। प्राचीन भारतीय साहित्‍य ज्ञान और संस्‍कार के ऐसे उपाय थे जिन्‍हें आचरण की थाती बनाकर बहुसंख्‍यक लोगों ने प्राकृतिक संपदा के उपभोग ओर माया के मोह से सदियों तक दूरी बनाए रखकर प्रकृति की देनों को प्राणी जगत के लिए उपयोगी बनाए रखा। बुद्ध महावीर ओर गांधी के दर्शन में यही असंचयी भाव है।

हैरानी की बात यह है कि स्‍वतंत्रता के बाद तमाम प्रकार की शैक्षिक उपलब्‍धियां हासिल कर लेने के बावजूद हम इस साहित्‍य को न तो धाख्रमक मान्‍यता से विलग कर पाए और न ही इसका पुनर्लेखन कर इसे जनोपयोगी बना पाए। इसकी तह में शायद मैकाले की दी हुई वह जड़ता है जो अंग्रेजी ने घुट्‌टी में हमें पिलाई है। यही कारण है कि आजादी के बाद हमारा नैतिक और चारित्रिक पतन तेजी से होता चला आ रहा है। सत्ता पर काबिज बने रहने की स्‍वार्थ लिप्‍सा ने हमें विराट सांस्‍कृतिक परम्‍परा से काटकर छोटे और क्षेत्रीय स्‍वायत्त राज्‍यों की इकाईयों में बांटने हेतु विषवमन जैसी भाषा का सहारा लिया हुआ है। नतीजतन हममें अराजक व हिंसक प्रवृत्तियां घर कर रही हैं। क्षेत्रीयता से जुड़े ऐसे सांस्‍कृतिक दुराग्रह संघीय राज्‍यों की पृष्‍ठभूमि रचने में लगे हैं।

खंडित स्‍वतंत्रता प्राप्‍ति के बावजूद भारत उद्योग, कुटीर उद्योग, खनिज ओर अन्‍य प्राकृतिक संपदा की प्रचुर उपलब्‍धता के चलते अन्‍य एशियाई देशों की तुलना में अपेक्षाकृत एक धनी देश था। रेल और यातायात के अन्‍य साधन भी सुलभ थे। इसके बावजूद पंडित नेहरु ने परम्‍परागत भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के बजाए मिश्रित आख्रथक मॉडल अपनाया। आजादी के तत्‍काल बाद गांधी जी की हत्‍या हो जाने के कारण नेहरु पर गांधी के आख्रथक ¯चतन का नैतिक दबाव भी नहीं रह गया था।

यदि हम वाकई देश की उत्‍पादन शक्‍ति बढ़ाना चाहते हैं तो हमें खेती और किसान की सुध लेनी होगी। खेती को घाटे के सौदे से उबारना होगा। 40 प्रतिशत किसान जो जीविकोपार्जन के वैकल्‍पिक साधन तलाशने की उम्‍मीद में कृषि कार्य छोड़ने को तत्‍पर हैं उन्‍हें कृषि आधारित छोटे उद्योग, ग्रामों व कस्‍बों में लगाकर उनसे जोड़ना होगा। भारत में फिलहाल दो प्रतिशत कृषि उत्‍पादों को ही प्रसंस्‍कृत किया जाता है, इसमें वृद्धि की बहुत संभावना है। यदि ऐसा किया जाता है तो खेतों में गन्‍ना जलाने और टमाटरों को नालों में बहा देने के जो हालात निख्रमत होते हैं उनसे किसानों को छुटकारा मिलेगा?

पूंजीवादी लाभ की इस आख्रथकी ने उपभोग की जिस जीवन शैली को जन्‍म दिया, उससे हमारे प्राणों को जीवन शक्‍ति देने वाले प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण तो हुआ ही हवा, पानी और मिट्‌टी को भी दूषित कर प्राणी जगत के लिए प्रकृतिजनय सुरक्षा कवचों को खतरे में डाल दिया। ऐसे बद्‌तर हालातों के चलते ही ग्‍लोबल वा²मग और जलवायु परिवर्तन की आशंकाएं प्रकट हुईं। कृषि का रकबा घटा। जिस कृषि पर आधी से ज्‍यादा आबादी आश्रित है उसकी वृद्धि दर गिरकर 2.6 फीसदी रह गई। मसलन आख्रथक विषमता की खाई और चौड़ी हो गई। ऐसे में मात्रा कर्ज माफी से किसान की हालत सुधरने वाली नहीं है। भारत की विशाल मानव संपदा पूंजीवादी कुचक्रों और केवल प्रौद्योगिकी प्रबंधों से खुशहाल नहीं हो सकती। उत्‍पादन के कृषि जैसे आंतरिक स्त्रोंतों की मजबूती और गांधीवादी आख्रथकी के अमलीकरण में ही आख्रथक समृद्धि के पुरातन निहितार्थ हैं। बहुसंख्‍यक समाज की शोषण से मुक्‍ति और सामाजिक समरसता ही भारत को समृद्ध व सुखी बना सकती है।

भूख से भयभीत देश

देश को भूख से पराजित होने का भय सता रहा है। इसी कारण हाल ही में राष्‍ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने दूसरी हरित क्रांति लाने का आह्नान करते हुए भूख के भय को रेखांकित किया। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खाद्य भंडारों की कमी जताते हुए महंगाई के संकट को काबू से बाहर बताया। मुख्‍यमंत्रियों के सम्‍मेलन में उन्‍होंने दालों पर राष्‍ट्रीय मिशन गठित किए जाने का ऐलान भी किया। क्‍योंकि पिछले छह साल से दालों का उत्‍पादन स्‍थिर है और इनकी दरों में बेतहाशा वृद्धि दर्ज की गई है। देश के कृषि वैज्ञानिक स्‍वामीनाथन ने भी संकेत किया है कि जलवायु परिवर्तन के चलते धरती का तापमान यदि एक डिग्री सेल्‍सियस ही बढ़ जाता है तो गेहूं का उत्‍पादन सत्तर लाख टन घट सकता है। ये हिदायतें ऐसी भविष्‍यवाणियां हैं जो स्‍पष्‍ट करती हैं कि यदि भूख की अनदेखी की गई तो देश को भयाभय खाद्य सुरक्षा के संकट से जूझना पड़ सकता है।

भूख और खाद्यान्‍न का भय इस समय भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में कायम है। संयुक्‍त राष्‍ट्र विश्‍व खाद्य कार्यक्रम के आकलन ने स्‍पष्‍ट किया है कि दुनिया में भूख से पीड़ित लोगों की संख्‍या बढ़कर एक अरब से ऊपर पहुंच गई है। ये हालात उस अर्थव्‍यवस्‍था की देन हैं जिसके चलते हमने असंतुलित विकास के सिद्धांत को ही मौजूदा जीवन-शैली की सार्थकता मान लिया। इस कथित आर्थिक और तकनीकी विकास की होड़ में हमने ऐसे मानवीय नैतिक और सांस्‍कृतिक सरोकारों से भी पल्‍ला झाड़ लिया है, जो हमें संवेदनशील बनाते हैं। नतीजतन जमाखोरी और सट्‌टा (वायदा) बाजार की दुष्‍प्रवृत्तियों ने महंगाई को आसमान पर पहुंचा दिया है। नतीजतन जो गरीब बढ़ती महंगाई के पूर्व गरीबी रेखा से नीचे के दायरे में नहीं थे वे भी गरीबी के दायरे में आ गये। गोया, गरीब की पहचान का संकट नए सिरे से खड़ा हो गया है।

खाद्य सुरक्षा का मकसद भूख और कुपोषण को दूर करता है। इसलिए जरूरी हो जाता है कि इस कार्यक्रम का लाभ उसी तबके को मिले जो वास्‍तव में गरीब व लाचार है। संयुक्‍त राष्‍ट्र द्वारा जारी विश्‍व सामाजिक स्‍थिति रिपोर्ट 2010 में विकास की वर्तमान अवधारणा को झुठलाते हुए खुलासा किया है कि भारतीय समाज में जाति आधारित व्‍यवस्‍था के चलते समाज के सबसे कमजोर तबकों की सामाजिक, आर्थिक व शैक्षिक स्‍थिति समुदाय से बहिष्‍कृत मनुष्‍यों की श्रेणी में है। हालात इतने बद्‌तर हैं कि भोजन की कमी के चलते दलित व वंचित परिवारों में जन्‍में 54 प्रतिशत नवजात शिशु औसत वजन से कम होते हैं। इनमें से भी प्रति हजार में तिरासी बच्‍चे पैदा होने के साथ ही काल के गाल में समा जाते हैं। इसके बाद प्रति एक हजार में से 119 शिशु पांच साल के भीतर चल बसते हैं। जाहिर है इन तबकों के लोग भोजन के अधिकार की न्‍यूनतम जरूरत और जिन्‍दा रहने की जरूरी चिकित्‍सा सुविधा से बाहर हैं।

गरीब की मुकम्‍मल पहचान के साथ यह भी जरूरी है कि उसके पास सस्‍ता अनाज खरीदने लायक पैसे भी हों? अन्‍यथा केंद्र सरकार जो ‘खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम विधेयक' ला रही है उसकी सार्थकता गरीब के बजाय दबंगों व धनियों तक सीमित रह जाएगी। दिल्‍ली के आर्थिक शोध संस्‍थान ‘नेशनल काउंसिल ऑफ एप्‍लाइड इकलोमिक रिसर्च' की एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार देशभर में दो करोड़ से ज्‍यादा बीपीएल कार्ड जारी किए जा चुके हैं। इसके बावजूद डेढ़ करोड़ परिवार ऐसे हैं जो कार्ड पा लेने के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इसके साथ ही अंत्‍योदय अन्‍न योजना और ए.ए.वाई. कार्डधारी भी हैं जो सस्‍ता अनाज पाने के हकदार हैं।

विषमता की बुनियाद पर आरूढ़ आर्थिक विकास देश की बढ़ी आबादी को लगातार खाद्य असुरक्षा के घेरे में धकेल रहा है। हाल ही में जर्मन और आयरिश की संस्‍थाओं ने दो अध्‍ययन किए हैं, जिनमें उजागर हुआ है कि 84 देशों के ‘वैश्‍विक भूख सूचकांक' में भारत 65वीं पायदान पर है। इस हकीकत से रूबरू होने के बावजूद देश में ऐसी नीतियां अमल में लाई जा रही हैं जिससे कंपनियों के कारोबार फलें-फूलें।

देश की 66 से 70 प्रतिशत आबादी की निर्भरता कृषि आधारित है। लेकिन देश की सकल आय में इस आबादी का हिस्‍सा केवल 17 फीसदी है। इसके विपरीत निजी कंपनियों की भागीदारी एक प्रतिशत से भी कम होने के बावजूद वे देश की सकल आय में 33 फीसदी का दावा करती हैं। करों और खनिजों से होने वाली आय पर 55 प्रतिशत दावा सरकारी अमले का है। बावजूद इसके कंपनियों को करों में राहत व कर वसूली में ढिलाई दी जा रही है। 2008-09 में केंद्र सरकार द्वारा कंपनियों को 4 लाख 18 हजार 95 करोड़ की राजस्‍व करों में छूट दी गई।

इसके उलट एक ओर तो केंद्र सरकार राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को पूरे देश में लागू करने का दावा कर सस्‍ती व झूठी लोकप्रियता बटोर रही है, वहीं कंपनियों को दी गई छूट की तुलना में नरेगा को मात्रा 39 हजार करोड़ रुपये और सस्‍ते राशन पर मात्रा 55 हजार करोड़ रुपये का ही प्रावधान रखा गया है। जबकि कंपनियों को दी गई छूट जन-कल्‍याण योजनाओं के मद में किए जाने वाले खर्च की तुलना में करीब चार गुना अधिक है।

देश में 1984 तक खाद्यान्‍न उत्‍पादन वृद्धि की दर जनसंख्‍या-वृद्धि दर से अधिक रही। इसलिए देश की समूची आबादी को अनाज की आपूर्ति होती रही। लेकिन इसके बाद औद्योगीकरण और भूमंडलीकरण की आई बाढ़ खेती के लिए उपयोगी जमीन और सिंचाई के पानी को कब्‍जाती चली गई। नतीजतन वर्तमान में कृषि भूमि का रकबा घटकर सिर्फ 12 करोड़ हेक्‍टेयर रह गया है। कालांतर में लगातार आती जा रही पानी की कमी ने भी सिंचित कृषि भूमि का रकबा घटा दिया है। वैसे भी हमारी 60 फीसदी कृषि भूमि हमेशा मानसून पर निर्भर रही है। इन हालातों के दुष्‍परिणाम ये निकले कि कृषि उत्‍पादन में कुछ समय तो स्‍थिरता रही लेकिन अब गिरावट दर्ज की जा रही है। जो खाद्यान्‍न उपलब्‍धता 1991 में प्रति व्‍यक्‍ति 510 ग्राम थी वह घटकर 2007-08 में 440 ग्राम रह गई।

अब तक हमारे देश में गरीबी अथवा अल्‍प पोषित लोगों का आकलन आहार में मौजूद पोषक तत्त्वों के आधार पर किया जाता था। मसलन शहरी व्‍यक्‍ति की आय इतनी हो कि वह 2100 कैलोरी और ग्रामीण व्‍यक्‍ति 2400 कैलोरी ऊर्जा देने वाले खाद्यान्‍न खरीद सके। भारतीय चिकित्‍सा अनुसंधान परिषद की सलाह है कि प्रत्‍येक स्‍वस्‍थ व्‍यक्‍ति के लिए 2800 कैलोरी ऊर्जा की जरूरत रहती है। इसे आधार बिन्‍दु माना जाए तो हरेक परिवार के लिए 50 से 65 किलोग्राम अनाज, 6 से 8 किलोग्राम दाल और 3 से 5 किलोग्राम तेल मिलना चाहिए। खाद्यान्‍न की यह उपलब्‍धता केवल उदरपूर्ति से जुड़ी है जबकि मनुष्‍य की बुनियादी जरूरतें उदरपूर्ति के इतर भी हैं।

लिहाजा गरीबी की इस प्रचलित अवधारणा को नकारा गया और गरीबी नापने की नई पद्धति विकसित हुई। जिसमें पोषक खाद्यान्‍न के साथ ईंधन, बिजली, कपड़े और जूते-चप्‍पल शामिल किए गए। सुरेश तेंदुलकर द्वारा किए गए गरीबी के आकलन का आधार यही है। इस रिपोर्ट ने तय किया है कि देश में

41 करोड़ लोग ऐसे हैं जो जीने के अधिकार से वंचित रहते हुए भुखमरी के दायरे में जीने को अभिशप्‍त हैं। ये आंकड़े इस हकीकत की बानगी हैं कि भारत में

40 फीसदी से भी ज्‍यादा लोग प्रतिदिन भूखे सोते हैं।

तेंदुलकर समिति ने तय किया है कि 41.8 प्रतिशत आबादी, मसलन 45 करोड़ लोग प्रतिमाह प्रतिव्‍यक्‍ति 447 रुपये में बमुश्‍किल जीवन-यापन कर रहे हैं। गोया, तेरह-चौदह रुपये प्रतिदिन की आमदनी से आदमी क्‍या खाए और क्‍या निचोड़े? हमारा गरीबी नापने का मानक पैमाना हैरानी से आंखें फाड़ देने वाला है। 14 रुपये से ज्‍यादा और 25 रुपये से कम आय वाले ग्रामीण व्‍यक्‍ति को गरीबी रेखा के दायरे में माना जाता है। शहर में 580 रुपये प्रतिमाह कमाने वाला व्‍यक्‍ति गरीबी के दायरे में आता है। विश्‍व में प्रचलित गरीबी की परिभाषा के दायरे में भारत का आकलन करें तो यह कड़वी सच्‍चाई है कि भारत की कुल आबादी दुनिया की कुल आबादी की 17 प्रतिशत है, वहीं दुनिया के 36 प्रतिशत गरीब भारत में रहते हैं। वैसे हमारे संविधान के अनुच्‍छेद 21 में जीने के हक का अधिकार हरेक नागरिक को दिया गया है। लेकिन इसे स्‍पष्‍ट तौर से परिभाषित नहीं किया गया। इस कारण भूख से हुई वास्‍तविक मौत को भी ‘भूख' से हुई मौत साबित करना मुश्‍किल होता है। ऐसी मौतों को अकसर कुपोषण से हुई मौत मान लिया जाता है। वैसे कुपोषण भी पेट भर आहार न मिलने से उपजी बीमारी का लक्षण है।

हम अमेरिका की जिन बाजारवादी आर्थिक नीतियों का अनुकरण करने को 1990 से विवश हुए, उस अमेरिका की 20 प्रतिशत आबादी आज आर्थिक मन्‍दी और खाद्यान्‍न की कीमतों में उछाल के चलते दो वक्‍त की रोटी जुटाने में तमाम मुश्‍किलों से रूबरू हो रही है। अमेरिका की ही ‘फूड रिसर्च एंड एक्‍शन सेंटर' ने एक सर्वे के बाद खुलासा किया है कि हर पांच में से एक अमेरिकी भूख से संघर्ष की स्‍थिति में है। ये हालात देश के हर इलाके में हैं। इन कड़वी सच्‍चाइयों के उजागर होने के बावजूद हम अमेरिकी नीतियों का जुआ अपने कन्‍धों से उतार नहीं पा रहे। विश्‍व कवि रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने ठीक ही कहा है कि उच्‍च कोटि के मानव-समाजों का निर्माण मुनाफाखोरों द्वारा कभी नहीं होता है। वे करोड़पति जिन्‍होंने बड़ी मात्रा में माल-असबाब का उत्‍पादन किया है। उन्‍होंने अब तक एक भी मानव सभ्‍यता का निर्माण नहीं किया। इसलिए अब समय आ गया है कि भूख के भय से मुक्‍ति का उपाय आर्थिक विकास की बजाय देशज कृषि व्‍यवस्‍था में तलाशा जाए?

जल समाधि लेता भारतीय उपमहाद्वीप

आमतौर से अपने स्‍वभाव व चरित्रा के अनुसार समुद्र मनुष्‍य के लिए जानलेवा खतरा तूफान के समय ही बनता है। कभी-कभी समुद्र की ज्‍वारभाटा जैसी नैसख्रगक प्रवृत्ति भी जानलेवा साबित हो जाती है। लेकिन ज्‍वार-भाटा समुद्र के तटीय क्षेत्रों में एक निश्‍चत समय में आता है इसलिए मनुष्‍य सावधानी बरतता है और ज्‍वार-भाटा की लहरों से बचा रहता है। परंतु अब विश्‍व बैंक के एक अध्‍ययन से पता चलता है कि वायुमंडलीय ताप के कारण समुद्र के जल स्‍तर में एक मीटर की बढ़ोत्तरी से विकासशील देशों के तटीय एवं 84 नदी डेल्‍टा इलाकों में रहने वाले करीब छह करोड़ लोगों को अपने घरों से बेघर होना पड़ सकता है। इस बढ़े जल स्‍तर का प्रभाव सबसे अधिक पश्‍चिम एशिया, उत्तरी अफ्रीका और पूर्वी एशिया के लोगों पर पड़ेगा। जलवायु परिवर्तन पर गठित संयुक्‍त राष्‍ट्र अंतरराष्‍ट्रीय पैनल ने बढ़ते तापमान के लिए मानव क्रियाकलापों को दोषी पाया है। पैनल द्वारा जताए अनुमान के मुताबिक इस शताब्‍दी के अंत तक समुद्र के जल स्‍तर में 18 से 59 सेंटीमीटर की बढ़ोत्तरी होगी। अगर बर्फ की विशाल चादरें मौजूदा रफ्‍तार से पिघलती रहीं तो तुलनात्‍मक रूप से जल स्‍तर में इससे भी कहीं ज्‍यादा बढ़ोत्तरी हो सकती है।

बढ़ते तापमान ने अब तीव्रता से असर दिखाना शुरू कर दिया है। जिसके चलते समुद्र ने भारत के दो द्वीपों को लील लिया है। हिमालय के प्रमुख हिमनद 21 प्रतिशत से भी ज्‍यादा सिकुड़ गये हैं। यहां तक कि अब पक्षियों ने भी भू-मंडल में बढ़ते तापमान के खतरों को भांप कर संकेत देना शुरू कर दिये हैं। इधर इस साल मौसम में आए बदलाव ने भी बढ़ते तापमान से आसन्‍न संकट के संकेत दिए हैं। यदि मनुष्‍य अभी भी पर्यायवरण के प्रति जागरूक नहीं हुआ तो प्रलयंकारी खतरों से समूची मानव जाति को जूझना ही पड़ेगा।

भारत में ही नहीं पूरे भू-मंडल में तापमान तेजी से बढ़ रहा है। जिसके दुष्‍परिणाम सामने आने लगे हैं। भारत के सुंदरवन डेल्‍टा के करीब सौ द्वीपों में से दो द्वीपों को समुद्र ने हाल ही में निगल लिया है और करीब एक दर्जन पर डूबने का खतरा मंडरा रहा है। इन द्वीपों पर दस हजार के करीब आदिवासियों की आबादी है। यदि ये द्वीप डूबते हैं तो इस आबादी को भी बचाना असंभव हो जायेगा। जादवपुर विश्‍वविद्यालय में स्‍कूल ऑफ ओशियनोग्राफिक स्‍टडीज के निदेशक सुगत हाजरा ने स्‍पष्‍ट किया है कि लौह छाड़ा समेत दो द्वीप समुद्र में डूब चुके हैं। ये द्वीप अब उपग्रह द्वारा लिए गए चित्रों में भी नजर नहीं आ रहे हैं। हाजरा इसका कारण दुनिया में बढ़ता तापमान बताते हैं। दूसरी तरफ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के स्‍पेस एप्‍लीकेशन सेन्‍टर (एमएसी) के हिमनद विशेषज्ञ अनिल बी. कुलकर्णी और उनकी टीम ने हिमालय के हिमनदों का ताजा सर्वेक्षण करने के बाद खुलासा किया है कि हिमालय के हिमनद 21 प्रतिशत से कहीं ज्‍यादा सिकुड़ गए हैं। इस टीम ने 466 से भी ज्‍यादा हिमनदों का सर्वेक्षण करने के बाद उक्‍त नतीजे निकाले हैं।

जलवायु पर विनाशकारी असर डालने वाली यह ग्‍लोबल वाख्रमग आने वाले समय में भारत के लिए खाद्यान्‍न संकट भी उत्‍पन्‍न कर सकती है। तापमान वृद्धि से समुद्र तल तो ऊंचा उठेगा ही, तूफान की प्रहारक क्षमता और गति भी 20 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी। इस तरह के तूफान दक्षिण भारतीय तटों के लिए विनाशकारी साबित होंगे। ग्‍लोबल वा²मग का साफ असर भारत के उत्तर पश्‍चिम क्षेत्र में देखने को मिलने लगा है। पिछले कुछ सालों में मानसून इस क्षेत्र में काफी नकारात्‍मक संकेत दिखा रहा है। केवल भारत ही नहीं इस तरह के संकेत नेपाल, पाकिस्‍तान, श्रीलंका व बांग्‍लादेश में भी देखने को मिल रहे हैं।

देश के पश्‍चिमी तट जिनमें उत्तरी आंध्रप्रदेश का कुछ हिस्‍सा आता है तथा उत्तर-पश्‍चिमी मानसून की बारिश बढ़ रही है और पूर्वी-पश्‍चिमी मानसून की बारिश रही। और पूर्वी मध्‍यप्रदेश, उड़ीसा व उत्तरी पूर्वी भारत में यह कम होते जा रही है। पूरे देश में मानसून की वर्षा का संतुलन बिगड़ सकता है। ग्‍लोबल वा²मग के भारत पर असर की एक खास बात यह रहेगी कि सख्रदयों के मौसम में तापमान ज्‍यादा बढ़ेगा। लिहाजा सख्रदयां उतनी कड़क नहीं होंगी जितनी अमुमन होती हैं। मौसम छोटे होते जाएंगे जिसका सीधा असर वनस्‍पतियों पर पड़ेगा। फलस्‍वरूप ज्‍यादा समय में होने वाली सब्‍जियों को तो पकने का भी पूरा समय नहीं मिल सकेगा।

विभिन्‍न अध्‍ययनों ने खुलासा किया है कि सन्‌ 2050 तक भारत का धरातलीय तापमान 3 डिग्री सेल्‍सियस से ज्‍यादा बढ़ चुका होगा। सख्रदयों के दौरान यदि यह उत्तरी व मध्‍य भारत में 3 डिग्री सेल्‍सियस तक बढ़ेगा तो दक्षिण भारत में अन्‍य पड़ोसी देशों को भी लील सकता है।

डॉ. अनिल बी. कुलकर्णी और उनकी टीम द्वारा हिमाचल प्रदेश में आने वाले जिन 466 हिमनदों के उपग्रह चित्रों और जमीनी पड़ताल के जरिये जो नतीजे सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। सन्‌ 1962 के बाद से एक वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल वाले 162 हिमनदों का आकार 38 फीसदी कम हो गया है। बड़े हिमनद तो और तेजी से खण्‍डित हो रहे हैं। वे लगभग 12 प्रतिशत छोटे हो गए हैं। सर्वेक्षणों से पता चला है कि हिमाचल प्रदेश के इलाकों में पिछले दशकों में हिमनदों का कुल क्षेत्रफल 2077 वर्ग किलोमीटर से घटकर 1628 वर्ग किलोमीटर रह गया है। मसलन बीते चार दशकों में हिमनदों का आकार 21 फीसदी घट गया है। अध्‍ययनों से पता चलता है कि हिमालय के ज्‍यादातर हिमनद अगले चार दशकों में किसी दुर्लभ प्राणी की तरह लुप्‍त हो जाएंेंगे। यदि ये हिमनद लुप्‍त होते हैं तो भारत की पन बिजली परियोजनाएं भयंकर संकट से घिर जाएगीं। फसलों को भी पानी का जबरदस्‍त संकट झेलना होगा और मौसम में स्‍थायी परिवर्तन आ जायेगा। ये परिवर्तन मानव एवं पृथ्‍वी पर जीवन के लिए अत्‍यंत खतरनाक हैं।

जलवायु में निरंतर हो रहे परिवर्तन के कारण दुनिया भर में पक्षियों की 72 फीसदी प्रजातियों पर विलुप्‍त होने का खतरा मंडरा रहा है। वर्ल्‍ड वाइल्‍ड लाइफ फंड की हालिया रिपोर्ट के अनुसार इन्‍हें बचाने का यही समय है। केन्‍या में संयुक्‍त राष्‍ट्र सम्‍मेलन में जारी प्रतिवेदन के अनुसार वातावरण में हो रहे विश्‍वव्‍यापी विनाशकारी परिवर्तन से सबसे ज्‍यादा खतरा कीटभक्षी प्रवासी पक्षियों, हानिक्रीपर्स और ठंडे पानी में रहने वाले पक्षी पेंग्‍यूइन के लिए है। पक्षियों ने संकेत देना शुरू कर दिए है कि ग्‍लोबल वा²मग ने दुनिया भर के जीवों के परिस्‍थितिकीय तंत्र में सेंध लगा ली है। इन सब संकेतों और चेतावनियों के बावजुद इंसान नहीं चेतता है तो उसे समुद्र के लगातार बढ़ रहे जलस्‍तर में डुबकी लगानी ही होगी।

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