सोमवार, 6 सितंबर 2010

अनुज नरवाल रोहतकी के कुछ हरियाणवी गीत व अन्य रचनाएँ

देखा है जबसे तू

देखा है जबसे तू

ले के तेरी आरजू

घूमते हैं कू-ब-कू

जाने कब तुमसे मिली नजर

हमपे हुआ कैसा ये असर

जहां तक दौड़े नजर

आए नजर तू ही तू

जबसे दीदाबाजी हुई

कैद में आजादी हुई

दिल को दिलगीर न कर

करले हमसे गूफ्‌तगू

कोई तुझे देखले इक बार

वो देखे फिर बार बार

तू करिश्‍मा है या जादू

तेरी हर बात है नशा

आँखें तेरी मयकदा

बैमौसम छा जाए घटा

बिखरादें तू गर गेसू

सूरतन, तू सूरतदार लगे

तेरा हुस्‍न बुरी नजर से बचे

हमको भी कभी भर ले

बाहों में अपनी तू

........

किसी पे तेरा भी आए दिल

किसी पे तेरा भी आए दिल

और वो तेरा तोड़ जाए दिल

तू भी कहें फिर, हाय दिल

बेमुरव्‍वत, बेहया

तू निकली बेवफा

क्‍या थी मेरी खता

तूने जो दी मुझे सजा

तेरा भी टूट जाए दिल

तू भी कहें फिर, हाय दिल

नहीं बची, नहीं बची

इश्‍क में बाकीजगी

दिल की थी जो लगी

निकली आज दिल्‍लगी

क्‍या सोचा था

क्‍या हो गया

यार बेवफा हो गया

रोए, चिल्‍लाए, दिल

जिसके थे हम नसीब

रहते थे दिल के करीब

बैठे हैं ले के वो रकीब

अपना था जो कभी

हो गया वो अजनबी

उससे अब क्‍या मैं कहूं

उसके बिन कैसे रहूं

कौन मुझे समझाए, दिल

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जिंदगी में हैं गम और कुछ भी नहीं

जिंदगी में हैं गम और कुछ भी नहीं

आँखों में है नम और कुछ भी नहीं

दावा जो करता था खुद को मेरा होने का

आज वही बन गया सबब मेरे रोने का

गैर का हो गया वो हमदम और कुछ भी नहीं

खुद से ज्‍यादा दिल तूने जिस पे ऐतबार किया

आज उसी ने तूझे खुद से दर-किनार किया

टूटा दिल का भरम और कुछ भी नहीं

आदत सी हो गई है अब तो तन्‍हाई में जीने की

मयखाने जाने की और हररोज शराब पीने की

शराबी हो गए हम और कुछ भी नहीं

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हरियाणवी गीत

1.

जीवन के दिन चार सजनी

क्‍यूं करे तकरार सजनी

लड़ झगड़ के क्‍यूं करे तू

टेम न बेकार सजनी

प्‍यार में बिताले जिदड़ी

मन का चूजा चहकण लाग्‍या

गात में जौबण लचकण लाग्‍या

इश्‍क का चंदन महकण लाग्‍या

होले न तैयार सजनी

करै ना वार सजनी

झाल उठै सै मेरे मन में

लाग री सै आग बदन में

सोच री सै तू के मन में

बोलण लाग्‍ये मोर बण में

करले नै इकरार सजनी

मेरे तै प्‍यार सजनी

तू मेरी अगर बन लावै

यौं कोठड़ा घर बन जावै

अनुज के तू ब्‍याही आवै

सूनी सेज कती भर जावै

मान कहा एक बार सजनी

करले न एतबार सजनी॥

..........................

2.

कर कै वादा आवण का पिया

तू ईब ताही भी ना आया

मैं खूब समझगी प्‍यार ने तेरे

तन्‍य प्‍यार खूब निभाया

फागण में सब खैले तै होली

मैं होरी थी तेरी यादां में बोली

चैत, बसाक में गर्मी पड़ी थी

जेठ में चाली लू घणी चली थी

लूआ गैल्‍या मैं भी जली थी

अॉख देहल पै मेरी पड़ी थी

तेरी बाबत मन्‍य पिया

जी अपना घणा जलाया

चमासे में चुगरदें के, होरी थी बुआई

तेरे बिन सामण में ,ना तीज मन्‍य मनाई

साढ़, सामण, भादवा, आसोज, मींह पड़ा इबके रोज

ओ बालम हरजाई, तू क्‍यूं देग्‍या मन्‍य जुदाई

मींह गैल्‍या मिल कै,इब कै तेरी यादां नै जलाई

तेरी सू, सच कहूं सूं, तेरी यादां ने घणा जलाया

कातक और मगसर की सर्दी,मुश्‍किल में थी, मैं बेदर्दी

पोह-माह का इबकै पाला, पाड़ ग्‍या घणा चाला

लाम्‍बी लाम्‍बी रात तेरे बिन कतीं कटी ना

जिस घड़ी तू याद ना आया वो घड़ी बणी ना

तू भी झूठा ,तेरा प्‍यार भी झूठा

तू भी जाण, जीसा तनै प्‍यार मेरे निभाया

3.

दे दे छोरी मन्‍य थोड़ा-सा प्‍यार

ना तो जाए पाछे रौवेगी

कहती आणा लावै ना रै वार

ना तो जाए पाछे रौवेगी

कॉलेज में मेरा पहला पहला दिन था

कामनरूम आगै पहला मिलन था

तन्‍य देखा न्‍यूं , होगी आंख चार

दे दे छोरी मन्‍य थोड़ा-सा प्‍यार

ना तो जाए पाछे रौवेगी

जब तै लगी आंख, आंख नहीं लगती

जिंदगी तेरे बिन अब मेरी नहीं कटती

तू कश्‍ती का मेरी मल्‍हार,

दे दे छोरी मन्‍य थोड़ा-सा प्‍यार

ना तो जाए पाछे रौवेगी

रांझे की तरीया तेरे पै मरूं सूं

हीर मेरी घणा प्‍यार करूं सूं

तू भी करले न मेरा एतबार

दे दे छोरी मन्‍य थोड़ा-सा प्‍यार

ना तो जाए पाछे रौवेगी

कह अनुज सिंह कथूरे आला

छोरा नहीं पाणा इसा भोला भाला

तू भी करले न इसते प्‍यार

दे दे छोरी मन्‍य थोड़ा-सा प्‍यार

ना तो जाए पाछे रौवेगी

4.

तेरी आख्‍या का तीर गोरी दिल पै लाग्‍या

चाला पाट ग्‍या रै चाला पाट ग्‍या

सामण मैं रै गोरी जब तू झूले झूल्‍य थी

सीली-सीली बाल में तेरी जुल्‍फ हिल्‍हें थी

जबै मन्‍य इश्‍क का सांप काट ग्‍या

चाला पाट ग्‍या रै चाला पाट ग्‍या

जब तै प्‍यार हुआ सै नींद नहीं आख्‍या म्‍हं

तू ही मेरें दिल सै तू ही बाता म्‍ंह

तेरा भोला चेहरा मन्‍ये इश्‍क म्‍हं फांस ग्‍या

चाला पाट ग्‍या रै चाला पाट ग्‍या

तू मेरी तकदीर सै गौरी तू सै मेरी आरजू

बैशक आजमा कै देख लै मन्‍य तेरे पे जां वार दूं

करके भरौसा मेरे पै, तू गले लाग जा

चाला पाट ग्‍या रै चाला पाट ग्‍या

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बावरी लीला किसके लिए

बावरी लीला किसके लिए

हिंदू के लिए न मुस्‍लमां के लिए

ये सियासत का चक्‍कर है भाई

कुर्सी की चाहत रखने वालों की है लड़ाई

फिर जनता बीच में कहां से आई

बावरी का मसला सुलझ सकता है

वहां मंदिर और मस्‍जिद की जगह

एक बड़ा अस्‍पताल भी बन सकता है

जिसमें सबका ईलाज मुफ्‌त हो सकता है

ओ भारत के नेताओं

मैं आपसे यही कहना चाहता हूं

मत बांटिए हमें मजहब-ओ-जात के खानों में

इंसान हैं हम और इंसान नहीं रहना चाहते हैं॥

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डॉ अनुज नरवाल रोहतकी

1 blogger-facebook:

  1. दिल वाली रचना पढकर एक सुना हुआ गीत याद आ गया " तेरा किसी पे आये दिल /तेरा कोई लुभाये दिल / तू भी तडप तडप के फिर / मुझसे कहे के हाय दिल

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