गुरुवार, 23 सितंबर 2010

गोपी गोस्वामी की कविता – मैं यहीँ रहता हूँ

मैं यहीं रहता हूँ

इसी पेड़ के नीचे

अकेला, उजाड़

या शायद कबाड़

कभी बैठा, कभी लेटा,

कभी अधलेटा

कभी ओढ़ता हूँ चीथड़े

और कभी नग्न

रहता हूँ

कुत्तों ने भोंकना

छोड़ दिया है

पर इंसानों को मेरी

परछाई छू जाने भर से

उबकाई आती है

कौन हूँ, क्या हूँ, कहाँ से आया

नहीं जानता

बस बुदबुदाता हूँ कुछ

मैले से बेमेल शब्द

मैं यहीं रहता हूँ

इसी पेड़ के नीचे

दिन-भर, इधर-उधर

कूड़े के ढेर में

घूमता हूँ

जो कुछ भी

अपना सा लगता है

भर लेता हूँ

एक बोरी में

जो कुछ भी फेंका जाता है

मेरी ओर

खा लेता हूँ

खाली दुत्कार और फटकार

से पेट नहीं भरता

तो कभी कभी

खा जाता हूँ अखबार भी

मैं यहीं रहता हूँ

इसी पेड़ के नीचे

एक ऐसी दुनिया में

जो अलग है

जैसे घसीट कर रख दी गई हो

एक कोने में

जहाँ केवल मैं हूँ

खुद से बतियाता हुआ

जब कभी इस दुनिया से

निकला तो पत्थर मार

कर फेंक दिया गया

वापस

इसी पेड़ के नीचे

जहाँ अब भी पड़ा हूँ

मैं यहीं रहता हूँ

इसी पेड़ के नीचे

आज भी लौटा हूँ

सिर पर पत्थर खा कर

शायद सफ़ेद होगा

तुम्हारी दुनिया में

पर मेरी दुनिया में ये लाल है

जो मेरे सिर से रिसता हुआ

मेरे चेहरे पर फ़ैल रहा है

रात गुजर रही है

बारिश हो रही है

पर मेरा शरीर जल रहा है

क्या कल मेरी दुनिया में सुबह होगी?

1 blogger-facebook:

  1. अति सवेदन शील कविता एक ऐसे विषय पर जिसे शायद हम ज़ियादा तवज्जो नहीं दे पाते या देना ही नहीं चाहते जबकि वे भी हमारी कायनात के अहम हिस्से हैं । रचनाकार को बहुत बहुत बधाई।

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