मंगलवार, 5 अक्तूबर 2010

प्रमोद भार्गव का आलेख - स्‍वास्‍थ्‍य को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोडने की जरूरत

pramod bhargav

हाल ही में कुछ ऐसे समाचार देखने में आए जिन्‍हें पढ़कर मैं आश्‍चर्य चकित तो हुआ ही दशकों पुरानी स्‍मृतियों में भी लौटना पड़ा। एक समाचार का सार था कि जल में प्रसव कराए जाने से पीड़ा कम होती है और दिल्‍ली में इस पद्धति से कुछ नर्सिंग होमों में प्रसव कराए जाने का सिलसिला शुरू भी हो गया है। एक समाचार था वेद ऋृचाओं के मनन और संगीत से कैंसर पर नियंत्रण पाया जा सकता है। इधर बाबा रामदेव ने तो योग रहस्‍य की गांठे खोल प्राकृतिक चिकित्‍सा के क्षेत्र में ऐसी क्रांति ला दी है, जिसे भारत ही नहीं विश्‍व पटल पर भी सहज स्‍वीकृति मिल रही है। दरअसल ऐसे जितने भी प्रयोगों की शुरूआत स्‍वास्‍थ्‍य-लाभ की दृष्‍टि से हुई है वे सब भारत की उस ज्ञान परंपरा से जुड़े हुए हैं, जिस चिकित्‍सीय ज्ञान को अंग्रेजों ने ठीक उसी तरह खतरनाक बताकर खारिज कर दिया था जिस तरह से हमारे प्राचीन भारतीय साहित्‍य को आध्‍यात्‍मिक और कर्मकाण्‍डी कहकर खारिज कर दिया गया था। और फिर हम अपने ही भौगोलिक परिवेश से उत्‍सर्जित उस ज्ञान से कटते चले गए जो लोक की ज्ञान परंपरा और दिनचर्या में शामिल था।

बात करीब साढ़े चार दशक पुरानी है। जब हम अपने पैतृक गांव अटलपुर में रहते थे। तब मैं कक्षा तीन का विद्यार्थी था। उन दिनों गांव में हर साल दीपावली से पहले अगरियों (लोहपीटों) की टोली आया करती थी। गलिहारे के किनारे कतार में गाड़ियों को लगा वे कृषि और औजार और घरेलु उपकरण बनाने में जुट जाया करते थे। तब एक बात घर-घर चर्चा में आई थी कि अगरियों की एक औरत ने पानी से भरे तसले (टब) में बच्‍चा जना। उस पानी में एक बोतल महुए की उतारी गई शराब भी मिलाई गई। शादी होने के बाद मेरी पत्‍नी ने मुझे बताया कि उसने तो लोहपीटे की औरत को पानी भरे तसले में प्रसव करते देखा भी है। मैं कोई चिकित्‍सा विज्ञान से जुड़ा व्‍यक्‍ति तो था नहीं, लेकिन जो प्रजनन की इस विधि पर शोध-विचार करता। लेकिन इधर मैंने जब जल में प्रसव कराए जाने से पीड़ा कम होती है, विषयक समाचार पढ़े तो पुरानी ज्ञान परंपरा और मान्‍यताओं पर मेरा ध्‍यान गया कि हमारे पूर्वज प्राकृतिक चिकित्‍सा के कितने बड़े जानकार थे।

चिकित्‍सा विज्ञान अब मान रहा है कि गुनगुने पानी के भीतर प्रजनन से प्रसव प्रक्रिया सरल हो जाती है और अस्‍सी प्रतिशत दर्द कम होता है। दरअसल पानी में प्रसव का आधार यह है कि बच्‍चा नौ माह तक मां के गर्भ में रहता है जहां उसके चारों ओर तरल पदार्थ भरा रहता है। जन्‍म लेते वक्‍त समान वातावरण व तापमान मिलने पर नवजात शिशु उससे अनुकूलता बिठा लेता है। यह आसान प्रक्रिया मां को तनाव मुक्‍त रखती है।

जल के भीतर प्रसव को आदर्श प्रक्रिया मानने वाली दिल्‍ली स्‍थित फिनिक्‍स अस्‍पताल की स्‍त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. उर्वशी सहगल कहती हैं कि जिन महिलाओं को प्रसव पीड़ा का भय होता है उनके लिए यह एक सुरक्षित प्रक्रिया है। पानी में रोगोपचार और तनाव मुक्‍त रखने के प्राकृतिक गुण होते है। इससे दर्द और तनाव के हार्मोंस में कमी आती है। जोड़ों या पीठ में दर्द से पीड़ित महिलाओं के लिए तो यह एक आदर्श उपक्रम है। डॉ. उर्वशी पानी में अब तक बारह प्रसव करा चुकी हैं। हरपीस से पीड़ित महिला को जरूर वे जल प्रसव से दूर रहने की सलाह देती हैं। क्‍योंकि जब बच्‍चा जन्‍म ले रहा होता है तो पानी के माध्‍यम से उसमें इस बीमारी के प्रवेश की संभावना बढ़ जाती है।

डॉ. उर्वशी बताती हैं कि, गर्भनाल पानी से भरी नाल होती है और बच्‍चा एक तरल माहौल से दूसरे तरल माहौल में आ रहा होता है। बच्‍चा मां के साथ नाभि नाल से जुड़ा होता है। दूसरे यदि वह पानी गटकता भी है तो यह उसके पेट में जाएगा न कि फेफड़ों में ? मुंबई की ट्‌यूलिप वूमंस हैल्‍थकेयर सेंटर की स्‍त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. शीतल सभरवाल तो अब तक 28 जल प्रसव करा चुकी हैं। वे बताती हैं कि सामान्‍य प्रसव की तुलना में यह प्रक्रिया अधिक प्राकृतिक है। पानी से महिला की ऊर्जा बढ़ जाती है। ऊर्जा के कारण प्रफुल्‍लित महिला के शरीर का हिल-डुल सकता है। रक्‍त प्रवाह भी बढ़ जाता है, इससे प्रसूतिका को दर्द कम होता है और बच्‍चे को अधिक ऑक्‍सीजन मिलती है। पानी की मदद से उच्‍च रक्‍तचाप को भी कम करने में मदद मिलती है। तनाव उत्‍सर्जित करने वाले हार्मोंस को पानी कम करता है इसके विपरीत दर्द झेलने वाले हार्मोंस बढ़ाता है।

यह निर्विवाद है कि जल में प्रसव कराए जाने की विधि अगरियों ने नहीं शोधी, यह उन्‍हें उस ज्ञान परंपरा से मिली थी जो समाज को रोग मुक्‍त बनाए रखने के लिए चलन में लाई गई थी। पानी में महुए की शराब मिलाने का कारण निश्‍चित ही एंटिबॉयोटिक टॉनिक के रूप में रहा होगा।

3 blogger-facebook:

  1. सच है, प्राचन भारतीय चिकित्सा का ग्यान यजुर्वेद व गर्भोपनिषद में विस्तार से वर्णित है ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. .

    You have shared a wonderful information. It's high time to bring back our ancient medicine in practice.

    kindly go through the following post in a similar context.

    http://zealzen.blogspot.com/2010/07/blog-post_18.html

    Regards,
    Divya


    .

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------