सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

महेन्द्र वर्मा की ग़ज़ल

ग़ज़ल

भीड़ में अस्तित्व अपना खोजते देखे गए,

मौन थे जो आज तक वे चीखते देखे गए।

 

आधुनिकता के नशे में रात दिन जो चूर थे,

ऊब कर फिर ज़िंदगी से भागते देखे गए।

 

हाथ में खंजर लिए कुछ लोग आए शहर में,

सुना है, मेरा ठिकाना पूछते देखे गए।

 

रूठने का सिलसिला कुछ इस तरह आगे बढ़ा,

लोग जो आते मनाने, रूठते देखे गए।

 

लोग उठ कर चल दिए उसने सुनाई जब व्यथा,

ओर  जो  बैठे  रहे  वे , ऊबते  देखे  गए।

 

ज़िंदगी की दौड़ में आगे रहे वे मस्त थे,

और जो पीछे रहे वे, हांफते देखे गए।

 

बेशऊरी इस कदर बढ़ती गई उनकी कि वे,

कांच के शक में नगीने, फेंकते देखे गए।

 

कह रहे थे जो कि हम हैं नेकनीयत रहनुमा,

काफ़िले को राह में ही, लूटते देखे गए।

-

- महेन्द्र वर्मा

7 blogger-facebook:

  1. बेशऊरी इस कदर बढ़ती गई उनकी कि वे,

    कांच के शक में नगीने, फेंकते देखे गए

    बहुत खूब ...अच्छी गज़ल

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक मुकम्मल गज़ल। वर्मा जी को बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  3. लोग उठ कर चले गये जब उसने सुनाई व्यथा्।
    और जो बैठे रहे वे ऊबते देखे गये। ज़िन्दगी की कड़वी सच्चाई को आपने बहुत ही सुन्दर तरीक़े से शे'र में पिरोया है, मुबारक बाद।

    उत्तर देंहटाएं
  4. ज़िंदगी की दौड़ में आगे रहे वे मस्त थे,
    और जो पीछे रहे वे, हांफते देखे गए।

    खूबसूरत और सच्ची बात

    उत्तर देंहटाएं
  5. आदरणीय रावत जी, डॉ. दानी जी, संगीता जी और राक़िम जी, आप सभी के प्रति आभार

    उत्तर देंहटाएं
  6. रूठने का सिलसिला कुछ इस तरह आगे बढ़ा,
    लोग जो आते मनाने, रूठते देखे गए।
    बेशऊरी इस कदर बढ़ती गई उनकी कि वे,
    कांच के शक में नगीने, फेंकते देखे गए।

    महेंद्र जी उम्दा शेर, अद्भुत अभिव्यक्ति के लिए बधाई स्वीकार करें|

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------