गुरुवार, 4 नवंबर 2010

प्रमोद भार्गव का आलेख - खेल बनाम भ्रष्‍टाचार

  पूरी दुनिया में खेल मनोरंजन और शारीरिक तंदुरूस्‍ती के प्रतीक हैं। कृष्‍ण लीला और पुराण कथाओं में भगवान श्रीकृष्‍ण खेल-खेल में समाज के शोषक बने शैतानों का विनाश करते हैं। यमुना को प्रदूषण मुक्‍त करने के लिए यही बाल कृष्‍ण खेलते-खेलते जहरीले कालिया नाग का नथ-मर्दन करते हैं। लेकिन कालजयी नायकों के इसी देश में आयोजित राष्‍ट्र मण्‍डल खेलों में चौतरफा खेले गए भ्रष्‍टाचार ने ऐसा खेल खेला कि देश कोई गौरव-कीर्ति कायम करने की बजाय भ्रष्‍टतम देशों की सूची में तीन पायदान और नीचे खिसक गया। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की भ्रष्‍टाचार सूचकांक संबंधी ताजा रिपोर्ट के अनुसार 178 भ्रष्‍ट देशों की सूची मे भारत अब 87 वें स्‍थान पर है। इससे यह तय होता है कि भारतीय धार्मिक, ईमानदार और नैतिक होने के कितने ही दावे करें, व्‍यावहारिक रूप में उनका मूल चरित्र बेईमान, अनैतिक और भ्रष्‍ट ही है। इस सब के बावजूद आलम यह है कि भ्रष्‍टाचार पर काबू पा लेने की हमारे राजनेताओं और नौकरशाहों में कोई मंशा बेचैन होती दिखाई नहीं देती। क्‍योंकि भ्रष्‍टाचार गठबंधन का खेल हो गया है।

वैश्‍विक भ्रष्‍टाचार पर नजर रखकर कामकाज में पारदर्शिता को प्रोत्‍साहित करने की दिशा में काम करने वाली ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल संस्‍था ने वर्ष 2010 के लिए भ्रष्‍टाचार को लेकर 178 देशों की सालाना सूची जारी कर दी है। इस सूची में भारत पिछले साल की तुलना में तीन सीढ़ी लुढ़ककर 87 वें स्‍थान पर आ गया है। मसलन बीते साल यहां भ्रष्‍टाचार में इजाफा हुआ है। भ्रष्‍टाचार में बढ़ोत्तरी की यह दर राष्‍ट्रकुल खेलों में चौतरफा हुए भ्रष्‍टाचार का नतीजा है। एक अनुमान के मुताबिक 80 हजार करोड़ रूपये इन खेलों पर खर्च हुए, जिसमें करीब 50 हजार करोड़ के भ्रष्‍टाचार का कारोबार हुआ। नतीजतन भ्रष्‍टतम देशों के सूचकांक में भारत की गिनती 87 वें स्‍थान पर आ गई।

किसी देश के सरकारी और निजी क्षेत्र में भ्रष्‍टाचार की स्‍थिति का काफी हद तक सच्‍चाई का खुलासा करने वाले इस सूचकांक (करप्‍शन पर्सेप्‍शंस इंडेक्‍स) के तहत 10 अंक पाने वाले सबसे कम भ्रष्‍ट और शून्‍य अंक पाने वाला सबसे ज्‍यादा भ्रष्‍ट देश माना जाता है। इस पैमाने पर स्‍थान के गणित का समीकरण अलग है। जो देश जितने ज्‍यादा स्‍थान पर नीचे है, वह उतना ही ज्‍यादा भ्रष्‍ट है। इस सूची में रूस 154 वें स्‍थान पर रहकर भ्रष्‍टतम महाशक्‍ति बनने की ओर बढ़ रहा है। अमेरिका पहली बार सबसे कम 20 भ्रष्‍ट देशों की सूची से बाहर आकर 22 वें स्‍थान पर आ गया है। धीमी गति से ही सही अमेरिका में भी भ्रष्‍टाचार पैर पसार रहा है। सूचकांक के आधार पर सोमालिया 1.1 अफगानिस्‍तान 1.4, नेपाल 2.2, पाकिस्‍तान 2.3, बांग्‍लादेश 2.4, श्रीलंका 3.2, भारत 3.3 और चीन 3.5 अंकों के साथ भ्रष्‍टतम देशों में शुमार हैं। धन-दौलत के पीछे भागती दुनिया में डेनमार्क, न्‍यूजीलैण्‍ड, फिनलैण्‍ड, स्‍वीडन, कनाडा और नीदरलैण्‍ड जैसे देश अभी भी भ्रष्‍टाचार मुक्‍त देशों की गणना में शामिल हैं।

ट्रांसपेरेंसी इंटनेशनल संस्‍था के अध्‍यक्ष हुगुएट लाबेले ने चिंता प्रगट करते हुए कहा है कि दुनिया में भ्रष्‍टाचार कम होने की बजाय बढ़ता जा रहा है। इस कारण वैश्‍विक दुनिया की दो बड़ी समस्‍याएं आर्थिक मंदी और जलवायु परिवर्तन का हल संभव नहीं हो पा रहा है। भारत में भ्रष्‍टाचार के चलते ही जमीनों के दाम आसमान छू रहे हैं और वाहनों की बढ़त ने आम आदमी के आवास और आजीविका के संसाधन संकट में डाल दिए हैं। बल्‍कि इस भयावह संकट के दायरे में अब मध्‍यवर्ग भी आता जा रहा है। ई-प्रशासन और सूचना का अधिकार भ्रष्‍टाचार से छुटकारे के कारगर उपायों के रूप में पेश किए गए थे, लेकिन ये दोनों, भ्रष्‍टाचार का विस्‍तार करने के सरल उपाय बनकर उभरे। इसलिए दो साल पहले ‘ट्रांसपेरेंसी इंटर-नेशनल इंडिया सेटर फॉर मीडिया स्‍टडीज ने जो रिपोर्ट पेश की थी उसमें खुलासा हुआ था कि एक साल के भीतर हमारे देश में गरीबी-रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों को बुनियादी, जरूरी व जनकल्‍याणकारी सेवाओं को हासिल करने के लिए तकरीबन नौ सौ करोड़ रूपये की रिश्‍वत देनी पड़ती है। यह हकीकत सांस्‍कृतिक रूप से सभ्‍य, मानसिक रूप से धार्मिक और भावनात्‍मक रूप से कमोबेश संवेदनशील समाज के लिए सिर पीट लेने वाली है। इस अध्‍ययन ने प्रकारांतर रूप से यह तय कर दिया था कि हमारे यहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली, ग्रामीण रोजगार गारंटी, मध्‍यान्‍ह भोजन और पोलियो उन्‍मूलन के साथ स्‍वास्‍थ्‍य लाभ व भोजन का अधिकार संबंधी योजनाएं किस हद तक जमीनी स्‍तर पर लूट व भ्रष्‍टाचार का हिस्‍सा बनी हुई हैं।

बीते माह संपन्‍न हुए राष्‍ट्रकुल खेलों में बरते गए भ्रष्‍टाचार के सिलसिले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सार्वजनिक रूप से ऐलान किया था कि खेल खत्‍म होते ही भ्रष्‍टाचार से जुड़े मुद्‌दों की गंभीरता से जांच कर दोषियों को कटघरे में खड़ा किया जाएगा। इस मकसद पूर्ति के लिए सेवा निवृत्त महालेखाकार वीके शुंगलू की अध्‍यक्षता हेक्‍टेयर मीटर पानी उपलब्‍ध है। लेकिन 680 लाख हेक्‍टेयर जल का ही उपयोग संभव हो पाता है। इस जल पर भी दोहन के खर्चीले व अत्‍याधुनिक संसाधनों के कारण बड़े किसानों का एकाधिपत्‍य बढ़ता जा रहा है नतीजतन लघु सिंचाई साधनों से खेती करने वाले किसान सिंचित साधनों से वंचित होते जाकर भूखी आबादी का दायरा बढ़ा रहे हैं। ऐसे हालातों के चलते बीसवीं शताब्‍दी में वैश्‍विक आबादी तो तीन गुना ही हो पाई, लेकिन पानी का उपयोग सात गुना बढ़ गया। इस शताब्‍दी के मध्‍य में जब यह आबादी नौ करोड़ से ऊपर हो जाऐगी तब पानी का संकट किस हाल में होगा, यह सोच का विषय है ?

अमेरिका और अन्‍य यूरोपीय देश बड़ी मात्रा में खाद्यान्‍नों का उपयोग जैव ईंधन के निर्माण में करने लगे हैं। गोया गेहूँ, चावल, मक्‍का और सोयाबीन फसलों का कायांतरण ऐथोनाल और बायोडीजल के उत्‍पादन में किया जा रहा है। इन उपायों को अंजाम ऊर्जा संसाधनों की ऊंची लागतों को कम करने के लिए वैकल्‍पिक जैव ईंधनों को बढ़ावा देने की दृष्‍टि से किया जा रहा है। जैव ईंधन के उत्‍पादन ने अनाज बाजारों के स्‍वरूप को ही विकृत कर दिया है। अमेरिका द्वारा खाद्यान्‍नों को मवेशियों के लिए चारे के रूप में भी इस्‍तेमाल किए जाने से मानव आबादी की भूख का दायरा लगातार बढ़ रहा है। यदि अनाज को जैविक ईंधन से अलग नहीं रखने के उपाय संभव नहीं होते है तो कालांतर में बड़ी मात्रा में किसान भोजन के अधिकार से वंचित होकर भूखों के बढ़ते दायरे में शामिल हो जाएगा।

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ई-पता pramodsvp997@rediffmail.com

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

1 blogger-facebook:

  1. जब तक सोनिया गाँधी,मनमोहन सिंह और प्रतिभा पाटिल के खिलाप इस देश की जनता सड़कों पर उतरकर जनमत के जरिये महाभियोग नहीं लाएगी इस देश में लूट और भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लग सकता ......चाहे खेल हो या गरीबों की योजनाओं के नाम पर लूट ....
    आप सभी को खासकर इमानदार इंसान बनने के लिए संघर्षरत लोगों को दीपावली की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें....

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