विजय वर्मा का गीत – दर्पण, नाज न कर तू खुद पर इतना…

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र्पण
नाज़ न कर तू खुद पर इतना

दिखा मत इतना अक्खड़पन..

माना तू एक माध्यम है,-----

आत्म-बोध,आत्म-दर्शन का

पर प्रकाश-पुंज के बिना कहो तो

कैसा तेरा आकर्षण?

दर्पण.\-----..

 

कैसे अक्स दिखलायेगा तू,

सूरत असली बतलायेगा तू ?

इस बस्ती में ऐसे लोग है रहते

जिनके चेहरे पर परतें ही परतें

घिस जाएगा तू खुद

करते-करते इन चेहरों का घर्षण!

दर्पण------.

 

इस ज़ग में अब कोई सुकरात नहीं है

आत्मचेतना को संग रखे तुझे--

अब ऐसी कोई बात नहीं है.

आत्मावलोकन अब कोई नहीं करता

अब तो होता है दोषारोपण.!

दर्पण----

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v k verma,sr.chemist,D.V.C.,btps
vijayvermavijay560@gmail.com

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4 टिप्पणियाँ "विजय वर्मा का गीत – दर्पण, नाज न कर तू खुद पर इतना…"

  1. bahut sundar aur saarthak rachna!!!
    इस बस्ती में ऐसे लोग है रहते

    जिनके चेहरे पर परतें ही परतें

    घिस जाएगा तू खुद

    करते-करते इन चेहरों का घर्षण!

    दर्पण------.
    waah!!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. विजय जी की ये कविता बिल्कुल सच्चाई बयां करती हुई.... अब दर्पण भी कैसे सही सच्चाई बयां करे ....

    मेरे ब्लॉग सृजन_ शिखर पर " हम सबके नाम एक शहीद की कविता "

    उत्तर देंहटाएं
  3. आत्म लोकन अब कोई नहीं करता ,
    अब तो होता है दोषारोपण ।

    बहुत बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति , बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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