बुधवार, 22 दिसंबर 2010

रामप्रताप गुप्ता का आलेख - देश में बुजुर्गों की बढ़ती संख्या और उनकी बढ़ती उपेक्षा

elderly people and their need

देश में बुजुर्गौं की बढ़ती संख्या और उनकी बढ़ती उपेक्षा

—डॉ. रामप्रताप गुप्ता, उज्जैन

समय के साथ—साथ चिकित्सा सुविधाओं और पोषण स्तर में बेहतरी के चलते देश की औसत आयु में वृद्धि होती जा रही है और इसी के साथ देश की आबादी में बुजुर्गौं (६० वर्ष या अधिक आयु वाले लोग) का प्रतिशत और उनकी संख्या भी बढ़ती जा रही है। सन् १९६१ में देश में बुजुर्गों की कुल संख्या २.४ करोड़ थी जो कि सन् १९८१ में ४.५ करोड़ और सन् २००१ में ७.७ करोड़ हो गई थी। इस समय उनकी संख्या १० करोड़ के लगभग होने का अनुमान है। अगर कुल आबादी में बुजुर्गौं के प्रतिशत पर नजर डालें तो यह १९६१ में ५.६३ प्रतिशत था जो कि सन् २००१ में बढ़कर ७.५ प्रतिशत हो गया। अर्थ यह हुआ कि देश की युवा और उत्पादक आबादी पर बुजुर्गौं की देखभाल का भार बढ़ता ही जा रहा है। उम्र के साथ शारीरिक और मानसिक असमर्थताएँ बढ़ती जाने से बुजुर्गौं की विशेष देखभाल की माँग रहती है। स्वास्थ्य संबंधी आँकड़े बताते हैं कि भारतीय बुजुर्गौं के २५—२७ प्रतिशत को दिखाई कम पड़ने लगता है, १२—१४ प्रतिशत को सुनाई कम देने लगता है। अनेक बुजुर्ग के लिए तो बढ़ती उम्र के साथ चलना—फिरना भी असंभव हो जाता है और वे बिस्तर पर पड़े रहने को बाध्य होते हैं। वे सम्पर्कजनित और जीवन शैली से संबंधित दोनों तरह की बीमारियों के भी अधिक शिकार होते हैं। ऐसे में उनकी देखभाल और उन्हें सुरक्षा देने की आवश्यकता बढ़ जाती है।

सन् १९७० तक हमारे यहाँ संयुक्त परिवार प्रणाली के चलते बुजुर्गौं की देखभाल कोई समस्या ही नहीं थी, बल्कि परिवार में उन्हें आदर और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। परिवार में उनकी उपस्थिति गौरव पूर्ण मानी जाती थी और उनकी समुचित देखभाल भी होती थी। अब समय के साथ संयुक्त परिवार प्रणाली विघटित होती जा रही है, युवा आबादी नौकरी और व्यवसाय के बेहतर अवसरों के फलस्वरूप शहरों की ओर जा रहे हैं और पीछे बुजुर्ग आबादी अकेले या दोनों पति—पत्नी ही रह जाते हैं। देश की ९० प्रतिशत से अधिक आबादी असंगठित क्षेत्र में कार्य करती है, जिनके रोजगार और आय चक्रीय और मौसमी उतार—चढ़ाव के शिकार होते हैं। ऐसे में ये अपनी वृद्धावस्था के लिए कुछ भी बचा कर नहीं रख पाते हैं। उनको प्राप्त निम्नस्तरीय मजदूरी से तो उनकी वर्तमान आवश्यकताएँ ही मुश्किल से पूरी हो पाती हैं। इस सारी पृष्ठभूमि में जब परिवार के युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर प्रवास कर जाते हैं और परिवार के बुजुर्गौं के लिए यदाकदा थोड़ी राशि ही भेजते हों तो उस स्थिति में बुजुर्गौं के लिए पेट की आग बुझाने के लिए मजदूरी करना बाध्यता बन जाती है, चाहे उससे उन्हें कितनी ही कम आय प्राप्त क्यों न होती हो। आजकल हर बड़े शहर में २—३ या अधिक स्थानों पर सब्जी, फल आदि के बाजार की तरह ही मजदूरों का बाजार भी लगता है, जहाँ वे रोजगार की तलाश में एकत्रित होते हैं, एकत्रित मजदूरों में बुजुर्गौं का प्रतिशत काफी अधिक होना भी इस बात का प्रमाण है कि देश में हमारे बुजुर्ग कितने असहाय, असुरक्षित हैं। संयुक्त परिवार प्रणाली के नष्ट हो जाने की प्रक्रिया ने उनकी असुरक्षा को और भी बढ़ा दिया है।

इस सारी पृष्ठभूमि में कल्याणकारी राजकीय व्यवस्था स्थापित करने का दावा करने वाली सरकार से देश के बुजुर्गों की सामाजिक सुरक्षा की अपेक्षा स्वाभाविक ही कही जावेगी परन्तु सरकार आजादी के पाँच दशक गुजर जाने के पश्चात ही राष्ट्रीय बुजुर्ग नीति की घोषणा कर सकी है। इस नीति के अंतर्गत बुजुर्गौं की सभी प्रकार की आवश्यकताओं को समाहित कर एक स्पष्ट कार्य योजना बनाई गई है। इस नीति के अंतर्गत बुजुर्गौं की देखभाल, उनके लिए स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता, उनकी वित्तीय सुरक्षा आदि सरकार का दायित्व माना गया है। इतना सब होते हुए भी जमीनी स्तर पर ठोस कदमों की अपेक्षा आज भी अपेक्षा ही बनी हुई है। राज्य सरकारों ने गरीबी की रेखा के नीचे स्थित बुजुर्गौं के लिए तो वृद्धावस्था पेंशन की व्यवस्था तो की है, परन्तु अलग—अलग राज्यों में पेंशन की राशि भी अलग—अलग है। अपेक्षा है कि इस हेतु केन्द्र सरकार से जिस दर से पेंशन राशि प्राप्त होती है, राज्य सरकारें भी उतनी ही राशि उसमें मिलाकर वृद्धों को पेंशन देगी, परन्तु अनेक राज्य सरकारें केवल केन्द्र सरकार से प्राप्त पेंशन की राशि ही देती है, अन्य उसमें अलग—अलग दरों से राशि मिलाती हैं। इस वजह से देश के विभिन्न राज्यों में गरीबी की रेखा के नीचे स्थित बुजुर्गों को अलग—अलग दर से वृद्धावस्था पेंशन दी जा रही है। मध्यप्रदेश भी उन राज्यों में से एक है जो वृद्ध लोगों को केवल केन्द्र सरकार से प्राप्त राशि के बराबर ही पेंशन देता है। सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि अनेक गरीब बुजुर्ग तो गरीबी रेखा के नीचे स्थित लोगों की सूची में शामिल ही नहीं हो पाते हैं जबकि अन्य बेहतर आर्थिक स्थिति वाले लोग भी उसमें शामिल कर लिए जाते हैं। अतः देश के आर्थिक सुरक्षा की आवश्यकता वाले बुजुर्गौं को आर्थिक सुरक्षा प्रदान कर दी गई है, यह नहीं कहा जा सकता है।

आर्थिक सुरक्षा के पश्चात बुजुर्गौं की सबसे बड़ी आवश्यकता समुचित, पर्याप्त और सहज पहुँच वाली स्वास्थ्य सुविधाओं की है। सन् २००१ के सर्वे के अनुसार देश के दो—तिहाई बुजुर्ग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, उनमें से अधिकांश अशिक्षित हैं और उनमें से ९० प्रतिशत से अधिक के असंगठित क्षेत्र में कार्यरत रहने से वृद्धावस्था में किसी तरह की पेंशन आदि भी नहीं मिलती है और उन्हें पर्याप्त, संतुलित पोषण भी नहीं मिल पाता है। ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं के लगभग पूर्ण अभाव होने तथा आर्थिक संसाधनों के अभाव में इनके लिए महँगी, पहुँच से दूर आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएँ प्राप्त करना भी संभव नहीं होता है। राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के परिणाम बताते हैं कि १८—२० प्रतिशत वृद्ध तो ऐसे होते हैं जिन्हें अपने आखरी समय में समुचित चिकित्सा सुविधाएँ भी प्राप्त नहीं हो पाती हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं से सर्वाधिक वंचितों की तलाश की जाए तो बुजुर्गौं का, विशेषकर बुजुर्ग महिलाओं का नाम सबसे ऊपर होगा। स्वास्थ्य बीमा भी अभी तक बुजुर्ग महिलाओं एवं पुरुषों से दूर ही रहा है।

अंत में हमें हमारे बुजुर्गौं को भार स्वरूप लेने के स्थान पर उन्हें अनुभवों के खजाने के रूप में लेना होगा। उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने तथा परिवार के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जैसे—जैसे वे अपने जीवन के संध्याकाल की दिशा में बढ़ते जाते हैं, उनकी आय अर्जित करने की क्षमता कम होती जाती है, उनकी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ बढ़ जाती हैं। शारीरिक असमर्थताएँ बढ़ती जाती हैं और वे परिवार के सदस्यों पर दिनोंदिन अधिक निर्भर होते जाते हैं। तमाम तरह की असमर्थताओं को जन्म देने वाली उनकी वृद्धावस्था परिवार एवं समाज को ऐसा अवसर प्रदान करती है कि समाज उनके ऋण को वापिस चुका सकता है। जहाँ परिवार को उनकी समुचित देखभाल करना ही चाहिए, उन्हें बोझ ना समझते हुए उनके अनुभवों का लाभ लेना चाहिए एवं समाज को उनके लिए समुचित स्वास्थ्य सुविधाओं को उपलब्ध कराना चाहिए। अनेक वृद्ध बढ़ती आयु के साथ स्मृति विनाश पार्किन्संस बीमारी जिसमें वे अपने शरीर पर नियंत्रण खो देते हैं, जैसी गंभीर बीमारियों के शिकार हो जाते हैं और उन्हें विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है जो कुछ परिवारों के लिए प्रदान करना संभव नहीं होता है। सरकार को ऐसे बुजुर्गों के लिए देखभाल की विशेष व्यवस्था करना चाहिए। बदलती सामाजिक परिस्थितियों में बुजुर्गौं की आर्थिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं की पूर्ति जैसे कार्यों को सरकारों को अपने मूलभूत दायित्वों में शामिल करना होगा। हर वर्ष हम २१ सितम्बर को ‘एल्जाइमर्स’ डे स्मृति विनाश रोगियों के दिवस के रूप में मनाते हैं, इसको हमें विस्तृत स्वरूप देकर बुजुर्ग दिवस के रूप में मनाना चाहिए, बुजुर्गौं के लिए चिकित्सा शिविरों का आयोजन करना चाहिए, इस तरह के शिविर ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से आयोजित करना चाहिए, इनमें महिला बुजुर्गौं की उपस्थिति अधिक से अधिक हो सके, इस हेतु प्रयास करना चाहिए, क्योंकि अनेक सर्वेक्षणों के माध्यम से यह ज्ञात हुआ है कि महिला बुजुर्गौं की स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं की अधिक उपेक्षा होती है।

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साभार - साप्ताहिक उपग्रह - रतलाम, दीपावली विशेषांक 2010.

2 blogger-facebook:

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (23/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  2. आंकड़ों सहित अच्छी जानकारी ...

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