शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

राजीव श्रीवास्तवा की कविता - नारी! तुम ये सब कैसे सह लेती हो!

 

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अपने ही घर में अपमानित हो कर, तुम कैसे रह लेती हो,

दिन में कई बार तिरस्कृत होती हो,ये सब कैसे सब हेती हो!

 

अपने नर्म हाथों से रोटी बनाती हो,फिर पत्थर भी तोड़ लेती हो,

ठेकेदार की गालियाँ खाती हो,ये सब कैसे सह लेती हो!

 

कई तरह के रिश्तों को कितनी कुशलता से निभा लेती हो ,

हर रिश्ते में ठुकराई जाती हो ये सब कैसे सह लेती हो !

 

अपने बच्चों की खातिर अपनी हर खुशी त्याग देती हो,

वही बच्चे फिर आँख दिखाते है,ये सब कैसे सह लेती हो!

 

पति को परमेश्वर कहती हो,पूरा जीवन अर्पण कर देती हो,

तुझे दासी समझ लज्जित करता है, ये सब कैसे सह लेती हो!

 

सृष्टि को नया जीवन देने को प्रसव पीड़ा तुम सह लेती हो,

उसी समाज में अबला कहलाती हो,ये सब कैसे सह लेती हो!

 

पुरुषों को जन्म देती हो,छाती से लगा बड़ा करती हो

उन्हीं के द्वारा सताई जाती हो ये सब कैसे सह लेती हो!

 

अपने कुटुम्ब की खातिर ,दिन भर चक्की में पिसती हो

फिर भूखे पेट सोना पड़ता है ये सब कैसे सह लेती हो!

 

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

12 blogger-facebook:

  1. ....कडवे सच को उजागर करती सुंदर कविता!

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  2. naari kee peedha ko bahut gahrayee se mahsoos kiya hai aapne... yah dekh bahut achha laga.
    ek naari hi to hai jo n jaane kya-kya nahi sah jaati hai...sahansheelta ka yah gun aur kisi bhi kahan!
    Bahut saarthak naari ke darad ko samarpit rachna ke liye aabhar

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  3. यही तो नारी है ………नारी के दर्द की सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  4. समाज को आइना दिखाती एक अच्छी रचना ....

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  5. नारी के प्रति यह उद्दगार अच्छे लगे ..नारी ही शक्ति है जो सब सह भी लेती है

    उत्तर देंहटाएं
  6. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना कल मंगलवार 28 -12 -2010
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..


    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  7. सहनशक्ति ही गहना है शायद...
    सुन्दर रचना!

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  8. नारी व्यथा की सटीक प्रस्तुति..बहुत सुन्दर

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  9. नारी धरती के समान सहिष्णु है। अपनो की खातिर सारी पीड़ाएं वह सहन कर लेती है।

    उत्तर देंहटाएं

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