बुधवार, 22 दिसंबर 2010

रामशंकर चंचल की लघुकथा - अलाव

लघुकथा

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अलाव

—डॉ. रामशंकर चंचल, झाबुआ

बरसाती सर्द रात, साँय—साँय करते वीरान जंगल, ऊँची पहाड़ियों पर बसी झोपड़ियों में निवास करते भोले—भाले आदिवासी। २५—३० झोपड़ियों का यह गाँव रोशन नगर कहलाता है। यद्यपि रोशनी के नाम पर इन सहृदय आदिवासियों ने सिर्फ चाँद—सूरज की रोशनी देखी है। पता नहीं क्या सोचकर वर्षौं से अँधेरे के श्राप में जी रहे इस गाँव का नाम रोशन नगर रख दिया? बरसाती सर्द रातों में कुछ खेतों में ही दिखाई देती है रोशनी।

वह रोशनी, जिसे जलाकर करते हैं सारी रात खेतों की रखवाली। वह अलाव (आग) उन्हें रोशनी भी देती है और ठंड से लड़ने का साहस भी। आज कड़कड़ाती ठंड से बचने के लिए मंगलिया ने अलाव जलाया और बैठ गया पास में अपना जिस्म गरमाने। दिनभर की मेहनत के बाद रात भर फिर जागना बहुत मुश्किल होता है। फिर भी मंगलिया बीड़ी जलाकर कुछ धुआँ उड़ाता, जैसे—तैसे नींद से लड़ रहा था। आखिर जब कुछ ज्यादा ही थकान महसूस की तो समीप रखी खटिया पर कुछ देर सुस्ताने के लिए लेट गया। पता नहीं कब नींद लग गई। इधर तूफानी हवा चली और अलाव की आग मंगलिया की झोपड़ी में लग गई। बस फिर क्या था। देखते ही देखते झोपड़ी भभक उठी, जिसे देख मंगलिया के बीवी—बच्चे चिल्लाने लगे।

शोर सुनकर मंगलिया की नींद में खलल पड़ी, वह उठा तो सामने देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसका घर जल रहा था। मंगलिया पागलों की तरह चिल्लाता हुआ दौड़ा, पर झोपड़ी आखिर कितना दम भरती। सब कुछ आग में भस्म हो गया। दिन—रात श्रम करके, मेहनत और ईमानदारी से बीवी—बच्चों का पोषण करने वाले सहृदय मंगलिया का सब कुछ स्वाहा हो गया था। अगले दिन वह काम पर जाने को तैयार था, फिर से झोपड़ी जो बसानी थी।

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साभार - साप्ताहिक उपग्रह, रतलाम - दीपावली विशेषांक 2010

6 blogger-facebook:

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (23/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  2. यही दुनिया है भारत के संदर्भ में...

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  3. बहुत खूब , यही है सच्चाई जो मंगलिया को आरंभ से ही है समझ मेम आई । रौशन होगा उसका जहाँ उसी से और न होगा दूसरे किसी से । सूरज देवता ही रखेंगे रौशन , करेंगे मंगल मंगलिया के जीवन को । नियति ने भी शायद कुछ तो सोचा ही होगा नामकरण के पहले । अच्छी रचना , बधाई ।

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  4. -ओह ...मन उदास हो गया ......फिर भी " अगले दिन वह काम पर जाने को तैयार था, फिर से झोपड़ी जो बसानी थी।" अंतिम पन्तिया अच्छी लगी ......

    -"

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  5. gareeb ko to roj kua khod kar pani pina hai. yahi niyati hai.maarmik laghu katha.

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