मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

जयकुमार जलज की लघुकहानी : हासिल

लघुकहानी

हासिल

— डॉ. जयकुमार जलज, रतलाम

उस तरफ नाला और उजाड़ मैदान होने से गली बंद हो गई थी। लोगों ने काँटेदार तार लगाकर उसे और भी बंद कर लिया था। दोनों तरफ बने मकानों के लिए अब वह एक आँगन जैसी थी। खेलकूद, सगाई, मुंडन जैसे कार्य उसी में हो लेते थे। आबादी अधिक नहीं थी। पर उच्च, मध्यम और साधारण आय वर्ग के कई परिवार रहते थे। एक तरफ एक बड़ा सरकारी दफ्तर, दूसरी तरफ एक कारखाना होने से भी गली अपने में ही सौहार्द्रपूर्वक सिमटी हुई थी। रहवासियों के दैनिक सरोकारों को बाहर निकलने के कम ही अवसर थे। बच्चे मिलकर खेलते। मिलकर स्कूल जाते। त्यौहारों पर अपनत्व और बढ़ जाता। दिवाली के दूसरे दिन सुबह से ही एक — दूसरे के यहाँ पकवान पहुँचाए जाते।

किराए के छोटे से मकान में उस परिवार को आए अधिक दिन नहीं हुए थे। गली में यह उसकी पहली दिवाली थी। पकवानों के आदान—प्रदान में शामिल होना ही था। पहला मौका और उम्र में अपेक्षाकृत छोटे होने से उसके तीनों बच्चों में बेहद उत्साह था। माँ को जरूर डर था, कहीं बच्चों की नीयत बिगड़ गई । कहीं प्लेट लाते— ले जाते वे उस पर हाथ साफ कर बैठे। नया मुहल्ला, क्या मुँह दिखाएगी ? सो रात को खाए घर के पकवान अभी हजम भी नहीं हुए थे कि उसने उन्हें और खिलाकर ही बाहर भेजा।

आंटियाँ अधिकतर इन्हीं बच्चों को आवाज देने लगीं। एक घर में प्लेट पहुँचाते, वहाँ से उसकी प्लेट लेकर निकलते कि किसी और घर से आवाज लगती। ये दौड़े जाते। जिस घर में प्लेट आती उस घर की आंटी उसकी

सामग्री में कुछ घटातीं, बढ़ातीं, बदलतीं। कभी अंकल से पूछतीं। कभी अंकल खुद ही हस्तक्षेप करते। इस प्रकार किसी अन्य के यहाँ भेजने के लिए उस घर की प्लेट तैयार हो जाती। बच्चे उसे यथाघर पहुँचाने के लिए दौड़ पड़ते। कब पहले घर के कुछ पकवान दूसरे घर, दूसरे के तीसरे, तीसरे के चौथे, चौथे के फिर पहले घर आ पहुँचे, पता ही नहीं चला। प्लेट्स को निर्देशानुसार पहुँचाते रहकर बच्चे घर लौटे तो सूरज सिर पर आ गया था।

माँ ने ज्यादा ही पकवान बनाए थे। अब भी आधा भगौना भरा पड़ा था। लेकिन बच्चे उनकी तरफ देखना भी नहीं चाहते थे। उन्हें तो धनी परिवारों के पकवानों का इंतजार था। प्लेटों को लाते—ले जाते उनकी सुगंध उनके नथनों में समा चुकी थी। मुँह में आते पानी को रोकना मुश्किल हो रहा था। वे उन पकवानों की तरफ बढ़े जो विनिमय के तहत उनके रसोईघर में जमा हो गए थे। दोनों बेटियाँ उन्हें अलग—अलग छाँटने लगीं। बेटा झपट्टा मारने के मूड़ में टकटकी लगाए खड़ा था।

पर यह क्या ? इनमें से कुछ तो उन्हीं के पकवान हैं। जो उनके नहीं हैं वे भी उन्हीं के पकवानों की तरह हैं। बच्चे रूआँसे हो आए। मायूसी में दीवार से टिककर जा बैठे। माँ के लिए यह पहला मौका नहीं था जब उसने देखा कि सिर्फ पानी ही नहीं और भी बहुत कुछ अपनी सतह ढूँढता है। फिर भी बच्चों का सामना करने की हिम्मत वह नहीं जुटा पाई। उसे उनके फैले हुए थके पैर दिखाई देते रहे।

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साभार - साप्ताहिक उपग्रह - रतलाम, दीपावली विशेषांक.

2 blogger-facebook:

  1. आजकल भावनाओं की कद्र नहीं है।

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  2. आपकी अति उत्तम रचना कल के साप्ताहिक चर्चा मंच पर सुशोभित हो रही है । कल (27-12-20210) के चर्चा मंच पर आकर अपने विचारों से अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

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