गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

राजीव श्रीवास्तवा की कविता - माँ का संदूक !






छुटपन से ही मैं ये देख रहा था, 
माँ ने अपने पास एक संदूक रखा था !

अपने कमरे में बिस्तर के नीचे रखती थी ,
मैं पूछता था तो हँस के टाल देती थी !

मेरे बाल मन में कई सारे ख़याल आते थे ,
जो मुझे अक्सर बेचैन कर जाते थे !

सोचता था माँ ने इसमें ढेरो पैसे बचाए होंगे ,
मुझे देने ना पड़े इसलिए मुझसे छुपाए होंगे !

समय के साथ मैं बड़ा ,और माँ बूढ़ी हो गयी ,
मेरी जिज्ञासा भी मेरे साथ बड़ी हो गयी !

संदूक को लेकर तरह-तरह के ख्याल मन मैं आते थे ,
कभी-कभी तो मुझे सोती रातों से जगाते थे !

एक दिन मैंने संदूक खोला तो आँखें भर आई थी ,
माँ ने उसमें मेरी बचपन की यादें संजोई थी !

मेरी निक्कर,टूटे खीलौने, धूप वाला चश्मा भी संभाला था ,
और वो प्लेट के टुकड़े,जिसे मैंने ही हवा में उछाला था !

बचपन की तस्वीरें, और वो बल्ला जो मैंने जीता था ,
और वो कार्टून वाला गिलास जिसमे मैं दूध पीता था !

यहाँ तक की मेरा एक टूटा दाँत भी रखा था ,
और वो हाथों से बनाया कार्ड,जिसमे मैंने "प्यारी माँ" लिखा था !

अपने बचपन की चीज़ें देख कर मेरी आँखें भर आई ,
उस दिन समझ पाया मैं माँ के प्यार की गहराई !

अहसास हुआ जो मेरे लिए कभी बस एक पल था ,
वो मेरी माँ का अनमोल खजाना था, सुनहरा कल था !

जब मेरी चीज़ें मुझे मेरे बचपन की याद दिला रही थी ,
माँ मेरे पीछे ही खड़ी थी, और वो मुस्कुरा रही थी !
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                                                दूरियाँ (जगह की और दिलों की) !

दूरियाँ जगह की 
कम हो जाती है 
कुछ कदम चलने से, 
दूरियाँ दिलों की 
सारी उम्र चलने से भी 
घटती नहीं! 

दूरियाँ जगह की 
बढ़ा देती है प्यार 
और तड़प मिलने की, 
दूरियाँ दिलों की 
बढ़ा देती है रंजिश 
और आग प्रतिशोध की! 

दूरियाँ जगह की 
बढ़ा देती हैं 
दिलो में मोहब्बत को, 
दूरियाँ दिलों की 
जगह देती हैं 
सोच में नफ़रत को! 



दूरियाँ जगह की 
रिश्तो को मजबूत 
कर हेती है, 
दूरियाँ दिलों की 
रिश्तो को मजबूर 
कर हेती है! 

दूरियाँ जगह की 
मिट जाती हैं 
बस मिलन की चाहत से, 
दूरियाँ दिलों की 
मिटा देती है 
मिलन की चाहत को ही ! 
 




डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा 


1 blogger-facebook:

  1. मां का सन्दूक ,बहुत ही भाव पूर्ण कविता है , मन के कोनों को कुरेदती है , बधाई।

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