शनिवार, 25 दिसंबर 2010

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : जाते वर्ष की यादें

यशवन्त कोठारी (Custom)

जाता हुआ बरस बहुत सी यादें छोड़ कर जा रहा है। सरकार ने नित नये घोटाले दिये, और सब कुछ बस ऐसे ही चलता रहा। सरकार है यह अहसास भी खतम हो गया। आन्‍दोलनों, घोटालों हड़तालों से बचे तो टेप-काण्‍डों में उलझ गये। पी․ए․सी․ से बचे तो जे․पी․सी में फंसो। दोनों से बचो तो विकीलीक्‍स में उलझो। बेचारी सरकार भी क्‍या करें। युवा लोग नौकरियों को तरसते रहे। राजपथ की रोशनी में अन्‍धेरों की पगडंडियां ढूंढते ढूंढते आम आदमी खो गया। बचपन खो गया। कामनवेल्‍थ में कुछ पदक आये, मगर भ्रष्टाचार के पदकों के सामने सोने, चांदी के तमगे बौने सिद्ध हो गये। नीरा राडि़या, प्रभु चावला, वीर सांघवी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में नयी संभावनाओं की खोज की। टाटा तक के दामन में दाग लग गये। दामन किसी का भी उजला नहीं या बचा।

फोन टेपिंग से देश में खूब हल्‍ला मचा। मगर क्‍या किसी सामान्‍य व्‍यक्‍ति को लाभ मिला। साल गुजर रहा है और महंगाई बढ़ रही है। मानसून खूब आया जम कर बरसा मगर सड़कों पर गड्‌ढे ऐसे ही बने रहे सरकार ने मानसून, मावट की चर्चा की, मगर अफसरों के कानों पर जूं नहीं रेंगी वे वैसे ही सफेद हाथी बने रहे। कानून का मखौल पूरे वर्ष उड़ाया जाता रहा। अफसरों, व्‍यापारियों और नेताओं ने मिल कर देश को लूटना जारी रखा। यदि दो व्‍यक्‍तियों की फोन पर वार्ता से ऐसा हो सकता है तो देश में साठ करोड़ मोबाइल फोन है पता नहीं क्‍या होगा।

पत्रकार एक दूसरे से पूछते है, तुम्‍हें राडिया का फोन आया क्‍या ? अफसर एक दूसरे से फोन पर बात करने में शरमा रहे है। उद्योगपति सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगा रहे है, हमें बचाओ ये तो निजी वार्ता है। मैं किसी को रिश्‍वत नहीं देता कहने वाले बगलें झांक रहे हैं।

जाता वर्ष बहुत याद आ रहा है अकादमियों को अध्‍यक्ष नहीं मिले। मेले खूब लगे। अधिकारियों की पत्‍नियों, प्रेमिकाओं, सालियों ने खूब मजे लिये। पुस्‍तक मेलों में पुस्‍तकों से ज्‍यादा पकोड़ियां बिकीं। कला मेलों में कला से ज्‍यादा कलाकार बिके। आकाशवाणी-दूरदर्शन पर ऐसे लोगों ने बहस में हिस्‍सा लिया जिनका विषय से कोई सरोकार नहीं था वर्ष बीत गया है, मगर यादें अभी भी चल रही है। सफलता के शॉर्ट कट की तलाश जारी है।

खुली अर्थ व्‍यवस्‍था के बन्‍द परिणाम आने लग गये है। सत्‍ता के शीर्ष पर भी थकान आ गई है, वर्ष ने बहुत कुछ देखा-भुगता। आगे भी यही हाल रहेगा। मीडिया ने बड़ा विकास किया। पेडन्‍यूज से आगे बढ़कर मीडिया ने राडिया को काम के साधन उपलब्‍ध करवाये। एक नई सामाजिक आर्थिक क्रान्‍ति का बिगुल बजा। देश बनाना रिपब्‍लिक बना। देश का भविष्य क्रोनी केपिटेलिज्‍म की गिरफ्‌त में आ गया। दो हजार दस चला गया। और मैं गा रहा हूँ कान्‍दे ने रुला दिया रे। लहसुन ने हृदय की धड़कनें बढ़ा दी रे, चीनी ने उच्‍च रक्‍तचाप दे दिया रे। 'कान्‍दा रुला रहा है, लहसुन चिढ़ा रहा है, और नीरा और नीरो बंसरी बजा रहे है। नया वर्ष शुभ हो। और सबको हंसायें।

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यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर-302002 फोनः-2670596

ykkothari3@gmail.com

2 blogger-facebook:

  1. नया साल शुभ हो यहीकामना है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. कान्‍दा रुला रहा है, लहसुन चिढ़ा रहा है, और नीरा और नीरो बंसरी बजा रहे है। नया वर्ष शुभ हो। और सबको हंसायें।

    सटीक व्यंग्य!!

    कोठारी जी,

    नव-वर्ष पर नव-संकल्प की शुभकाम्नाएँ!!

    उत्तर देंहटाएं

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