सोमवार, 13 दिसंबर 2010

रामदीन की कविता : फ़ौजी

‘‘अर्थ सत्‍य''

फौजी'

थे कच्‍चे घर कच्‍चे पनघट घने नीम औ बेर

बौराई अमराई मधुबन सजकर खिला कनेर

 

उपजा धरती पुत्र वहॉ पर निज दादा के गांव

घर परिवार में बजी बधाई मिली धूप को छांव

 

खूब हँसी थी भारतमाता देव बहुत मुसकाये

होकर बड़ा बनेगा फौजी दादा जी हरसाये

 

हो गया भरती लाम में जाकर ठीक ठाक थी कद काठी

घर परिवार सभी गदगद भये मिली अंधे को लाठी

 

बूढ़ा बाप रह गया घर में भू हथियायी औरों ने

मांगी छुट्‌टी ले ली चिट्‌टी हुआ सामना गैरों से

 

जिला कलक्‍टर के दफ्‍तर में पहुँचा फौजी वर्दी में

बहुत हुआ लाचार वहाँ पर देख व्‍यवस्‍था सर्दी में

 

खबर मिली छिड़ गया कारगिल तुरतै पहुँचा सरहद पर

भूखे रहकर दस को मारा रहा न दुश्‍मन सरहद पर

 

एक हाथ से लड़ते लड़ते धरती हो गयी लाल

नीचे बरफ गला गई उसके ऊपर उड़ा गुलाल

 

भारत माता की जय करते सोया माँ का लाल

जीत लिया रण मर कर उसने, रहा न कोई मलाल

 

कष्‍ट हरेंगे बलिदानों के बनी योजना सरकारी

देंगे घर आदर्श बनाकर गुजर करेंगे परिवारी

 

सुनी एक थी बनी योजना कारगिल के बलिदानी की

पता नहीं क्‍यों जल गई होली विधवा के अरमानों की

 

हरे हो गये घाव दुबारा आया बनकर बड़ा घोटाला

कर बैठा बेदर्द जमाना एक बड़ा आदर्श घोटाला

 

उसके बच्‍चे तड़प रहे घूरे पर बनी झोपड़ी में

ठाठ करें वे महलों में ज्‍यों भूसा भरा खोपड़ी में

 

लगता है जल्‍दी ही अब वह दिन धरती पर आयेगा

सब कर्मों का ब्‍याज सहित जब मूल वसूला जायेगा।

---

-रामदीन

जे-431, इन्‍द्रलोक कालोनी

कृष्‍णा नगर, कानपुर रोड, लखनऊ

2 blogger-facebook:

  1. आपकी कविता का विषय हमारी संवेदनहीनता या यूँ कहें कि घोर नीचता को इंगित करता है ......किसी भी देश के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती है ! नफ़रत होती होती ऐसे लोगों से .....आपने आवाज़ उठायी ....पर इनकी तो आँखों का...दिल का...दिमाग का ...सब जगह का पानी बिक चुका है ......फिर भी लिखते रहिये ......इसका भी कोई कम महत्त्व नहीं.

    उत्तर देंहटाएं
  2. समसामयिक सुन्दर रचना बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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