शनिवार, 8 जनवरी 2011

श्याम नरायण ’कुन्दन’ की कहानी - अंदेशा

andesha

’क्या नाम है तुम्हारा?’
’तौसिफ सत्यमित्रम् ।’
’और आपका?’
’सुधीर प्रताप सिंह।’
’कहाँ के हो तुम?’
’बनारस का।’
’और आप?’
’पटना का।’
’वैसे जाति क्या है तुम्हारी?’
’मनुष्य’
’अरे यार वह तो मैं भी जानता हूँ कि तुम मनुष्य हो। लेकिन यहाँ जाति से मेरा तात्पर्य
तुम्हारी उपजाति जानने से था, जैसे मेरी उपजाति क्षत्रिय है।’
’चमार हूँ मैं।’
’थैंक्स गाड! तुम हिन्दू हो।’
’हाँ’
’लेकिन मैं तो तुमको कुछ और ही समझ रहा था।’
’ क्या समझ रहे थे?’
’मुस्लिम’
’क्यों समझ रहे थे?’
’क्योंकि तुम्हारा हाव-भाव , पहनावा और बोलने का अन्दाज बिल्कुल मुस्लिमों जैसा है।
तुम मुस्लिमों जैसे ही गोरे चिट्ठे और स्मार्ट हो।’
अवसर था दो अपरचित छात्रों के परस्पर परिचय का, जो अपने घर से हजारों किलोमीटर
दूर दिल्ली के एक इलाके में किराए के कमरे में रहकर प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने जा रहे
थे।
’अच्छा हुआ तुम हिन्दू निकल गए .....नहीं तो......।’ सुधीर ने थोड़ी देर बाद फिर कुछ
कहना चाहा लेकिन अपनी बात को अधूरी छोड़ दिया।
’नहीं तो ............।’ तौसिफ ने उत्सुकतावश पूछा।
’नहीं तो मैं एक मुस्लिम के साथ नहीं रह पाता।
’नहीं रह पाते, मगर क्यों ?’
’क्योकि मुस्लिम हर दृष्टि से गलत और गंदे होते हैं।’
’अगर मुस्लिम हर दृष्टि से गलत और गंदे हैं, तो हिन्दू भी उनसे कम गलत और गंदे कहाँ
हैं?’
’अगर हिन्दू गलत और गंदे हैं भी तो क्या हुआ। वे अपने हैं। अपने देश के हैं।’
’तो क्या मुस्लिम अपने और अपने देश के नहीं हैं ?’
’नहीं, वे विदेशी हैं। लुटेरे और तुर्क हैं।’
’इस दृष्टि से तो हिन्दू भी विदेशी हैं। डकैत और आर्य हैं।’
’मुसलमानों ने हमारे मंदिरों को तोड़ा। बेगुनाहों का खुलेयाम कत्लेयाम करवाया। उन्होंने हमारे
देवी-देवताओं की मुर्तियों को मस्जिदों के सीढ़ियों पर चुनवाकर हमारे धर्म को पददलित किया।’
मुसलमानों ने तो हिन्दूओं के देवी देवताओं और मंदिरों को तोड़कर छोड़ दिया। लेकिन उनके
पूर्वज आर्यो ने तो अनार्यों की समस्त सभ्यता को ही नष्ट कर दिया।’
मुसलमान आतातायी हैं। आतंकवादी हैं। मानवता के दुश्मन हैं। वे कभी देशभक्त और
राष्ट्रभक्त नहीं हो सकते। वे जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं। उन्हें कितना भी छूट दे
दिया जाय वे कभी एहसानमंद नहीं हो सकते। वे एहसान फरामोश होते हैं। मुसलमान हमेशा से
तैमूरलंग, चंगेज और गजनवी रहा है जबकि हिन्दू सदियों से बुद्ध, राम और गाँधी रहा है।’
इतना कहते-कहते सुधीर अपनी चारपाई से उठ खड़ा हुआ। उसके नथूने गुस्से के मारे
फड़कने लगे। और वह मारे उत्तेजना के हाथ फेर-फेरकर चिल्लाने लगा।
अब इसके आगे कुछ भी बोलना तौसीफ के सेहत के लिए ठीक नहीं था। वह जान गया कि
अब अगर वह कुछ भी बोला तो सुधीर का अगला जवाब कुछ इस प्रकार होगा -’चूप बे साले
चमाड़िए कहीं के, नहीं तो मार- मारकर हड्डी पसली एक कर दूँगा।’
इसलिए वह बिना किसी प्रतिक्रिया के दरवाजा खोलकर बाहर छत पर निकल आया।
गर्मी की उमस भरी शाम थी और दिल्ली भार रही थी। सुधीर आगे बढ़कर रेलिंग के सहारे
खड़ा हो गया। वह वहाँ से पूरी दिल्ली को देख सकता था। लेकिन वह दिल्ली की चकाचौंध से दूर
भण्डार कोण की दिशा की ओर देख रहा था जहाँ से भयंकर तूफान उठने का अंदेशा था।
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SHYAM NARAIN 'KUNDAN'

102-O- MH-E

UNIVERSITY OF HYDERABAD

GACHI BOWLI

HYDERABAD-500046

PH- 09640375758

email- shyam.kundan@gmail.com

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