श्याम नरायण ’कुन्दन’ की कहानियाँ

SHARE:

  कहानी स्वप्न उस दिन सुना वह चली गई। जाना तो उसका तय था पर वह ऐसे चली जाएगी मैंने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था। दरअसल मैं उससे प्रे...

 

कहानी

स्वप्न

swapna

उस दिन सुना वह चली गई। जाना तो उसका तय था पर वह ऐसे चली

जाएगी मैंने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था।

दरअसल मैं उससे प्रेम करता था और वह भी मुझसे उतना ही प्रेम करती थी।

यह प्रेम क्या है, क्यों, है, किसलिए है? क्यों सारी दुनिया में कोई व्यक्ति किसी

एक ही व्यक्ति पर केन्द्रित हो जाता है? क्यों उसे ब्रह्म बनाकर पूजने लगता है? उसके

क्षणिक दीदार के लिए तड़पता रहता है? सोते, जागते, उठते-बैठते, हर पल, हर घड़ी

उसी के बारे में सोचता रहता है?

 

यहाँ मैं इन तमाम सवालों के जवाब ढूंढ़ने जैसे पचड़े में नहीं पड़ना चाहता। मैं तो

बस यहाँ इतना ही बताना चाहता हूँ कि मैं उससे बहुत प्रेम करता था। इतना कि उसके

एक इशारे पर हलाहल विष का प्याला पी सकता था। बहुमंजिली इमारत से छलांग

लगा सकता था। सारी दुनिया से बगावत कर सकता था। माँ-बाप, भाई-बहन,

नाते-रिश्तेदार, समाज सभी से पर उसने मेरे साथ दगा किया और मेरी जिन्दगी से

सदा के लिए दूर चली गई। सबसे बड़ी बात उसने मुझे इसका कारण भी बताना उचित

नहीं समझा। हाय ! वह इतनी बेदर्द बन गई, कैसे? यह जानते हुए भी कि मैं उसके

बिना जिंदा नहीं रह सकता और अगर जिंदा रह भी गया तो मेरी बाकी की जिन्दगी

मौत से भी बदतर होगी।

 

हाँ उसने तनिक भी इस पर विचार नहीं किया। न ही मुझ पर दया ही की। अरे कम

से कम एक प्रेमी के नाते न सही एक दोस्त या मानवता के नाते तो कुछ बताया होता

पर नहीं....कुछ भी नहीं और मुझे अपनी जिन्दगी से ऐसे निकाल फेंका जैसे कोई दूध में

पड़ी हुई मक्खी को निकाल फेंकता है।

 

ऐसे में मैं भला सामान्य कैसे रह पाता ? मेरी हालत पागलों सी हो गई। सारी

दुनिया से जैसे नफरत सी हो गई मुझे। सच मैं अपने आपको मिटा देना चाहता था।

इसके लिए मैंने हर सम्भव कोशिश भी की पर हर बार निगोड़ी मौत धोखा दे गई। तब

समझ में आया कि इस बेदर्द दुनिया में जीना जितना मुश्किल है, मर जाना उससे कम

मुश्किल नहीं है।

 

उसके बाद तो न मुझे खाने की सूध रही न सोने की। कुछ भी पहन लेता और

कहीं भी पड़ जाता जब तक कि मुझे कोई आकर दुत्कार नहीं देता।

कभी-कभी तो मैं अपने आप को कमरे में बन्द कर लेता और कई-कई दिनों तक

बिना खाए-पिए उसकी तस्वीर के सामने बैठा रोता रहता। उन चीजों को छू-छूकर

देखता रहता जिसे कभी उसने यानी कि मेरी तथाकथित प्रेमिका ने छुआ या उपयोग

किया था। खासकर उस आदमकद आइने को जिसके सामने वह अक्सर खड़ी हो जाती

और विभिन्न कोणों से अपने आप को निहारा करती।

 

मेरे मित्र और मेरे चाहने वाले मुझे समझा-समझाकर हार चुके थे। उनका कहना

था कि मैं उसे भूल जाऊँ। उन्होंने मेरे अन्दर उसके प्रति नफरत और घृणा पैदा करने

की भरसक कोशिश भी की पर भला आज तक कोई अपने ईश्वर से घृणा कर पाया है

जो मैं करता। हाँ वह मेरी ईश्वर थी। उसका स्थान तो मेरे मन-मंदिर में था। मैं उसके

लिए मिट सकता था, मर सकता था, पर उससे घृणा ....ना बाबा ना.....कदापि नहीं।

वह मेरी जिन्दगी में कैसे आई, क्यों आई, कहाँ से आई, इसकी भी अपनी एक

लम्बी कहानी है। यहाँ मेरे पास इस सम्बन्ध में विस्तार से बताने के लिए न तो समय है

और न ही धैर्य ही पर इतना अवश्य बताना चाहूँगा कि उसकी और मेरी पहली मुलाकात

तब हुई थी जब वह किराएदार के रूप में मेरे बगल वाले कमरे में रहने के लिए आई।

शायद यह अदृश्य सत्ता द्वारा नवनिर्मित हमारे लिए एक सुखद संयोग था। मतलब साफ

है हमारे बीच प्रेम होना था और वह हो गया और हमने एक दूसरे के साथ जीने-मरने

की न जाने कितनी ही कसमें खाईं।

 

वह दिल्ली के एक क्षेत्रीय टीवी चैनल में रिपोर्टर थी और मैं एक प्रतिष्ठित

चित्रकार। उसका काम था लोगों के सामने सच्ची खबरें भेजना और मेरा दुनिया की

सच्ची तस्वीर को उजागर कर समाज में सुव्यवस्था लाना। यानि समाज सेवा के इस

पावन पथ पर भी हम एक दूसरे के साथ कहीं न कहीं अवश्य जुड़ते थे।

पर इतना ही होता तो शायद मैं उसको अपने मन-मंदिर में बैठाकर भगवान का

दर्जा नहीं दे पाता। दरअसल उसमें कुछ बात ही ऐसी थी जिसके कारण मैं उसके

सामने झुकने के लिए मजबूर हो जाता था। मसलन जीवन और जगत के सम्बन्ध में

उसकी गहरी समझ, सामाजिक रूढ़ियों के प्रति विद्रोह, जिन्दगी को अपनी शर्तों पर

भरपूर जी लेने की आकांक्षा, आदि। स्त्रियों की स्वतन्त्रता के प्रति तो वह इस कदर

आग्रही थी कि समाज और संस्कार को कूड़े में डालने वाली चीजें कहने से भी बाज

नहीं आती थी। अपने स्तर पर वह इसके लिए संघर्ष भी करती थी। दूसरी तरफ मैं

संस्कारों और अपने प्राचीन मूल्यों में अगाध आस्था रखते हुए भी उसके इस तरह के

विद्रोही विचारों का कड़ा विरोध नहीं कर पाता था। शायद यह सब उसके प्रति मेरे

अतिशय प्रेम के कारण रहा होगा।

 

पर इस कदर टूट कर प्यार करने के बावजूद भी वह मुझे छोड़कर चली गई। मेरा३

प्यार उसके इंसाफ के तराजू पर हल्का तूल गया। हाय ! मेरी जिन्दगी मुझसे रूठ गई

और मैं कुछ भी नहीं कर पाया। इस घटना के बाद तो जैसे मेरे ऊपर पहाड़ ही टूट

पड़ा। निष्ठुर लोग मेरी इस हालत पर तरस खाने की बजाय फब्तियाँ कसने लगे।

उनकी बातें मेरे हृदय में चूभ-चूभ जाती थी। मैं पत्थरों पर अपना सिर पटकता था और

अकेला पाकर खूब रो लेता था।

 

मैं उसे कहाँ-कहाँ नहीं ढूंढ़ा। उन टीवी चैनल वालों से पूछा जहाँ वह काम करती

थी। उसके उन समस्त मित्रों, परिचितों से मिला जिनसे वह कभी मिलती थी, बात

करती थी। यही नहीं मैं उसके घर तक गया। उसके माँ-बाप से मिलकर सारी बातें

बताई पर मुझे उसकी कहीं कोई सुराग नहीं मिली।

 

ऐसे ही लगभग छः सालों तक मैं उसे एक जगह से दूसरी जगह पागलों की भाँति

ढूंढ़ता भटकता रहा। तब तक मेरी हालत अर्द्धविक्षिप्तों वाली हो चुकी थी। घर परिवार

से नाता टूट चुका था और मित्र या परिचित मुझे पागल या दिवालिया घोषित करके

मुझसे किनारा कर चुके थे लेकिन तब भी मैंने आशा नहीं छोड़ी थी। पता नहीं क्यों मुझे

लग रहा था कि एक न एक दिन मैं उसे अवश्य ढ़ूंढ़ निकालूँगा। अपने इस अटूट

विश्वास के कारण ही मैं उन दिनों हिमालय की तराई में भटक रहा था। मुझे कहीं से

खबर मिली थी उसको यानि कि मेरी प्रेमिका को अन्तिम बार किसी अज्ञात व्यक्ति के

साथ इसी क्षेत्र में देखा गया है।

 

यह सब कुछ मेरे लिए बड़ा ही चुनौती भरा था। दिन भर उबड़-खाबड़ रास्तों पर

चलता था और रात को कोइ भी सुरक्षित जगह तलाश कर सो जाता था।

उस रात भी मैं एक अस्पताल के अहाते में विश्राम कर रहा था ताकि अगली सुबह

फिर नई ऊर्जा के साथ अपने गन्तव्य की ओर आगे बढ़ सकूँ। उस अहाते में मेरे अलावा

कुछ पेशेवर भिखमंगे, लूले-लंगड़े और कोढ़ी भी सोए हुए थे। वहाँ से थोड़ी ही दूरी पर

बाई तरफ अस्पताल की मुख्य बिल्डिंग थी जिसमें कुछ मरीज और डॉक्टर इधर-उधर

टहलते हुए दीख जाते थे।

 

गर्मी का मौसम था और रात अधिया गई थी। मेरी नजर उस समय आकाश में टगें

हुए सितारों पर अटकी हुई थी। मैं प्रकृति के उस अद्भुत नजारे पर अभिभूत हो रहा

था। मेरे अन्दर द्वन्द्व चल रहा था कि जो ईश्वर इतने विशाल ब्रह्माण्ड की रचना कर

सकता है वह मेरी खोई हुई जिन्दगी यानी कि मेरी प्रेयसी को मेरे दामन में क्यों नहीं

डाल सकता? इसके लिए मैं मन ही मन ईश्वर को उलाहना दे रहा था, कोस रहा था।

ठीक उसी समय मैंने अस्पताल के अन्दर से दो व्यक्तियों को बाहर निकलते हुए

देखा। वे आगे बढ़कर हमारे पास ही खड़े हो गए। मैं डर गया। लगा वे दुत्कार कर हमें

हास्पिटल से बाहर निकाल देंगे पर यह अच्छी बात थी कि उनका ध्यान हमारी ओर४

नहीं गया। मैं दम साधे चुपचाप पड़ा रहा। शायद वे किसी स्त्री के सम्बन्ध में बात कर

रहे थे जिसकी अभी थोड़ी देर पहले ही मृत्यु हो गई थी। मैं ध्यान लगाकर उनकी बात

को सुनने की कोशिश करने लगा।

 

’क्या नाम बता रहे थे तुम उस स्त्री का?’ उनमें से एक व्यक्ति ने दूसरे से पूछा।

’रागिनी’ दूसरे ने जवाब दिया।

रागिनी नाम सुनकर मैं थोड़ा चौकन्ना हो गया।

’उसका कोई पता ठिकाना?’

 

’यही तो रोना है सर कि वह औरत वर्षों से हमारे अस्पताल में पड़ी हुई थी लेकिन

अपने बारे में किसी से कुछ भी नहीं बताया। कहती थी उसका इस दुनिया में कोई नहीं

है। वह अनाथ और अभागन है।’

 

’उसका कोई सामान वगैरह?’

’कुछ नहीं सर, सिवाय एक पत्र के जिसे उसने अपनी मृत्यु के कुछ घण्टों पहले

ही लिखा था।’

’कहाँ है वह पत्र?

’अन्दर आलमारी में।’

’पत्र किसके नाम से है?’

 

’शायद किसी प्रशांत के नाम से है, जो इस समय दिल्ली में रहता है।’

अपना नाम सुनते ही जैसे मेरे अन्दर हाहाकार मच गया। लगा मेरा कलेजा फट

जाएगा। साँसे रूक जाएँगी और मेरी रही-सही जिन्दगी भी खत्म हो जाएगी।

’ओय साहब जी..... प्रशांत मैं ही हूँ...मैं ही..।’ एकाएक मैं चीखा।

लम्बा कद, चिथड़े कपड़े, छाती तक बढ़ आई दाढ़ी और मूँछें, लटियाए लम्बे

बाल, भयानक शक्ल-सूरत वाले मेरे जैसे व्यक्ति को इस तरह चीखते-चिल्लाते देख एक

पल के लिए तो वे दोनों व्यक्ति डर गए पर दूसरे ही पल मुझे पागल समझकर

सुरक्षाकर्मी को आवाज देने लगे। बिगड़ती बात देख मैं उनके पैरों में जा गिरा।

लगभग आधे घण्टे तक मैं उनके सामने रोया, गिड़गिड़ाया, अपने प्रशांत होने का

सबूत दिया। तब जाकर मुझे रागिनी की लाश को देखने का मौका मिला।

 

उस पल मेरी प्रिया की लाश मेरी आँखों के सामने पड़ी थी। यानी कि वह मर चुकी

थी। हाय ! जिसे मैं ईश्वर समझता था वह ईश्वर में विलीन हो गई। हमारी दुनिया

छोड़कर दूसरी दुनिया में चली गई। एक ऐसी दुनिया में जहाँ कोई भी जीवित व्यक्ति

नहीं जा सकता था।

 

मैं उसे एकटक देख रहा था और बिलख रहा था- ’हतभाग्य मेरी जिन्दगी, यह

तुम्हें क्या हो गया? मुझे तो अब भी विश्वास नहीं हो रहा है कि तुम इस दुनिया में नहीं

रही। हाय ! तुम्हें मैंने कहाँ-कहाँ नहीं ढूंढ़ा पर तुम यहाँ, इतनी दूर....। आह ! तुम्हारा

सूरज सा चमकता चेहरा आज मुरझा क्यों गया? प्यार का अमृत बरसाने वाली तुम्हारी

बड़ी-बड़ी आँखें आज बन्द क्यों हैं? कहो, प्रिये। अरे कुछ तो बोलो। डरो नहीं। मैं यहाँ

तुम्हारी बेवफाई का कारण पूछने नहीं आया हूँ। न ही तुम्हें इस कदर टूटकर प्यार

करने का हिसाब माँगने आया हूँ। मैं तो बस तुम्हें एक नजर देखना भर चाहता था।

फूलों की पंखुड़ियों सदृश्य तुम्हारे होंठों से अपने लिए कुछ शब्द सुनना चाहता था।’

’देखिए भाई साहब, मुर्दे बोला नहीं करते। सम्भालिए अपने आप को।’ पास ही

खड़े डॉक्टर ने मुझे टोका।

 

’प्रशांत जी यह रहा वह पत्र जिसे हमें आप तक पहुँचाने के लिए कहा गया था।’

थोड़ी देर बाद दूसरे डॉक्टर ने मेरे हाथ में एक लिफाफा थमाते हुए कहा।

लिफाफा लेकर सबसे पहले तो मैं उसे उलट-पलटकर देखा। फिर उन अक्षरों को

स्पर्श करके देखा जिन्हें रागिनी ने अपने हाथों से लिखा था। पत्र में लिखा था-

 

’ओह प्रशांत !

जब तक यह पत्र तुम्हारे हाथों में होगा तब तक मैं इस दुनिया से कूच कर चुकी

हूँगी। चलो, एक अर्थ में यह मेरे लिए अच्छा ही होगा क्योंकि आज मैं जो कुछ तुम्हें इस

पत्र के माध्यम से बताने जा रही हूँ उसे शायद मैं जिन्दा रहते कभी न बता पाती।

हाँ प्रशांत, मैं इस दुनिया में एक ऐसी गंदी मिसाल छोड़कर जा रही हूँ जिस पर

जितनी थू-थू हो कम होगा। ओह ! कितनी गलत थी मैं .....सोचती थी जो मैं सोचती

हूँ, करती हूँ वही सत्य है और बाकी सब झूठ। यह सब कुछ मेरे अन्दर कहाँ से आया

प्रशांत ! क्या तुम सोच सकोगे ? ओह तुम हमेशा मुझे अमृत देते रहे और मैं .....।

जानते हो प्रशांत, मुझे इस बात का दुख नहीं है कि आज मैं इस स्थिति में हूँ।

 

मुझे एड्स का रोग हो गया है और मैं तिल-तिल मर रही हूँ बल्कि दुख इस बात का है

कि मैंने तुम्हें धोखा दिया। तुम्हारे साथ विश्वासघात किया और उस पुरूष के साथ सोई

जो तुमसे रूतबे में, धन-दौलत में, हर चीज में आगे था। यह जानते हुए भी कि तुम

मुझे पागलों की तरह प्यार करते हो। तुम्हारी हर साँस में, हर धड़कन में सिर्फ मेरा ही

नाम है।

 

खैर छोड़ो, अब इन बातों को दोहराने से क्या फायदा। कहा जाता है न कि जो

जैसा करता है उसे इस संसार में वैसा ही भरना पड़ता है। तब मैं सोचती थी यह सब

बकवास है, झूठ है पर आज ......हाँ प्रशान्त आज मैं अपने इसी पाप की कीमत वसूल

रही हूँ।

प्रशान्त, मैं अभागिन थी जो तुम्हारे प्यार के काबिल न बन सकी। उल्टे तुम्हें दुःख

ही दुःख दिया हैं मैंने। इसलिए तुम मुझे कभी माफ मत करना। हमेंशा घृणा करना,

घृणा। तभी मेरी आत्मा को शांति मिलेगी।’

’तुम्हारी अभागिन’

’रागिनी’

 

पत्र समाप्त होते ही मैं बेसुध होकर नीचे गिर पड़ा था।

---------

लघु कथा

प्रवृत्ति

 

एक शाम मैं अपने विश्वविद्यालय के सबसे हाट प्लेस शाप-कॉम में टहल रहा था। मौसम

खुशगवार था और मेरे इर्द-गिर्द विश्वविद्यालय के छात्र और छात्राएं चाय की चुस्कियाँ लेते हुए

कहकहे लगा रहे थे।

’अरे भाई साहब.........।’ तभी एक परिचित आवाज से मैं चौका।

मैंने देखा हमारे दाई तरफ मेरे कुछ मित्र खड़े मुस्करा रहे थे। मैं कुछ कहता कि उनके बीच से

दूसरा सवाल उछला - ’ लगता है आप कुछ तलाश रहे हैं?’

’अरे नहीं-नहीं ......बस ऐसे ही...।’ मैंने सफाई दी।

’तो उधर एक टक क्या घूर रहे थे?’

’ किधर ?’

’ उधर’

उन्होंने बाई तरफ खड़े कुछ नए लड़के और लड़कियों की तरफ शरारतपूर्ण ढ़ंग से इशारा

करते हुए कहा।

’मुझे समझते देर नहीं लगी कि वे सब रंग में हैं और मेरी खिंचाई करना चाहते हैं। ऐसे में

अब मैं भी उन्हीं के स्तर पर उतर आया और बिन्दास जवाब दिया -’ भई इसमें छिपाने जैसी क्या

बात है। सभी की तरह मैं भी मनुष्य हूँ और एक मनुष्य की प्रवृत्ति है कि वह अपने विपरीत सेक्स

की तरफ ही आकर्षित होता है।’

’लेकिन भाई साहब, आज मनुष्य की प्रवृत्ति काफी हद तक बदल चुकी है। न्यायालय ने भी

आज ३७७ की धारा को समाप्त करके इसे मान्यता प्रदान कर दी है। ऐसे में हम लोग यह कैसे

अन्दाजा लगा सकते हैं कि उन सामने के लड़के और लड़कियों में विपरीत सेक्स से आप का क्या

मतलब है। क्या आप इसका खुलासा करने का कष्ट करेंगे ?’

मैं उनके इस दिल्लगी पर अवाक रह गया।

----------------

SHYAM NARAIN 'KUNDAN'

102-O-NRS, HOSTEL

UNIVERSITY OF HYDERABAD

GACHI BOWLI

HYDERABAD-500046

PH-09640375758

email-shyam.kundan@gmail.com

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: श्याम नरायण ’कुन्दन’ की कहानियाँ
श्याम नरायण ’कुन्दन’ की कहानियाँ
http://lh4.ggpht.com/_t-eJZb6SGWU/TSgSRTiOQiI/AAAAAAAAJY8/jKYfujfUN4Y/swapna%5B3%5D.jpg?imgmax=800
http://lh4.ggpht.com/_t-eJZb6SGWU/TSgSRTiOQiI/AAAAAAAAJY8/jKYfujfUN4Y/s72-c/swapna%5B3%5D.jpg?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2011/01/blog-post_9334.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2011/01/blog-post_9334.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content