शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य : आओ प्रेम करें

विश्‍व में जो नारे सर्वाधिक प्रचलित हैं, उनमें से एक है-प्रेम करें। युद्ध नहीं। मैं भी प्रेम ही करना चाहता हूं। वास्‍तव में जब समय काफी हो और करने को कुछ न हो तो आदमी को एक दो प्रेम कर लेने चाहिए। प्रेम कर लेने से व्‍यक्‍ति व्‍यस्‍त हो जाता है। स्‍मार्ट रहता है, समय आराम से कट जाता है और सबसे ऊपर वह जवान रहता है और युद्ध करने की जरूरत नहीं पड़ती । वैसे तो प्रेम और युद्ध में सब कुछ जायज है, मगर जब युद्ध करना ही नहीं है तो केवल प्रेम ही बच जाता है।

आखिर आदमी कहां करे प्रेम। कहीं भी किया जा सकता है प्रेम । लोग फूलों से प्रेम करते हैं, काम से प्रेम करते हैं, पुस्‍तकों से प्रेम करते हैं बल्‍कि डॉक्‍टर रोगी से प्रेम करता है। वकील मुवक्‍किल से प्रेम करता है। व्‍यापारी ग्राहक से प्रेम करता है। अफसर नेता से प्रेम करता है और नेता देश से प्रेम करता है । लेकिन प्रेम के ये विभिन्‍न प्रकार उस महान प्रेम के बिल्‍कुल अलग हैं जो दो युवा दिल आपस में करते हैं। अनुभव की आग और युवा धड़कन मिल कर जो प्रेम करती है, वही है सृष्‍टि का असली सौंदर्य।

जब करने को कुछ न हो तो यारों प्रेम करो। हर गली, मोहल्‍ले, नुक्‍कड़ पर रोड़ रोमियो घूम रहे हैं। एक प्रश्‍न अक्‍सर पूछा जाता है-कहां करें प्रेम ? मैं पूरे आत्‍म विश्‍वास से उत्त्‍ार देता हूं-प्‍यारों बागों में, बगीचों में, खण्‍डहरों में, ऐतिहासिक इमारतों में, पुरानी हवेलियों में, किलो में, होटलों में, फार्म हाउसों में, रिसोर्टों में, हिल स्‍टेशनों में, मैदानों में, पठारों पर, कहीं भी किया जा सकता है प्रेम। प्रेम के लिए उम्र, स्‍थान कभी बाधक नहीं बनते हैं। जब जहां अवसर मिला, कर लिया प्रेम । बकौल एक लेखक के आजकल का प्रेम बस कहीं भी कभी भी किसी झाड़ी के पीछे या समन्‍दर के किनारे या पहाड़ी की तलहटी में।

प्रेम में सबसे महत्‍वपूर्ण चीज है-प्रेम पत्र । और प्रेम-पत्र लिखना कोई आसान काम नहीं है। स्‍कूल के दिनों से ही इस विधा में पारंगत हूं। एक-आध बार मुझे अन्‍य मित्रों के प्रेम-पत्र ड्राफ्‍ट करने के कारण स्‍कूल से निकाला भी गया था। मगर बन्‍दे ने प्रेक्टिस नहीं छोड़ी और आज छोटा-मोटा लेखक इसी बलबूते पर बन गया हूं। प्रेम-पत्रों की भाषा, उसे पोस्‍ट करना और जवाब पाना ये सब बड़े ही तकनीकी कार्य हैं। और तमाम वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद अभी भी इनमें बहुत रिस्‍क है। जिन-जिन को मैंने प्रेम-पत्र लिखे उन-उन ने समय रहते शादी कर ली। मेरी जोरदार कलम का कमाल कि वे सभी अब अपने नाते पोतों के साथ मस्‍त हैं और मैं अभी भी कलम घसीट रहा हूं। अपनी-अपनी किस्‍मत।

यदि आप प्रेम के क्ष्‍ेात्र में सफल होना चाहते हैं तो लगे रहिए। यदि प्रेम में सफल नहीं हुए तो क्‍या लेखक तो बन ही जायेंगे। वैसे भी अधिकांश सफल लेखक असफल प्रेमी होते हैं। आप कहें तो नाम गिनाऊं, मगर जाने दीजिए बदनामी होगी। हर युवा लाइन मारता है। कभी लाइन लग जाती है, कभी नहीं लगती। न लगे तो परवाह नहीं क्‍योंकि यह तो एक आन्‍दोलन है। सुबह से शाम तक बस लगे रहो। कभी तो लहर आयेगी। प्रेम होगा। बागों में बहार आयेगी और गुलशन में फूल मुस्‍करायेगा।

आजकल प्रेम सस्‍ता है और अन्‍य चीजें महंगी, मगर जब मैं नया-नया जवान हुआ था तो प्रेम महंगा था और अन्‍य चीजें सस्‍ती। गरीबी का आलम था, इकलौते कुर्ते और हाफ पैंट से मै काम चलाता था। आजकल प्रेम के लिए जींस, चश्‍मा, बेल्‍ट, टी-शर्ट और न जाने क्‍या-क्‍या चाहिए। उर्दू शायरी, हिन्‍दी की प्रेम कविताएं और विरह गीत मैंने खूब याद किये मगर कुछ भी काम नहीं आये। जो लेग प्रेम के क्षेत्र में सफलता अर्जित करना चाहते हैं, उनसे मेरा अनुराध है कि वे पुराने प्रेमियों से मिलें। अनुभव की उर्जा से स्‍वयं को सुसज्‍जित करें। कामदेव के प्रसंगों का अध्‍ययन करें। हो सके तो शिव-पार्वती माहात्‍म्‍य भी पढ़े फिर प्रेम के क्षेत्र में उतरें। श्रीमान्‌, क्‍योंकि प्रेम कुर्बानी मांगता है। सोहनी-महिवाल, लैला-मजनूं रेशमा-शेरा और न जाने ऐसे सैकड़ों किस्‍से जन मानस में आज भी चल रहे हैं। सच्‍चे प्रेमी को कुछ नहीं चाहिए मगर आजकल सच्‍चे प्रेमी मिलते कहां है। और जमाना उन्‍हें मिलने कहां देता है।

होता यह है कि एक प्रेम में असफल होते ही देवदास होते ही देवदास जो होता है वो किसी अन्‍य पारो के वक्‍कर में पड़ जाता है और पारों किसी अन्‍य देवदास से शादी कर लेती है। कुछ समय बाद दोनों एक दूसरे को भूल जाते हैं। आजकल कहां हैं अनारकली ओर सलीम जैसे प्रेमी।

आजकल तो भूतपूर्व प्रेमी जब भूतपूर्व प्रेमिका से मिलता है तो भूतपूर्व प्रेमिका अपने बच्‍चे से कहती है- ‘तुम्‍हारे मामा हैं, नमस्‍ते करो।' और बच्‍चा नमस्‍ते करता है। मामा बच्‍चे को चॉकलेट दिलाता है और दोनों विदा हो जाते हैं।

प्रेम में असफलता के बाद व्‍यक्‍ति कवि हो जाता है। मैं असफल नहीं रहा अतः कवि नहीं बन सका। कविता करना प्रेम करने से ज्‍यादा आसान है। या शायद नहीं या शायद हां। मैं कुछ गुमराह हो गया हूं। प्रेम में अक्‍सर ऐसा होता है। कुछ लोग होते है जो प्रेम अपनी मर्जी से करते हैं, फिर प्‍यार अपने आप हो जाता है। जबकि कई लोग पहने प्‍यार करते हैं, फिर बाद में शादी। वास्‍तव में यह एक ऐसी भूल भुलैया है कि बचना मुश्‍किल, समझना मुश्‍किल।

प्रेम और युद्ध मानवीय जीवन की सबसे महत्‍वपूर्ण उपलब्‍धि है। प्रेम करो युद्ध नहीं यारों। प्रेम ही जीवन है। प्रेम ही रस है। प्रेम ही पटरस है। प्रेम है तो किसी की आवश्‍यकता नहीं। प्रभु से प्रेम करो, स्‍वयं से प्रेम करो, पड़ोसी से प्रेम करो, बच्‍चों से प्रेम करो, जीवन से प्रेम करो, पेड़-पौधों से प्रेम करो, बस प्रेम करो। युद्ध से घृणा करो। प्रेम से प्रेम करो। आओ प्रेम करें।

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यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर

जयपुर 302002

फोन 2670596

2 blogger-facebook:

  1. shaandaar post....
    apni ye rachna rasprabha@gmail.com per parichay tasweer blog link ke saath bhejen vatvriksh ke liye

    http://urvija.parikalpnaa.com/

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