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एस के पाण्डेय की बाल कविता - पिंकी मौसी की बिल्ली

पिंकी मौसी की बिल्ली

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(१)

पिंकी मौसी बोलीं बिल्ली चलो बजार ।

बिल्ली बोली पहले पहनाओ तुम हार ।।

मौसी बोलीं हार नहीं घर के चूहे खा लेना ।

बिल्ली बोली दो पहले जो भी हो तुमको देना ।।

(२)

बिल्ली ने घर मैं जाकर चूहों को जब खा डाला ।

नानी बोलीं मौसी से तूने क्यों बिल्ली पाला ।।

नानी करतीं च्च च्च च्च खी खी खी करतीं खाला ।

उस कमरे में न जा पाई जिसमें था लटका ताला ।।

(३)

मौसी बोलीं नानी से बैठी रहती हो ले माला ।

देखो मेरी किताबों को चूहों ने कुतर डाला ।।

इनको सबक सिखाने हित मैंने है बिल्ली पाला ।

चाहो तो लटका लो तुम हर कमरे में अब ताला ।।

(४)

नानी कहती मौसी को इसने है घर को घाला ।

घर में पाप कराती है जबकि मैं जपती हूँ माला ।।

कब तक मैं लटकाऊँगी अपने कमरे में ताला ।

मामा कहते देखो बच्चों बिल्ली मौसी ने बिल्ली पाला ।।

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डॉ एस के पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.) ।

URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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2 टिप्पणियाँ

  1. मुझे यह कविता थोड़ी सी समझने में कठिन लगी, क्यूंकि यह बच्चों की कविता है तो इसको सरल होना चाहिए :)

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  2. बहुत सुन्दर.. मैं आपकी कविताओं को बच्चों को सिखाना चाहता हूँ.. आपकी अनुमति हो ...तो..

    जवाब देंहटाएं

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