शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' की कविताएँ व ग़ज़लें

महाप्राण निराला की जयन्ती पर  विशेष

जहाँ किसी को पीड़ित देखा हाथो-हाथ लिया

दीन,दुखी,बुढ़िया, भिखमंगा सबका साथ किया

 

'प्रभापूर्य, शीतलच्छाय, सांस्कृतिक सूर्य' बन

अंधकार का कठिन प्रश्न ही पहले सरल

 

रुद्र रूप था भले, किन्तु वह शांत मनस्वी-

महावीर-सा अपना सब कुछ जग के लिए दिया

 

जो कुछ बोला, लिखा सभी कुछ जग पीड़ा थी

जग के खातिर मरा और वह जग के लिए जिया

 

रहे न कोई दुखी जगत में इसीलिए,बस-

बचा हुआ था शिव से जो,वह सारा गरल पिया

 

सुख अपना औरों को बाँटा बिन माँगे ही

जहाँ मिला दुख का सौदागर अपने लिए लिया

 

'नव नभ के नव विहग वृंद' सब मौन हो गए

असमय पतझर ने वसन्त का सौरभ छीन लिया

 

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डकैत है दिल्ली

खिलन्दड़ी टिकैतों का खेत है दिल्ली

प्यासे मृग भटक रहे, रेत है दिल्ली

 

आग, धुँआ, गोले, कट्टे छुरी और बम

हाथो में थामे हुए डकैत है दिल्ली

 

राजनय, राजधानी, संसद की बोली में

हर दम सिपहसालार-सी मुस्तैद है दिल्ली

 

आयकर, बिक्री कर, और भी अनेक कर

करों की कारा में हुई कैद है दिल्ली

 

जाति, धर्म, क्षेत्रवाद कोई भी असाध्य रोग

किसिम-किसिम रोगों की बैद है दिल्ली

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चलो चलें हम पेंच लड़ाने

जर्सी पहन के सर्दी रानी

सूरज दादा के घर आईं ।

वह भी ओढ़े ठिठुर रहे थे

कोहरे वाली झक्क दुलाई।

 

बोली सर्दी सूरज से तब

हमसे तुम लगते घबराए।

चलो चलें हम अंतरिक्ष में

खूब मजे से पेंच लड़ाएँ।

 

उत्तरायण में बड़ी शान से

बगुले जैसा ध्यान लगाए।

बैठे हो तुम बड़ी देर से

किस मछली पर घात लगाए।

 

सूरज दादा चुपके-चुपके

चुटकी ले धीरे मुस्काए।

कौन मूर्ख है जो सर्दी में

छोड़ दुलाई बाहर आए।

 

सर्दी रानी तभी बिदक कर

लगीं  जोर से पंख डुलाने।

बोले डर कर सूरज दादा

चलो चलें हम पेंच लड़ाने।

 

पर इसका भी ध्यान है रखना

कहीं पेंच से तुम ना कटना।

कहीं कटें ना गले किसी के

और किसी के पाँव  फँसें ना।

 

बिना सुने कुछ सर्दी रानी

लगीं लूटने कटी पतंगें।

फँसा पाँव तो गिरीं धम्म से

दोनों घुटने-टखने फ़ूटे।

 

इसी बात से भरे क्रोध में

लगीं कोसने सर्दी रानी।

टीस भरे शब्दों में चीखीं

सुन लो, गुन लो मेरी कहानी।

 

खूनी हुई पतंगें सारी

धागे सबके सब हत्यारे।

नहीं किसी से इन्हें मुहब्बत

काँच भरे हैं दिल में सारे।

 

इन छलियों के प्रेम में  फँस कर

पागल हो-हो कर  बेचारी।

नाची-नाची घूम रही हैं

आसमान में मारी-मारी।

 

अब तो दादा हमें बचा लो

कटी पतंगें सभी उठा लो।

अब ना तुमको कभी सताऊँ

एक बार बस मुझे बचा लो।

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कविता की कल-कल रागिनी


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जब किसी निर्झर की कल-कल रागिनी

या सागर की हलचल

शब्दों में साकार हो

स्वर पाती है

कविता हो जाती है।

जब किसी भगीरथ के श्रम से

पहाड़ों से उतर कोई गंगा

प्यासे अधरों को सींचती है

फ़सलों में लहलहाती है

कविता हो जाती है

जब किसी क्रौंची की कराह

किसी कवि की साँसों में समा 'अनुष्टुप' बन जाती है

और 'अंतरंग प्रिया’ के लिए आकुल हो उठता है कवि मन

अथवा अनावश्यक ही कोई शकुंतला या यक्षिणी

हो जाती है अभिशाप का शिकार

या जब किसी शकुंतला की अँगूठी

कोई मछली निगल जाती है

और,नटता है दुश्यंत

या फिर मथुरा में बैठ

निर्दय योगी

उध्दव से भिजवाता है

संदेश, कोई नटवर नागर कान्हा

तो, कविता हो जाती है

कविता सुकाल में भी होती है

और, अकाल में भी

कविता होती रही है 'अकाल के बाद' भी

छाती पर हिमखंड धरे बैठे बाल्मीकियों से

वैसे सच कहें तो,

कविता को रच ही नहीं सका है कोई

उलटे कविता ही रचती रही है

रूप और आकार देती रही है उन्हें

एक सृजनधर्मी अजन्मा माँ की तरह

कविता कभी करती है शांति का आह्वान

कभी विद्रोह का बिगुल बजाती है

कविता सायास बौध्दिक क्रीड़ा नहीं

यह अनायस आकुल मन की सहज अभिव्यक्ति है

यह कभी 'दिनकर' की उर्वशी

कभी भारती की 'कनुप्रिया'

कभी प्रसाद के 'आँसू' में ढल जाती है

तो कभी 'नीर भरी दु:ख की बदली' बन

'कितनी नावों में कितनी बार' बैठ

'अँधेरे में' करुणा का सागर तिर जाती है,

इस तरह जब भी कुलबुलाती है,

सृजन की कोई पीड़ा और बाहर आती है

कभी-कभी कुछ शेष भी रह जाती है

कविता हो जाती है।

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